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शनिवार, 19 सितंबर 2009

अब, नमकीन चाय का, लें स्वाद


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- इंडियन नेशनल लोकदल प्रदेश भर में नमकीन चाय पिलाएगा। यह इनेलो की मेहमान नवाजी नहीं चुनावी फंडा है। चीनी के स्थान पर नमक घुली चाय पिलाकर इनेलो महंगी चीनी खरीद रहे मतदाता की पीड़ा को छूएगा। प्रदेश के कुछ स्थानों पर इनेलो के कार्यकर्ताओं ने लोगों को नमकीन चाय पिलानी शुरू भी कर दी है। अंबाला जिले में इनेलो के प्रदेश महासचिव जसबीर मल्लौर नमकीन चाय पिलाकर मतदाताओं को रिझा रहे हैं। मल्लौर का कहना है हम लोगों के मुद्दों को दिलचस्प तरीके से रखकर उन्हें जागरुक कर रहे हैं औरबता रहे हैं कि यह महंगाई कांग्रेस सरकार की देने है। अगर महंगाई से छुटकारा पाना है तो कांग्रेस से छुटकारा पाओ और इनेलो को वोट दो। असल में इनेलो चीनी को प्रतीक बनाकर महंगाई को मुद्दा बनाकर सरकार पर हमले करेगा। पिछले छह महीने में महंगाई से आम लोग परेशान हैं। चीनी के साथ दालों के दाम में दोगुना बढ़ोतरी के साथ आटा 17 रुपये प्रति किलो तक हो गया है। चीनी का भाव 15 रुपये किलो से 33 रुपये किलो हो गया है। चीनी के बढ़ते दाम ने लोगों की चाय को फीका कर दिया है। इनेलो अब फीकेपन को नमकीन बना रही है। इसी तरह दालों की कीमतें 30 से 35 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 70 से 80 रुपये पर पहुंच गई है। चायपत्ती, मसाला आदि की कीमतों में भी पांच से दस रुपये की बढ़ोतरी भी चिंता का विषय है जबकि देसी घी 180 रुपये से बढ़कर 230 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। इसी प्रकार अन्य वस्तुओं के दाम भी बढ़े हैं जिससे खुद कांग्रेस को भी इंकार नहीं है। पेट्रोल-डीजल के दाम अलग से बढ़े हैं। इनेलो महंगाई और मंदी की मार झेल रही जनता को पीड़ा को आधार बनाकर चुनाव प्रचार तेज करेगा। महंगाई को अपना कारगर हथियारबनाने की खातिर इनेलो ने चुनाव घोषणा पत्र में गरीब परिवारों को हर महीने 25 किलो मुफ्त अनाज देने का वायदा किया है। नमकीन चाय पिलाने के मुद्दे पर इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला ने कहा कि इनेलो नमकीन चाय पिलाने की मुहिम को पूरे प्रदेश में चलाकर कांग्रेस के गरीब विरोधी चेहरे को बेनकाब करेगा। केंद्र की कांग्रेस सरकार कहती है कि राज्य सरकारें महंगाई को रोकें जबकि हरियाणा की कांग्रेस सरकार गेंद केंद्र के पाले में डाल रही है। असल में केंद्र व राज्य सरकार दोनों की नीतियों जमाखोरों और कालाबाजारियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। सीधे-सीधे भाषण या बयानों में महंगाई व दूसरे मुद्दो को उछालने का इनेलो को लोकसभा चुनाव में ज्यादा लाभ नहीं मिला। यही वजह है कि इस बार इनेलो अब मुद्दों को नाटकीय अंदाज से उछाल रहा है ताकि सीधे मतदाता के मन पर असर हो।

इनेलो से गठबंधन चाहते हैं हरियाणा के अकाली


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : शिरोमणि अकाली दल की हरियाणा इकाई हरियाणा में विधानसभा चुनाव इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) से मिलकर लड़ना चाहती है। उसका मानना है कि अगर इनेलो व शिअद मिल जाएं तो गठबंधन हरियाणा में सत्ताधारी कांग्रेस का सफाया कर सकता है, लिहाजा उसने हाईकमान से चुनाव लड़ने व इनेलो से हाथ मिलाने की इजाजत मांगी है। हाईकमान ने अव्वल तो हरियाणा में चुनाव लड़ने या न लड़ने और इनेलो से गठबंधन के मुद्दे पर एक-दो दिन में निर्णय कर लेने की बात कही है। उल्लेखनीय है कि पंजाब में सत्तारूढ़ अकाली दल की गठबंधन सहयोगी भाजपा ने हाल ही में हरियाणा में इनेलो से रिश्ते तोड़े हैं। अब अकाली दल का इस बाबत किसी भी फैसले पर सबकी नजर रहेगी। हरियाणा प्रदेशाध्यक्ष जत्थेदार जोगिंदर सिंह अहरवां, एसजीपीसी सदस्य बलदेव सिंह कैम्पुर, परदीप सिंह भानखेड़ी, हरदम सिंह सिरसा के अलावा हरदीप सिंह निडर, तेजिंदर सिंह ढिल्लों, हरभजन सिंह मसाना, शरनजीत सिंह, हरपाल सिंह रिप्पी, निरंजन सिंह भानखेड़ी, अजीत सिंह अंबाला, जरनैल सिंह बड़ौला और अभय सिंह निडर ने शुक्रवार को शिअद के चंडीगढ़ स्थित कार्यालय में शिअद अध्यक्ष एवं उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल से मुलाकात की। उन्होंने हरियाणा विधानसभा चुनाव में इनेलो के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई और सुखबीर से गठबंधन करने की इजाजत मांगी। इस बैठक के दौरान शिअद महासचिव बलविंदर सिंह भूंदड़, प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा और सचिव डा. दलजीत सिंह चीमा भी उपस्थित थे। जत्थेदार अहरवां ने कहा कि शिअद की हरियाणा इकाई महसूस करती है कि हरियाणा में कृषि, पर किसानों, गरीबों की समस्याओं के समाधान और पंजाबी भाषा जैसे मसलों के लिए अकाली दल को अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि हरियाणा में इनेलो और शिअद मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस का सफाया कर दिया जाएगा। अहरवां ने सुखबीर से इनेलो पार्टी अध्यक्ष से मिलकर सीटों के बंटवारे का मामला तय करने का अनुरोध किया और बलपूर्वक कहा कि चुनाव हर हाल लड़ा जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि अकाली दल हरियाणा में पार्टी को सभी सीटों पर विजय दिलाएगा। इसके साथ ही हरियाणा इकाई ने उम्मीदवारों के चयन के सभी अधिकार पार्टी अध्यक्ष सुखबीर को सौंप दिए। सुखबीर ने हरियाणा के अकाली नेताओं से कहा कि हरियाणा में चुनाव लड़ने या न लड़ने तथा इनेलो से गठबंधन करने के मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से विचार-विमर्श करके एक-दो दिन में निर्णय ले लिया जाएगा और निर्णय लेते समय हरियाणा के पार्टी नेताओं की भावनाओं का पूरा ख्याल रखा जाएगा। इस अवसर पर सुखबीर ने डा. दलजीत सिंह चीमा को हरियाणा की समूची राजनीतिक गतिविधियों का बारीकी से आकलन करने को कहा ताकि वहां चुनाव लड़ने अथवा न लड़ने का निर्णय शीघ्र लिया जा सके।

