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बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

अन्ना की कांग्रेस के खिलाफ अपील का इनेलो ने किया स्वागत

डबवाली --इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला ने अन्ना हजारे द्वारा हिसार में कांगे्रस को वोट दिए जाने की अपील का स्वागत करते हुए कहा कि इनेलो हमेशा से ही इस बात की पक्षधर रही है कि भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए जनलोकपाल बिल को संसद में पारित किया जाए और विदेशों में जमा कालेधन को भी वापस लाने के साथ-साथ राईट टू रिकॉल और राईट टू रिजेक्ट बिल भी लाया जाए। उन्होंने कहा कि इनेलो राज्यकार्यकारिणी इनेलो विधायकदल की बैठक में इस संबंध में प्रस्ताव पारित करके रामलीला मैदान में शुरू किए गए आंदोलन के दौरान पार्टी अध्यक्ष की ओर से टीम अन्ना को एक पत्र भी भेजा था और इस पत्र को इनेलो के राज्यसभा सांसद रणवीर प्रजापत स्वयं रामलीला मैदान जाकर टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल को सौंप कर आए थे। उन्होंने कहा कि इनेलो ने इस मुद्दे को हरियाणा विधानसभा में भी उठाया था और विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया था कि राज्य विधानसभा एक प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेजे, लेकिन कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित करने की बजाए इनेलो के सभी सदस्यों को विधानसभा सत्र की शेष पूरी अवधि के लिए निलम्बित कर दिया। इसके बावजूद इनेलो के सभी निलम्बित 31 विधायकों ने विधानसभा के बाहर सामान्तर सत्र आयोजित कर जनलोकपाल बिल पर चर्चा करवाई और इस बिल को पारित किए जाने की मांग करते हुए केंद्र सरकार को एक प्रस्ताव भी भेजा। चौटाला ने कहा कि हिसार लोकसभा उपचुनाव की घोषणा होने के बाद इनेलो की ओर से जनलोकपाल बिल का समर्थन करने संबंधी एक पत्र पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक अरोड़ा पूर्व सांसद तरलोचन सिंह के नेतृत्व में पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल टीम अन्ना की अहम सदस्य किरण बेदी को स्वयं जाकर सौंप कर आया। उन्होंने कहा कि इनेलो के संस्थापक पूर्व उपप्रधानमंत्री स्व. देवीलाल राईट टू रिकाल कानून बनाए जाने के सबसे ज्यादा हिमायती रहे हैं और उन्होंने ही सबसे पहले इस अवधारणा को देश के समक्ष रखा था।

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

अन्ना टीम को लडऩा ही पड़ेगा ससंदीय चुनाव

महावीर सहारण (9354862355)
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अन्ना हजारे के सफल अनशन समापन पर अभी देशभर में जश्र का माहौल जारी है लेकिन देशवासियों को जो उम्मीद इस दौरान बंधी है क्या यह अपने अंजाम तक पहुंच पाएगी और अन्ना