चुनाव प्रचार में लाउड स्पीकर का प्रयोग रात्रि 10 बजे तक



सिरसा,( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- जागरण संवाद केंद्र जिलाधीश एवं उपायुक्त युद्धवीर सिंह ख्यालिया ने जारी आदेशों में सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों व कार्यकर्ताओं से कहा कि वे चुनाव प्रचार में लाउडस्पीकर का उपयोग सुबह 6 से रात्रि 10 बजे तक कर सकते है तथा लाउडस्पीकर की ध्वनि ऊंची न रखी जाए। इन आदेशों की अवेहलना करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही अमल में लाई जाएगी। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनावों के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि व कार्यकर्ता प्रचार के लिए लाउडस्पीकर का प्रयोग करेगे। ये लाउडस्पीकर वाहन पर लगे हो सकते है या किसी अन्य माध्यम से प्रचार का कार्य किया जाता हो। इसके लिए लाउडस्पीकर का प्रयोग सुबह 6 बजे से रात के 10 बजे तक किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकर लगाने की पूर्ण अनुमति संबंधित रिटर्निग अधिकारी से लेनी आवश्यक है। जिस वाहन पर लाउडस्पीकर लगाया जाएगा उस वाहन का नंबर भी अनुमति पत्र पर अंकित होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मतदान के 48 घटे पहले सभी प्रकार का प्रचार बंद हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इन आदेशों की अवेहलना करने वालों के खिलाफ ध्वनि प्रदूषण एक्ट के तहत कानूनी कार्यवाही की जाएगी। एक अन्य आदेश में जिलाधीश ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने वाहन पर लाल व नीली बत्ती का प्रयोग नहीं कर सकता। लाल व नीली बत्ती का प्रयोग वहीं विभाग, अधिकारी कर सकते है जिन्हें लाल व नीली बत्ती की अनुमति प्राप्त है। एक अन्य आदेश में जिलाधीश ने सभी राजनीतिक दलों व कार्यकर्ताओं से कहा है कि प्रचार सामग्री उचित मात्रा में छपवाएं। छपवाई गई प्रचार सामग्री पर प्रेस का नाम व संख्या अवश्य अंकित हो। प्रचार सामग्री की जानकारी संबंधित चुनाव अधिकारी को उपलब्ध करवाई जाए।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

एक और हैट्रिक पर हुड्डा की निगाह


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- लोकसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक बनाने वाले मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की निगाह अब एक और हैट्रिक पर लगी है। इस हैट्रिक का फर्क बस इतना है कि पहले जीत की तिकड़ी लोकसभा चुनाव में बनाई थी, अब विधानसभा में जीत की यही कहानी दोहराना चाहेंगे। यदि मुख्यमंत्री विधानसभा चुनाव में जीत जाते हैं तो वे प्रदेश के दूसरे ऐसे राजनीतिज्ञ होंगे, जिनके खाते में चुनाव के दोनों संस्करणों (लोकसभा और विधानसभा) में जीत की हैट्रिक दर्ज होगी। लोकसभा व विधानसभा में हैट्रिक बनाने का विरला कारनामा पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल भी कर चुके हैं। बंसीलाल 1980, 1984 व 1989 के लोकसभा चुनाव और 1967, 1968 व 1972 के विधानसभा चुनाव जीतकर तिकड़ी बना चुके हैं। हरियाणा के अस्तित्व में आने के बाद से किलोई हलके में विपक्ष का कुछ ज्यादा ही बोलबाला था। यह भी संयोग ही रहा कि किलोई हलके से जीत की बोहनी मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पिता रणबीर सिंह हुड्डा ने की। इसके बाद लगातार कांग्रेस प्रत्याशी हारते रहे, यह सिलसिला 1991 तक चलता रहा। इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कृष्णमूर्ति हुड्डा जीते। इसके साथ ही हुए लोकसभा चुनाव में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने रोहतक लोकसभा सीट से पहली जीत दर्ज की। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 1991, 1996 व 1998 के लोकसभा चुनाव में पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल को लगातार तीन बार पटखनी दी थी। वर्ष 2000 व 2005 में हुए उपचुनाव में जीतकर हुड्डा विधानसभा पहंुचे। किलोई उपचुनाव में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने करीब 96 प्रतिशत मत लेकर नया रिकार्ड कायम किया था। नए परिसीमन के बाद किलोई से गढ़ी-सांपला-किलोई बने इस हलके में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने 87 हजार 908 मत हासिल किए थे। इनेलो प्रत्याशी नफे सिंह राठी केवल 10 हजार 99 वोट ले पाए थे। जीत के इसी दौर के बीच 1996 के विधानसभा चुनाव में किलोई और 1999 लोकसभा चुनाव में हार का भी सामना करना पड़ा। इनेलो ने इस वीआईपी सीट से नए चेहरे सतीश नांदल को उतारा है। भाजपा, हजकां व बसपा ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं। वैसे, कांग्रेसी पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री को रोहतक विधानसभा से चुनाव लड़ने का न्यौता दे रहे हैं। यह सीट शादीलाल बतरा के राज्यसभा में भेजे जाने के बाद खाली हुई है। यहां कुछ बदलाव होगा, कहना मुश्किल है। फिर भी राजनीति में कुछ भी होने की संभावना हमेशा बनी रहती है।

हरियाणा के चुनावी दंगल पर एक नजर


अपनों को टिकट की जुगत में दिग्गज

( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)-
हरियाणा के चुनावी दंगल में ताल ठोकने के लिए न केवल दिग्गजों ने लंगोट कसे हुए हैं, बल्कि वह अपनी धर्मपत्नियों और पुत्रों के साथ-साथ भाइयों के लिए भी टिकट की दमदार पैरवी कर रहे हैं। पत्नी और पुत्रों के लिए टिकट मांगने वाले दिग्गजों की संख्या कांग्रेस में सबसे अधिक है। भाजपा, बसपा और हजकां में एक दर्जन दिग्गज अपने पारिवारिक सदस्यों के लिए टिकट की जंग लड़ रहे हैं। विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया 18 सितंबर से आरंभ होगी। इनेलो और हजकां ने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। कांग्रेस समेत बाकी दलों की सूची नामांकन प्रक्रिया के दौरान घोषित होने की उम्मीद है। प्रत्येक पार्टी में इस समय टिकट के लिए मारामारी मची हुई है। कांग्रेस समेत हर दल में दिग्गज जहां खुद के टिकट की लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीं उनकी कोशिश अपनी पत्नियों, पुत्रों और भाइयों को टिकट दिलाने की है। कांग्रेस दिग्गज अपनी व परिवार के सदस्यों की टिकट के लिए दिल्ली दरबार में डेरा डाले हुए हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा की धर्मपत्नी आशा हुड्डा के रोहतक से चुनाव लड़ने की संभावना बताई जा रही है। पूर्व मंत्री विनोद शर्मा की धर्मपत्नी शक्ति शर्मा अंबाला शहर और पंचकूला से टिकट की दावेदार हैं। कांग्रेस के प्रांतीय कार्यकारी प्रधान कुलदीप शर्मा की पत्नी नीलम शर्मा असंध और करनाल तथा करनाल के सांसद डा. अरविंद शर्मा की पत्नी डा. रीटा शर्मा समालखा से टिकट की दावेदार हैं। हरियाणा के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पीवी राठी की पत्नी पूनम राठी गन्नौर से कांग्रेस का टिकट चाहती हैं तो पूर्व मंत्री राजेश शर्मा की पत्नी यमुनानगर में दावेदार हैं। वह राज्य कर्मचारी चयन आयोग की सदस्य भी हैं। फरीदाबाद के कांग्रेस सांसद अवतार सिंह भड़ाना अपनी पत्नी ममता भड़ाना के लिए बड़खल अथवा फरीदाबाद एनआईटी से टिकट चाहते हैं। केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा के भाई जगन्नाथ उकलाना से टिकट के दावेदार हैं तो उनके जीजा आईएएस आरके रंगा साढ़ोरा अथवा मुलाना से कांग्रेस की टिकट के इच्छुक बताए जाते हैं। राज्यसभा सदस्य ईश्वर सिंह के पुत्र शाहबाद से टिकट के दावेदार है। पूर्व सांसद आत्मा सिंह गिल की बेटी गुरदीप कौर रतिया से बसपा का टिकट चाहती हैं तो उनके पुत्र परमवीर गिल रतिया से ही कांग्रेस के टिकट के लिए भागदौड़ कर रहे हैं। कांग्रेस में उपमुख्यमंत्री रहे चंद्रमोहन खुद को टिकट नहीं मिलने की स्थिति में अपनी पत्नी सीमा बिश्नोई के लिए पंचकूला से कांग्रेस की टिकट मांग रहे हैं। हजकां ने सीमा बिश्नोई को अपनी पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़वाने की पेशकश की है। हांसी के विधायक अमीरचंद मक्कड़ अपने पुत्र रवींद्र मक्कड़ के लिए टिकट मांग रहे हैं। पूर्व मंत्री लक्ष्मण दास अरोड़ा को अपनी पुत्री सुनीता सेतिया अथवा दामाद राहुल सेतिया के लिए सिरसा से टिकट की उम्मीद में हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह बादशाहपुर से अपनी पुत्री के लिए टिकट हासिल करने की जुगत में लगे हुए हैं। पूर्व मंत्री संपत सिंह की साली बिमला सांगवान ने नलवा और आदमपुर से कांग्रेस की टिकट मांगी है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष फूलचंद मुलाना खुद मुलाना से टिकट के दावेदार हैं। यहां उन्होंने अपने पुत्र वरुण मुलाना का नाम भी चला रखा है। वरुण शाहबाद में भी निगाह टिकाए बैठे हैं। बसपा के प्रांतीय प्रभारी मान सिंह मनहेड़ा की पत्नी सतबीर कौर को नीलोखेड़ी हलके में लाने की तैयारी हो रही है। पूर्व मंत्री जाकिर हुसैन के पुत्र ताहिर हुसैन फिरोजपुर झिरका से बसपा के टिकट के दावेदार हैं। पूर्व मंत्री राव महावीर सिंह के पुत्र राव नरवीर सिंह बादशाहपुर से हजकां की टिकट के दावेदार हैं। पूर्व मंत्री शेर सिंह के पुत्र रवि सिंह साढ़ोरा से बसपा का टिकट चाहते हैं। सोनीपत के कांग्रेस सांसद जितेंद्र मलिक अपने भाई हरेंद्र मलिक के लिए गन्नौर से टिकट की दावेदारी किए हुए हैं। भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रतनलाल कटारिया अपनी पत्नी बंतो कटारिया के लिए शाहाबाद से टिकट की जुगाड़ में हैं। हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री पंडित भगवत दयाल शर्मा की पुत्री माधवी यमुनानगर से बसपा के टिकट की मजबूत दावेदार हैं। पूर्व सांसद स. तारा सिंह ने असंध से अपने पुत्र प्रिंस के लिए इनेलो का टिकट मांगा है। दिवंगत राज्यपाल सूरजभान के पुत्र अरुण कुमार मुलाना से भाजपा के टिकट के दावेदारों में शामिल हैं। हजकां सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई हालांकि खुद आदमपुर से चुनाव लड़ने का एलान कर चुके हैं, मगर वह अपनी पत्नी रेणुका को नलवा से चुनाव लड़वाने के इच्छुक हैं। यदि रेणुका चुनाव नहीं लड़ी तो कुलदीप अपनी माता जसमा देवी को नलवा अथवा हिसार से चुनाव मैदान में उतार सकते हैं। कांग्रेस की दिवंगत पूर्व मंत्री करतार देवी के देवर को कलानौर से टिकट दिलाने की जुगाड़ बैठाई जा रही है।

अफसरों को भाई नेतागीरी


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- हरियाणा की राजनीति और चुनाव में अफसरशाही का रुझान बढ़ता जा रहा है। अफसर रिटायर होकर या नौकरी से इस्तीफा देकर राजनीति में कदम रख रहे हैं। यह दीगर बात है कि अभी तक बहुत कम अफसरों को इसमें कामयाबी मिली है। पहले पहल कृपा राम पूनिया ने राजनीति में मजबूत दस्तक दी। 1987 में देवीलाल कृपा राम पूनिया को आईएएस के पद से इस्तीफा दिलवाकर राजनीति में लाए। तब पूनिया प्रदेश में एक बड़े दलित नेता के रूप में उभरे। पर पूनिया देवीलाल के छोटे बेटे रणजीत सिंह के खेमे में चले गए और पार्टी के संगठन पर देवीलाल के बड़े बेटे ओम प्रकाश चौटाला की पकड़ रही। इसके कारण धीरे-धीरे पूनिया राजनीति के हाशिये पर चले गए। वैसे पूनिया से पहले शाम चंद राजनीति में आ गए थे और मंत्री भी बने थे। शामलाल लंदन में स्कूल आफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाते थे। नौकरी छोड़ने के बाद वह 1972 में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़कर बंसीलाल की वजारत में वजीर बने। दिलचस्प बात यह है कि बाद में सोनीपत जिला की बरौदा सीट से शाम लाल को हराकर ही कृपा राम पूनिया ने राजनीति में प्रवेश किया। आईएएस अधिकारी आईडी स्वामी सेवानिवृत्त होने के बाद भाजपा में शामिल हो गए। स्वामी ने करनाल संसदीय सीट से दो बार चुनाव जीता और वह केंद्र में मंत्री भी बने। हेतराम बैंक अधिकारी का पद छोड़कर और डा.सुशील कुमार इंदौरा डाक्टर का पद छोड़कर राजनीति में आए और दोनों ही सिरसा से सांसद बने। दोनों ही इनेलो के टिकट पर सांसद बने थे पर अब दोनों ही कांग्रेस में हैं। हरियाणा विधानसभा के निवर्तमान अध्यक्ष डा.रघुबीर सिंह कादियान 1987 के दौर में देवीलाल के साथ राजनीति में आए। कादियान हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में डाक्टर थे। कादियान भी उन राजनेताओं में से हैं जोकि देवीलाल के छोटे बेटे से रणजीत सिंह के साथ हो लिए थे, पर आखिर उन्हें कांग्रेस में आना पड़ा। नारनौल से निवर्तमान विधायक राधे श्याम शर्मा आबकारी व कराधान विभाग में अधिकारी थे। सेवानिवृत्ति के बाद वह कांग्रेस से टिकट चाहते थे, पर टिकट न मिलने पर उन्होंने 2005 में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की। इलाके में उन्हें राधे श्याम डीटीसी के नाम से ही जाना जाता है। एचसीएस अधिकारी बहादुर सिंह ने साल 2000 विधानसभा में जीत हासिल की और वजीर बने। पर अब वे इनेलो छोड़कर कांग्रेस में आ गए हैं। पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए एच आर स्वान ने दो बार सिरसा संसदीय सीट पर भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ा। इस समय पूर्व पुलिस महानिदेशक एएस भटोटिया और पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रेशम सिंह भाजपा में हैं। दोनों अफसर भाजपा की चुनाव समिति में हैं। पूर्व पुलिस महानिदेशक महेंद्र सिंह मलिक, पूर्व आईएएस बी डी ढालिया और आर एस चौधरी इनेलो में हैं और इनेलो में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। डा.केवी सिंह 1987 के दौर में सरकारी नौकरी छोड़कर देवीलाल के ओएसडी बने थे। अब केवी सिंह मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के ओएसडी थे। सिरसा जिला में दड़बा उनका विधानसभा क्षेत्र था जहां से उन्होंने चुनाव लड़ा था पर हार गए थे। अब डा. के वी सिंह सिरसा जिले के मंडी डबवाली से कांग्रेस के टिकट पर दावा कर रहे हैं। दड़बा सीट नई हदबंदी में बची नहीं और डबवाली सीट अब आरक्षित नहीं रही। एचसीएस अफसर वीरेंद्र मराठा ने नौकरी से इस्तीफा देकर 2004 में एकता शक्ति नाम से राजनीतिक दल बनाया। एकता शक्ति में कई उतार चढ़ाव आए। मराठा ने कई चुनाव लड़े। आखिरकार 2009 के चुनाव में उन्होंने एकता शक्ति का बसपा में विलय कर दिया और करनाल संसदीय सीट से चुनाव लड़ा पर जीत न सके। बसपा से निकाले जाने के बाद आजकल मराठा इनेलो के संपर्क में है। आईएएस अफसर रघुबीर सिंह ने सेवानिवृत्ति के बाद हविपा की टिकट पर टोहाना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था पर वह हार गए। रघुबीर सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरपाल सिंह के सगे भाई हैं। केंद्रीय मंत्री सैलजा के जीजा व सेवानिवृत्त आई ए एस आर के रंगा अब कांग्रेस में है और मुलाना या सढौरा विधानसभा सीट से टिकट का दावा कर रहे हैं। हाल ही में सेवानिवृत्त हुए आई ए एस अफसर एचसी दिसौदिया कांग्रेस में हैं और टिकट का दावा कर रहे हैं। सेवानिवृत्त एचसीएस अधिकारी एमएल सारवान भी भी राजनीति में सरगर्म हैं।

सभी दलों को मिलेगा समान समय : सज्जन सिंह


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- भारत के चुनाव आयोग ने हरियाणा राज्य विधानसभा-2009 के आगामी आम चुनावों के लिए प्रसार भारती निगम के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर समान समय देने की योजना शुरू करने का निर्णय लिया है। हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी सज्जन सिंह ने आज यहां बताया कि हरियाणा में केवल राष्ट्रीय पार्टियों और मान्यता प्राप्त राज्य पार्टियों को ही रेडियो और टेलीविजन पर प्रसारण की सुविधा उपलब्ध होगी। सज्जन सिंह ने कहा कि यह सुविधा आकाशवाणी और दूरदर्शन के क्षेत्रीय केन्द्रों और हरियाणा के मुख्यालय पर तथा राज्य में स्थित अन्य केन्द्रों पर उपलब्ध होगी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक राष्ट्रीय पार्टी और राज्य में मान्यता प्राप्त पार्टी को हरियाणा में दूरदर्शन नेटवर्क और आकाशवाणी के क्षेत्रीय केन्द्रों पर समान रूप से 45 मिनट का समय दिया जाएगा। राष्ट्रीय और राज्य पार्टियों को विधानसभा चुनावों के लिए एक समान समझा जाएगा। हरियाणा राज्य के पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टियों के प्राप्त मतों के आधार पर पार्टियों को अतिरिक्त समय आबंटित किए जाने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि ब्रॉडकास्ट के एक सत्र में किसी भी पार्टी को 15 मिनट से अधिक समय आबंटित नहीं किया जाएगा। ब्रॉडकास्ट और टैलीकास्ट का समय नामांकन भरने की अन्तिम तिथि से आरम्भ होकर हरियाणा में चुनावों की तिथि से दो दिन पहले समाप्त होगा। बहरहाल, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के विशेष प्रावधानों के अनुसार मतदान बंद होने के 48 घंटों के दौरान कोई भी टेलीकास्ट या ब्रॉडकास्ट नहीं होगा। प्रसार भारती निगम द्वारा आयोग के परामर्श से ब्रॉडकास्ट और टेलीकास्ट की वास्तविक तिथि और समय का निर्णय लिया जाएगा। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर उपलब्ध सम्प्रेषण का वास्तविक समय तकनीकी कारणों पर निर्भर होगा। टेलीकास्ट और ब्रॉडकास्ट के लिए आयोग द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाएगा। पार्टियों को अग्रिम तौर पर पांडूलिपियां और रिकॉर्डिग भेजना अनिवार्य होगा। पार्टियां प्रसार भारती निगम द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले स्टूडियो या दूरदर्शन या आकाशवाणी केन्द्र पर अपनी स्व:लागत पर इसे रिकॉर्ड करवा सकती हैं। वे दूरदर्शन और आकाशवाणी के स्टूडियो में अग्रिम अनुरोध पर इसे रिकॉर्ड करवा सकते हैं। ऐसे मामलों में रिकॉर्डिग दूरदर्शन या आकाशवाणी द्वारा निर्धारित समय पर राज्य की राजधानी में अग्रिम रूप से करवाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि पार्टियों द्वारा ब्रॉडकास्ट के अतिरिक्त प्रसार भारती निगम द्वारा दूरदर्शन या आकाशवाणी केन्द्र पर अधिकतम दो पैनल विचार-विमर्श या वाद-विवाद पर आयोजित किए जाऐ। प्रत्येक पार्टी ऐसे एक कार्यक्रम के लिए एक प्रतिनिधि नामांकित कर सकती है। भारत के चुनाव आयोग द्वारा प्रसार भारती निगम के परामर्श से ऐसे पैनल विचार-विर्मशों और वाद-विवादों के लिए समन्वयक ों के नामों को स्वीकृत किया जाएगा। उन्होंने कहा कि समय वाऊचर प्रत्येक पांच मिनट के गुणज पर उपलब्ध होंगे तथा पार्टियां उन्हें उचित रूप से संघटित करने के लिए स्वतंत्र होगी।

सम्मान दिवस रैली की तैयारी पूरी : अरोड़ा


डबवाली, (डॉ सुखपाल सावंत खेडा ): इंडियन नेशनल लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष अशोक अरोड़ा ने कहा है कि स्वर्गीय ताऊ देवी लाल के जन्म दिन पर 25 सितंबर को जींद में प्रस्तावित रैली की सभी तैयारी पूरी कर ली गई हैं। जींद में सफीदो रोड स्थिति हुडा मैदान पर रैली में प्रदेश भर से लाखों लोग हिस्सा लेने आएंगे और पूर्व उप प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। श्री अरोड़ा ने कहा कि आज प्रदेश लूटपाट, भ्रष्टाचार, अपराधों, हत्या, बलात्कार, अपहरण व फिरौती के मामलों में नंबर वन है। प्रदेश का आम नागरिक कांग्रेस की जनविरोधी नीतियों से बेहद परेशान है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में इनेलो की सरकार बनने पर बेरोजगार युवकों को सरकारी या गैर सरकारी नौकरी अथवा तीन हजार रुपए महीना बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि बेरोजगार युवकों के लिए नौकरी की आयु सीमा 40 साल से बढ़ाकर 45 साल की जाएगी और प्राइवेट सेक्टर में भी 50 फीसदी नौकरियां हरियाणा के निवासियों के लिए आरक्षित की जाएंगी। उन्होंने कहा कि आज महंगाई की मार से आम आदमी बेहद परेशान है और गरीब आदमी दो वक्त दाल व रोटी भी नहीं खा सकता। उन्होंने हुड्डा को केवल रोहतक का मुख्यमंत्री बताते हुए कहा कि इस इलाके के युवकों का गला काटकर नौकरियां केवल रोहतक के युवाओं को दी जा रही है।

क्लर्क ने मुंशी को जड़ा तमाचा



डबवाल( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- न्यायालय परिसर में आज उस समय बवाल खड़ा हो गया जब न्यायालय में तैनात कापी क्लर्क द्वारा एक अधिवक्ता के मुंशी को थप्पड़ जड़ दिया। क्लर्क के इस कृत्य से खफा मुंशी एकत्रित हो गए और मामला जब न्यायाधीशों के नोटिस में आया तो कापी क्लर्क द्वारा माफी मागे जाने पर मामला वहीं निपट गया। मिली जानकारी के अनुसार डबवाली बार के वरिष्ठ अधिवक्ता युधिष्ठिर शर्मा का मुंशी रमेश शर्मा किसी मामले में नकल लेने के कापी क्लर्क दविंद्र सिंह के पास गया तो किसी बात को लेकर दोनों में बहस हो गई और जिससे तैश में आकर दविंद्र सिंह ने मुंशी रमेश मेहता को थप्पड़ रसीद कर दिया। मामले की जानकारी मिलने पर बार के सभी मुंशी एकत्रित हो गए और उन्होंने उपरोक्त घटना की कड़ी निंदा की। वहीं इसकी सूचना मिलने पर न्यायाधीश महावीर सिंह और अमरजीत सिंह ने कापी क्लर्क दविंद्र सिंह को अपने कार्यालय में तलब कर लिया। वहीं पर मुंशियों का शिष्टमंडल भी पहुंच गया। मौके पर क्लर्क दविंद्र सिंह द्वारा इस घटना में माफी माग लिए जाने पर मामला वहीं निपट गया। आज न्यायालय परिसर में दिनभर इस थप्पड़ की गूंज सुनाई देती रही। इस विवाद के कारण काफी देर तक वहा पर काम काज सामान्य रूप से नहीं हो पाया।

गबन मामले में चार कर्मचारी और निलंबित


ओढा,( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- प्राथमिक कृषि सहकारी समिति ओढा के कर्मचारियों द्वारा किसानों से किए लाखों रुपए के गबन का मामला हर दिन नया मोड़ ले लेता है जहा कल पैक्स कर्मचारियों ने 16 किसानों से किए गबन पैसे को उनके खाते में जमा करवा दिया वहीं आज प्रबंधक कमेटी ने कड़ा रुख अपनाते हुए इस मामले में दोषी चार कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है। निलंबित किए जाने वाले कर्मचारियों में एक क्लर्क और तीन सेल्समैन शामिल है। स्थानीय पैक्स कार्यालय में एक बैठक की गई जिसमें पैक्स प्रबंधक बलबीर सिंह, पैक्स समिति के चेयरमैन दर्शन सिंह, डायरेक्टर विजय कासल, गुरमेल सालमखेड़ा, करनैल सिंह व जगपाल कुण्डर आदि ने भाग लिया। इस बारे में पैक्स प्रबंधक बलबीर सिंह ने बताया कि किसानों द्वारा दी गई शिकायत पर कार्रवाई करते हुए सेल्समैन जगदीश कुमार, मलकीत सिंह, संजय कुमार व क्लर्क सुखदेव सिंह को निलंबित कर दिया है इन कर्मचारियों को आरोप पत्र भी थमाया गया जिसमें किसानों द्वारा लगाए गए आरोप के बारे में जवाब प्रबंधक कमेटी की आगामी बैठक में देंगे। अगर प्रबंधक समिति उनके जवाबों से संतुष्ट होता है तो ठीक है। अन्यथा उनके खिलाफ ओढा थाना में एफ.आई.आर दर्ज करवाई जाएगी। उधर इस मामले में जाच कर रहे नेकी राम ने कहा कि इस कार्रवाई से उनकी जाच पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा। उन्हे सौंपी गई अभी जाच जारी है। गौरतलब है कि इस गबन मामले में बैंक मैनेजर मोहन लाल, सेल्समैन दलीप सिंह, दया राम एक अन्य को शुरूआती जाच में ही निलंबित किया जा चुका है। इसी कार्रवाई से बचने के लिए कर्मचारियों ने गत दिन 15 किसानों के खाते में 9 लाख रुपए की राशि जमा करवाई थी जबकि बचे एक किसान की 53 हजार की राशि जल्द जमा करवाने का आश्वासन दिया था।

अभी भी टिकट बंटवारे में उलझी हुई है कांग्रेस


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए कल 18 सितंबर से पर्चा भरने का काम शुरू हो जाएगा। हरियाणा विधानसभा की कुल 90 सीटें हैं। पर्चा 25 सितंबर तक भरा जाएगा और 29 सितंबर को नामांकन की आखिरी तारीख है। कांग्रेस, बीजेपी व बसपा अभी भी टिकटों के बंटवारे में उलझी हुई हैं। दूसरी तरफ इनेलो ने 42 और हरियाणा जनहित कांग्रेस ने 26 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। इनेलो के लिए अपने बाकी प्रत्याशी तय करके उनका ऐलान करना कोई मुश्किल नहीं है पर कांग्रेस में टिकट बंटवारा बड़ी जंग बनी हुई है। हजकां-बीजेपी भी कांग्रेस के टिकट बंटवारे पर नजर गड़ाए हुए हैं। असल में इन्हें उम्मीद है कि टिकट बंटवारे के बाद कांग्रेस में जबरदस्त बगावत होगी। इन्हीं बागियों में जो मजबूत होंगे, उन्हें हजकां व बीजेपी प्रत्याशी बना सकती हैं। असल में कांग्रेस के लिए टिकट का दावा करने वालों के आवेदनों के चडीगढ़ कांग्रेस मुख्यालय में बोरे भर गए थे। पार्टी ने छंटनी के बाद 885 दावेदारों का पैनल बनाकर भेजा पर अब यह पैनल कहीं नहीं बचा है। सीधे पार्टी में आवेदन करने वालों से कहीं अधिक लोग वे थे, जो सीधे-सीधे पार्टी में अपने आकाओं को बायो डाटा दे रहे थे। इसके अलावा कई बड़े नेताओं ने अपने-अपने नाम दिए हैं। टिकटों का बंटवारे में कांग्रेस की गुटबाजी एक बार फिर ऊभरी। एक तरफ मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गुट है तो दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री सैलजा, वित्तमंत्री वीरेंद्र सिंह, खेल मंत्री किरण चौधरी और सांसद राव इंद्रजीत सिंह का गुट है। दोनों धड़े अपने लोगों को ज्यादा से ज्यादा टिकटें दिलवाना चाहते हैं। असल में इसी के आधार पर ये गुट अगले पांच साल की राजनीति करना चाहते हैं। सैलजा तो कह भी चुकी हैं कि इस चुनाव में किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया जाएगा। सो जो ज्यादा टिकटें ले जाएगा, वहीं मुख्यमंत्री के लिए अपना दबाव बनाने में कामयाब रहेगा। पर सच यह भी है कि कांग्रेस में आला कमान सोनिया का हुक्म सब कुछ होता है। सोनिया ने जिसको आशीर्वाद दिया, कांग्रेस के सभी विधायक भी उसी के साथ होंगे और वहीं राज्य का मुख्यमंत्री बनेगा। लगता है कि कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची 19 सितंबर तक ही आ पाएगी। कांग्रेस जानती है कि टिकटों के बंटवारे से साथ ही एक धमाका होगा टिकट से वंचित तमाम दावेदार हंगामा करेंगे। कुछ निर्दलीय चुनाव मैदान में आ सकते हैं तो कुछ भीतरघात कर सकते हैं। इधर बीजेपी अपने प्रत्याशी 19 और बीएसपी 21 सितंबर को घोषित करेगी। बीएसपी 20 सितंबर को जींद में आयोजित राज्यस्तरीय रैली में लगी है जिसमें पार्टी सुप्रीमो मायावती हिस्सा लेंगी। बसपा का कहना है कि जो दावेदार रैली में सबसे ज्यादा भीड़ लेकर आएगा, उसी को टिकट दिया जाएगा। इनेलो वाहिद ऐसी सियासी पार्टी है जोकि अपना चुनाव घोषणापत्र भी जारी कर चुकी है और चुनाव प्रचार में भी जुटी है। वैसे टिकट बंटवारे से रुष्ट होकर छोटी-मोटी बगावत इनेलो में भी हुई है। पूर्व मंत्री नरेंद्र शर्मा, कुरुक्षेत्र जिला परिषद के अध्यक्ष मेवा सिंह पार्टी छोड़ चुके हंै। गुल्ला चीका के पूर्व विधायक ने टिकट न मिलने से नाराज होकर अभी पार्टी तो नहीं छोड़ी पर भविष्य की रणनीति तय करने के लिए 20 सिंतबर को सीवन में महापंचायत बुलाई हुई है।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

55 में सुलह, 35 पर कलह


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- 55 में सुलह, 35 पर कलह : कांग्रेस की टिकटों को लेकर सबसे ज्यादा मारामारी मचने की आशंका जताई जा रही है लेकिन भीतर के नेताओं की मानें तो पार्टी के ज्यादातर टिकट पहले से ही तय हो चुके हैं। उन पर केवल अंतिम मुहर लगनी बाकी रह गई है। फिलहाल केंद्रीय नेतृत्व राज्य के नेताओं से बातचीत में व्यस्त है और पहली लिस्ट पितृ पक्ष के बाद आने की संभावना जताई जा रही है। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस काफी हॉट बनी हुई है। माना जा रहा था कि असेंबली चुनाव में गठजोड़ की राजनीति कांग्रेस को कड़ी टक्कर देने में कामयाब रहेगी लेकिन एक के बाद एक करके गांठें खुलने से विपक्ष की हालत दयनीय होकर रह गई है। हालत यह है कि कांग्रेस के अतिरिक्त किसी और दल में टिकट वितरण कोई मसला ही नहीं रह गया है। बाकी की मजबूरी है कि उपलब्ध विकल्पों में से ही बेहतरीन प्रत्याशी का चयन किया जाए। उधर, कांग्रेस में हर सीट पर चार से पांच बड़े नाम दावा ठोक रहे हैं। बाहरी नेताओं के पार्टी में धड़ाधड़ शामिल होने से भी टिकट की लड़ाई रोचक दौर में पहुंचती जा रही है। पिछली बार कांग्रेस 67 सीटों पर जीतकर आई थी। भजनलाल, गोहाना के धर्मपाल मलिक, इंद्री के राकेश कंबोज कांग्रेस से किनारा कर गए तो संख्या 64 पर आ गई। उप चुनाव में कांग्रेस आदमपुर के अलावा दो सीट फिर जीत गई और आंकड़ा 66 पर आ गया। लेकिन चुनाव आते-आते कांग्रेस के पास 63 विधायक ही रह गए। करतार देवी का निधन हुआ तो शादी लाल बत्रा राज्यसभा व जितेंद्र मलिक लोकसभा पहंुच गए। उनकी सीट खाली हैं। वहां से कांग्रेस को और कोई मजबूत उम्मीदवार तलाश करना पड़ रहा है। सूत्र कहते हैं कि कांग्रेस में टिकट के लिए माथापच्ची काफी पहले शुरू हो चुकी है। नेता टिकट के जुगाड़ के लिए हरियाणा के साथ दिल्ली में लाबिंग शुरू कर रहे हैं। जिनकी सीट परिसीमन में फंस गई वह अपने लिए नए हलके की तलाश में हैं तो सिटिंग एमएलए अपनी सीट बचाने की फिराक में हैं। इसके अतिरिक्त पिछली बार जो नेता चुनाव कम अंतर से हारे वह भी टिकट हासिल करने के लिए प्रयासरत हैं। सरकार में बतौर सलाहकार शामिल रहे एक नेता कहते हैं कि कांग्रेस में 55 सीटों पर शुरू से ही कोई विवाद नहीं है। वह कहते हैं कि चिंता का विषय वह 14 सीटें हैं जहां से कांग्रेस तीन से ज्यादा चुनाव लगातार हार चुकी है। उसके बाद वह सीटें हैं जहां पर पिछली बार पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। ऐसा नहीं है कि जो लोग चुनाव हारे थे उन सभी के टिकट काटे जाएंगे। अलबत्ता, जिनकी छवि अच्छी है और जो जोरदार टक्कर देकर हारे थे, उनके टिकट कटने की तुक नहीं है। उन जगहों पर चुनाव में ज्यादा मेहनत की जरूरत है। वह कहते हैं कि टिकट को लेकर मारामारी की बात विरोधी दल सबसे ज्यादा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि बाहर से कांग्रेस में आए नेता टिकट के लिए हुड़दंग मचाएंगे। लेकिन इन नेताओं को पहले ही साफ कर दिया गया है कि टिकट मेरिट और निष्ठा पर मिलेगा। वह कहते हैं कि लगभग 10 से 12 निवर्तमान विधायकों का टिकट काटा जा सकता है। कुछ को शिफ्ट किया जा सकता है। लगातार हार चुकी14 सीट पर नए नाम लाए जा रहे हैं। एक दर्जन सीट परिसीमन में फंस रही हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी का पत्ता साफ हो गया। कद्दावर को दूसरी सीटों पर लड़ाया जाएगा। वह कहते हैं कि भीतरी-बाहरी, परिसीमन व जीत-हार के भंवर में फंसी 35 सीटों को लेकर मंथन चल रहा है। उनका कहना है कि पार्टी पहले दौर में 30 से 50 नामों की घोषणा पितृपक्ष के बाद कभी भी कर सकती है?

टिकट के चक्कर में निकले न दिवाला

( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)-
करवटें बदलते रहे सारी रात हम.. इस खूबसूरत गाने की गुनगुनाहट कान में आते ही हर उम्र का व्यक्ति गुनगुना उठता है, तथा उस प्रेमी की तड़प का एहसास करता है जो अपनी पे्रमिका की याद में बड़ी मुश्किल से रात गुजारता है। आजकल कुछ ऐसा ही हाल कांग्रेस के कुछ उन टिकटार्थियों का है जो टिकट की दौड़ में काफी पीछे हैं तथा दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे महंगे शहर के होटलों में ठहरे हैं। रात सुबह होने के इंतजार में काट रहे हैं। सुबह होते ही पार्टी के आला नेताओं से मिलने और टिकट की बात पक्की करने की जुगत में जुट जाते हैं, होटलों में रुके इन नेताओं की अपने ही क्षेत्र में कोई खास पहचान नहीं हैं, फिर भी उन्हें टिकट चाहिए। टिकट नहीं मिला तो वे टिकट की घोषणा के साथ ही होटल ही नहीं बल्कि अपने क्षेत्र से भी गायब हो जाएंगे। कांग्रेस में टिकट के लिए मारामारी साफ दिख रही है। कुछ नेता तो बेवजह ही अपने आप को इस मारामारी में शामिल कर रहे हैं। राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक, किसी भी रूप में अभी तक उनकी सक्रियता नहीं देखी गई है जोकि वर्तमान परिवेश में चुनाव लड़ने के लिए महत्वपूर्ण है। फिर भी उन्हें टिकट चाहिए। यमुनानगर जिले की विधानसभा सीटों से ऐसे ही कुछ नेताओं ने कांग्रेस से उम्मीदवारी ठोंकी है और पिछले दो सप्ताह से दिल्ली और चंडीगढ़ के होटलों में अपने कुछ समर्थकों के साथ डेरा जमाए हुए हैं। पार्टी के बड़े नेताओं की कोठियों के चक्कर काट रहे हैं। चर्चा यह भी है कि ऐसे नेताओं की जेबें भी होटलों के किराये व सहयोगियों पर होने वाले खर्च में खाली होने लगी है। अब वे अपने रिश्तेदारों व दोस्तों से पैसे का जुगाड़ करने को कह रहे हैं। जहां पार्टी के बड़े-बड़े धुरंधरों को अपनी टिकट बचानी मुश्किल हो रही है, वहां ऐसे नेताओं की क्या औकात है, फिर भी वे अपने जानकारों व रिश्तेदारों को गुमराह कर रहे हैं कि बस नेताजी से बात हो गई है, उनकी टिकट फाइनल है। उनके नाम की घोषणा होते ही पैसे की कमी भी नहीं होगी, चंदे के रूप में बहुत पैसा इकट्ठा हो जाएगा, लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि चंदे में टिकट नहीं मिलता भाई।

जमानत गई तो क्या नाम तो हुआ


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : हरियाणा विधानसभा चुनाव में जमानत जब्त कराकर घर बैठने वाले नेताओं की संख्या हर बार बढ़ती जा रही है। चुनाव आयोग द्वारा नामांकन की फीस दस गुणा अधिक बढ़ा दिए जाने के बावजूद नेताओं में चुनाव लड़ने का क्रेज कम नहीं हुआ है। गैर कद्दावर, मुद्दाविहीन और चुनाव के मौसम में अचानक प्रकट होने वाले इन नेताओं को जनता ने हर बार बुरी तरह से सबक सिखाया है। निर्दलीय उम्मीदवारों को यदि नजरअंदाज कर दिया जाए तो विभिन्न पार्टियों के नेताओं को भी थोक में अपनी जमानतें जब्त करानी पड़ी हैं। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की शुरुआत 1967 में हुई। तभी से नेताओं में चुनाव लड़कर जनता का प्रतिनिधित्व करने की आपाधापी मची हुई है। चुनाव लड़ने वाले तमाम गैर कद्दावर और मुद्दाविहीन नेताओं को जनता ने भी पराजय का स्वाद चखाने में कोई कंजूसी नहीं बरती है। लोगों ने चुनाव में उन्हीं राजनेताओं के प्रति अपना विश्वास जाहिर किया, जिन्हें वह राजनीतिक तौर पर जानते हैं और उनकी नीतियों तथा मुद्दों से इत्तफाक रखते हैं। हरियाणा विधानसभा के प्रत्येक चुनाव में ताल ठोंकने वाले उम्मीदवारों में हालांकि निर्दलीयों की संख्या बहुत ज्यादा रही है, लेकिन विभिन्न पार्टियों के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संख्या भी तीन से चार अंकों में दर्ज की गई है। विधानसभा चुनाव की शुरुआत के बाद कोई भी उम्मीदवार 500 रुपये की जमानत राशि जमा कराकर पर्चा दाखिल करने में देरी नहीं लगाता था। ऐसे नेताओं की सोच सरकारी कागजों में अपना नाम दर्ज कराकर चर्चा में आने तक सीमित होती थी। उनकी सोच को खारिज करने के उद्देश्य से वर्ष 2000 से जमानत राशि दस गुणा बढ़ाकर पांच हजार रुपये कर दी गई है। चुनाव आयोग का मानना था कि जमानत राशि बढ़ाने के बाद बिना वजह चुनाव लड़ने वाले नेताओं की संख्या पर रोक लग सकेगी, लेकिन परिणाम चुनाव अधिकारियों की सोच के विपरीत आए हैं। वर्ष 2000 और 2005 के चुनाव में ही 961 आजाद उम्मीदवार मैदान में उतरे तथा 894 की जमानत राशि जब्त हो गई। अकेले निर्दलीय उम्मीदवारों की जब्त यह राशि करीब 45 लाख रुपये बैठती है। निर्दलीय उम्मीदवारों की जब्त जमानत राशि का यदि जिक्र नहीं भी किया जाए तो प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवार भी जमानत जब्त कराने में पीछे नहीं रहे हैं। वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में प्रमुख पार्टियों के 916 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और उनमें से 86 की जीत हुई जबकि 717 की जमानतें जब्त हो गई। इन नेताओं की जमानत जब्त होने संबंधी राशि करीब 35 लाख रुपये बैठती है। वर्ष 2005 में चुनाव आयोग के खाते में जमा जब्त जमानत राशि 40 लाख रुपये बताई जाती है, जबकि इसमें निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने से आई रकम शामिल नहीं है। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला और प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी सज्जन सिंह का जोर हालांकि चुनाव खर्च कम करने की तरफ है, मगर निर्दलीय और प्रमुख पार्टियों के नेताओं के चुनाव लड़ने के बढ़ते क्रेज से वह चिंतित भी हैं। सज्जन सिंह का मानना है कि चुनाव व्यवस्थाओं में सुधार किया जा रहा है। आयोग की कोशिश है कि कम खर्च में बेहतर परिणाम ले लिए जाएं। विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1967 में 294 ऐसे उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है, जो निर्दलीय तो नहीं थे, मगर प्रमुख पार्टियों के साथ-साथ क्षेत्रीय पार्टियों के बैनर तले उन्होंने जीत के लिए जनता के द्वार पर दस्तक दी। वर्ष 1968 में 212, 1972 में 206, 1977 में 466, 1982 में 874, 1987 में 1099 और वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में 134 प्रमुख उम्मीदवारों की जमानत जब्त कर उनकी राशि को चुनाव आयोग के खाते में जमा कराया गया है। वर्ष 1996 के चुनाव में 538, वर्ष 2000 में 717 और वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में 728 उम्मीदवारों को अपनी जमानत राशि जब्त करानी पड़ी है। इनमें निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने का आंकड़ा शामिल नहीं किया गया है। चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक जब जमानत राशि कम थी तब भी और अब राशि अधिक होने के बावजूद दावेदारों में चुनाव लड़ने का क्रेज बरकरार है।

महिला ने दिया तीन बच्चों को जन्म


मानसा( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : जिले के गांव कोटड़ा की 36 वर्षीय एक महिला ने यहां राजीव अस्पताल में एक साथ तीन बच्चों को जन्म दिया है, जिसमें एक लड़का व दो लड़कियां हैं। महिला सुखदीप कौर पहले भी दो लड़कियों की मां है। गरीब परिवार से संबंधित इस परिवार को दो लड़कियों के बाद फिर दो लड़कियां आने की बेहद खुशी है। राजीव अस्पताल मानसा की डा. मोनिका सिंगला ने बताया कि उक्त मां व उसके तीनों बच्चे बिल्कुल तंदरुस्त हैं, जिन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।उधर, सुखदीप कौर के पति गुरजंट सिंह का कहना है कि इसे परमात्मा का तोहफा समझकर उनकी खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं है।

यूजीसी ने दी सीडीएलयू को डेढ़ करोड़ रुपये जारी करने की स्वीकृति

सिरसा( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)-

चौ. देवीलाल विश्वविद्यालय पर यूजीसी की मेहरबानियां अंजाम तक पहुंचती दिखाई देने लगी है। सामान्य विकास सहायता स्कीम के तहत ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इस विश्वविद्यालय को डेढ़ करोड़ रुपये जारी करने की स्वीकृति प्रदान की है। यूजीसी द्वारा जारी की जा रही इस अनुदान राशि से चौ. देवीलाल विश्वविद्यालय का चहुमुखी विकास संभव हो सकेगा और विकास के विविध कार्यो को गति मिल सकेगी।

केंद्रीय अनुदान के लिए यूजीसी की धारा-12बी के तहत सूचीबद्ध होने के उपरांत चौ. देवीलाल विश्वविद्यालय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की उदारता सामने आने लगी है। आयोग की ओर से इस विश्वविद्यालय को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान जनरल डेवलपमेंट एसिस्टेस स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ रुपये की अनुदान राशि की स्वीकृति प्रदान की गई है। इससे पूर्व चौ. देवीलाल विश्वविद्यालय को एक करोड़ रुपये की राशि जारी की गई थी। इस तरह विश्वविद्यालय को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंतरिम आवंटन की 50 फीसदी की राशि जारी कर दी गई है। इस आशय की पुष्टि करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति डा. केसी भारद्वाज बताते है कि आयोग द्वारा मिली स्वीकृति से संदर्भित पत्र मिल गया है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि आने वाले कुछ दिनों में आयोग से स्वीकृत राशि विश्वविद्यालय को मिल जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से मिल रही सहायता राशि चौ. देवीलाल विश्वविद्यालय के चहुंमुखी विकास में सहायक साबित होगी। मालूम हो कि इस विश्वविद्यालय में भवनों के निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर हैं और आशा की जाती है कि यूजीसी की ओर से स्वीकृत राशि निर्माण कार्य को गति प्रदान करेगी।

खंड स्तरीय प्रदर्शनी प्रतियोगिता आयोजित

ओढा,( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)-
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के सभागार में खण्ड स्तरीय अध्यापन शिक्षण सामग्री की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। प्रदर्शनी का शुभारभ खंड शिक्षा अधिकारी मंजू जायसवाल ने किया। इस अवसर पर उन्होंने अध्यापक ग्राट में से प्रभावशाली शिक्षण सामग्री के निर्माण और अध्यापन के समय उनका प्रयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने अध्यापकों द्वारा प्रदर्शनी में उत्साह से भाग लेने के लिए प्रशसा की। प्राचार्य सुभाष फुटेला ने आए हुए अधिकारियों एवं प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत किया। प्रदर्शनी में प्रस्तुत मॉडलों का अवलोकन करने के बाद प्राचार्य सुभाष फुटेला, प्राचार्य बलजिन्दर सिंह, हरमेल सिंह, नीरज आहुजा ने सर्वश्रेष्ठ अध्यापक शिक्षा सामग्री को चुना। जिसमें प्राथमिक वर्ग में गणित विषय में जीपीएस जलालआना के हेमराज अरोड़ा को प्रथम, जीपीएस असीर से हरजिंदर सिंह को द्वितीय चुना गया तथा भाषा में तख्तमल स्कूल से मनोहर ने पहला व असीर से रजनी ने दूसरा स्थान पाया। पर्यावरण विषय पर प्रस्तुत प्रदर्शनियों में जीपीएस किंगरा के जोगिन्दरपाल कौर ने प्रथम, पिपली स्कूल से माया देवी ने द्वितीय और पर्यावरण-2 में जीपीएस तिगड़ी के जसपाल व जीपीएस किंगरा के रामअवतार ने पहला व दूसरा स्थान ग्रहण किया। उच्च प्राथमिक वर्ग द्वारा पेश की गई प्रदर्शनियों में भाषा में जीजीएचएस ओढा की अल्का रानी, जीएचएस जगमालवाली की मूर्ति देवी तथा गणित में जीएसएसएस ओढा के रजनीश अरोड़ा, पन्नीवाला मोटा स्कूल से मुरारी लाल और विज्ञान विषय में पिपली स्कूल के मनोज सिंगला, पन्नीवाला मोटा की पायल शर्मा ने क्रमवार पहला दूसरा स्थान प्राप्त किया। इसी तरह भूगोल में जीएचएस मिठड़ी की सुखवीर कौर ने प्रथम व जीएचएस देसू मलकाना की सुखजीत कौर द्वारा प्रदर्शित मॉडल ने द्वितीय स्थान हासिल किया। विद्यालय में इस आयोजन को सफल बनाने में महावीर मल्हान, रमेश कासल, जोगेन्द्र कुमार व मनोज कुमार आदि ने विशेष सहयोग दिया।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

चौधरियों की दमदार टक्कर


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- चौधरियों की दमदार टक्कर चुनाव रोचक दौर में पहुंच रहा है। पहले गठबंधन और अब कांग्रेस की टिकट का मसला सभी लोगों की निगाह में है। गठबंधन औंधे मुंह गिर चुके हैं और कांग्रेस की टिकट फाइनल नहीं हो पा रही हैं। भीतरी बनाम बाहरी का नारा बुलंद होने के बाद आलाकमान के सामने धर्मसंकट खड़ा हो रहा है कि क्या करें? लेकिन इन सभी बातों के बीच एक और मसला करो या मरो के दौर में पहुंच चुका है और वह है चौधरी ओम प्रकाश चौटाला तथा चौधरी बीरेंद्र सिंह के बीच की टक्कर का। इनेलो अध्यक्ष के ऐलान के बाद कि वह उचाना से चुनाव लड़ेंगे, सभी की निगाह जाटलैंड के इस इलाके की तरफ घूम चुकी है। चौटाला ने पिछली दफा उचाना के पड़ोस में बसे नरवाना और रोड़ी से किस्मत आजमाई थी। रोड़ी में वह जीत गए पर नरवाना से रणदीप सुरजेवाला के सामने उन्हें हार का सामना करना पड़ा। परीसीमन में दोनों क्षेत्र फंसने के बाद सभी देख रहे थे कि चौटाला कहां से चुनाव मैदान में उतरते हैं। उनके उचाना से मैदान में उतरने के ऐलान के बाद चौधरी बीरेंद्र के लिए मुश्किल बढ़ चुकी हैं। कोई और होता तो छोटू राम के नाती हरियाणा में घूम-घूमकर दूसरों की मदद भी कर सकते थे। अलबत्ता इस दफा उन्हें खुद को अपने हलके में सीमित करना पड़ेगा। उनके लिए मुश्किल इसलिए भी है कि कांग्रेस के ही बड़े नाम उनकी राह में रोड़ा अटका सकते हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से ही पार्टी में दो धड़े स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। बीरेंद्र के साथ शैलजा, किरण और राव इंद्रजीत हैं। बाकी जो बचे हैं वह सभी इस दोस्ताने के खिलाफ ही हैं। कहने वाले कहते हैं कि दोनों धड़े अपना जोर दिखाने का मौका जाया नहीं करने वाले, इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही ओम प्रकाश चौटाला ने उचाना से उतरने का फैसला किया। उनके लिए इससे ज्यादा मुफीद सीट और कोई हो भी नहीं सकती थी। हुड्डा को चुनौती देने में खतरा है तो कांग्रेस में और कोई नेता ऐसा नहीं जिससे वह आमने-सामने की लड़ाई लड़ें। आज वह अपने जीवन की बेहद अहम लड़ाई लड़ रहे हैं और अपने वर्कर्स को इस बात का एहसास कराना उनके लिए बेहद जरूरी है कि वह पहले की तरह से ही मजबूत हैं। किसी दमदार को पछाड़कर असेंबली पहुंचते हैं तो पार्टी और उनके यानी दोनों के कद में इजाफा हो सकता है। उधर, बीरेंद्र के लिए भी चुनाव रोचक हो चला है। इस बार जीते तो सोनिया गांधी तक वह कह सकने की स्थिति में होंगे कि, मैं मजबूत हूं। लोकसभा की टिकट अदने से जितेंद्र मलिक से गंवाने के बाद वह लगभग चुप से बैठे थे। उचाना में मिली जीत दिल्ली दरबार में उनका कद काफी ऊंचा कर देगी। परदे के पीछे के लोग कहते हैं कि कद में उतार-चढ़ाव की संभावनाएं उचाना के चुनाव में अहम रोल अदा करेंगी। पिछली दफा चौटाला नरवाना में रणदीप से चुनाव केवल इसी वजह से हार गए थे क्योंकि लोगों को एहसास हो चला था कि छोटे सुरजेवाला सीएम बनने की रेस में काफी आगे हो चले हैं। उनकी जेड सिक्योरिटी ने इस बात को पुख्ता किया। कांग्रेस जीतने की स्थिति में थी और जनता ने एक और सीएम से मिलने वाले फायदे के लालच में चौटाला को हरा दिया। कांग्रेस फिर मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है और इसी वजह से उचाना का चुनाव रोचक हो चला है। बीरेंद्र के पक्ष में उनके गृह क्षेत्र की बात के अलावा कांग्रेस की पोजीशन भी है। उनकी छवि एक ऐसे राजनीतिज्ञ की रही है जो बीच के रास्ते में विश्वास रखता है। उधर, चौटाला के पक्ष में सबसे मजबूत चीज उनका अपना नाम है। कांग्रेस के नेता (बीरेंद्र के विरोधी) चुनाव में उनकी कुछ तो मदद करेंगे ही। लोकसभा में इनेलो यह सीट जीत चुकी है और इसके साथ बीरेंद्र का सीएम की रेस से लगातार दूर होते जाना उनके लिए फायदेमंद होगा। एक तथ्य यह भी है कि भिवानी लोकसभा सीट में कांग्रेस की भितरघात अजय को फायदा नहीं पहुंचा पाई लेकिन श्रुति चौैधरी को सबसे ज्यादा फायदा इस बात का मिला था कि वह चौधरी बंसी लाल की वंश बेल हैं जिसे हर कोई बढ़ने से पहले खत्म कर देना चाहता है। केवल इस बात से ही दोनों के बीच की लड़ाई में श्रुति को सहानुभूति मिली। लेकिन उचाना में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा, ऐतिहासिक पुरुष सर छोटू राम के नाती व प्रदेश की राजनीति के सबसे एग्रेसिव जाट नेता के बीच की लड़ाई दमदार होगी? शैलेंद्र गौतम।

धक्कम-पेल में भी चली निर्दलीयों की रेल


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : हरियाणा के चुनावी इतिहास में आजाद प्रत्याशियों का अच्छा-खासा हस्तक्षेप रहा है। वह चुनाव आयोग के लिए (चुनाव खर्च और समय की बर्बादी के लिहाज से) सरदर्द हो सकते हैं लेकिन बड़े-बड़े दिग्गज भी उनसे डरते हैं। यही वजह है कि हर बार सैकड़ों आजाद उम्मीदवार चुनावी दंगल में उतरते हैं। हर बार बड़ी संख्या में निर्दलीय विधानसभा पहुंचते हैं। प्रत्याशियों की जमानत जब्त से आज तक निर्वाचन विभाग को मिली कुल राशि का 70 प्रतिशत हिस्सा आजाद उम्मीदवारों से ही सरकारी कोष में आया है। हर चुनाव में आजाद प्रत्याशियों ने ताल ठोंकी और अपनी अहमियत भी दिखाई। 1967 में हरियाणा के पहले विधानसभा चुनाव से लेकर 2005 के विधानसभा चुनाव तक 7384 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव में उतरे, पर 6990 की जमानत जब्त हो गई। प्रदेश के गठन के बाद से अब तक 93 निर्दलीय ही विधानसभा पहुंचे। यह आजाद विधायक विभिन्न अवसरों पर तत्कालीन राज्य सरकारों के लिए कभी सहयोगी बनकर सामने आए तो कभी उन्होंने प्रदेश में राजनीतिक संकट भी पैदा कर दिए हैं। आश्चर्यजनक पहलू यह है कि इन आजाद उम्मीदवारों का मत-प्रतिशत कई राष्ट्रीय पार्टियों से भी कई गुणा अधिक रहा है। 1967 के विधानसभा चुनाव में 260 आजाद उम्मीदवारों ने मोर्चा संभाला पर 196 जमानत गंवा बैठे और 16 उम्मीदवार जीत कर विधानसभा पहुंचे। उस समय इन आजाद उम्मीदवारों ने 32.67 प्रतिशत वोट हासिल कर रिकार्ड कायम किया था। 1968 के चुनाव में 161 निर्दलीयों ने चुनाव लड़ा, 129 की जमानत जब्त हुई और मात्र छह विधायक चुने गए। मत प्रतिशत भी घटकर 17.11 रह गया। 1972 के चुनाव में निर्दलीयों का मत प्रतिशत 23.54 प्रतिशत रहा। 207 ने किस्मत आजमाई, 170 की जमानत जब्त हुई, 11 विधायक चुने गए। 1977 में जनता पार्टी की लहर के कारण आजाद उम्मीदवारों का जलवा कुछ कम हुआ और राज्य में 439 निर्दलीय चुनावी अखाड़े में उतरे और सात विधायक चुने गए। इनका मत प्रतिशत बढ़कर 28.64 हो गया है। हालांकि 390 जमानत गंवा बैठे। 1982 के विधानसभा चुनाव में 835 आजाद प्रत्याशियों ने जनता के बीच दस्तक दी, मगर लोगों ने 796 की जनता ने जमानत जब्त करा दी। 1967 के इतिहास को दोहराते हुए 16 आजाद विधायक चुने गए, मगर उनका मत प्रतिशत कुछ घटकर 27.06 रह गया। 1987 में 1042 आजाद उम्मीदवारों में से 1017 जमानत गंवा बैठे और छह विधायक चुनकर आए। 1991 का चुनाव बेहद रोचक रहा। 1412 निर्दलीयों ने चुनाव लड़ा, लेकिन पांच ही जीत पाएा। 1397 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। इस बार रिकार्ड सबसे कम निर्दलीय विधानसभा पहुंचे। 1996 में सर्वाधिक 2067 आजाद उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और 10 विधायक बने। वर्ष 2000 में 519 निर्दलीयों में से 483 की जमानत जब्त हुई 11 विधायक बने। वर्ष 2005 के चुनाव में सिर्फ 442 आजाद उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा जिसमें से 411 की जमानत जब्त हो गई और 10 विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे।

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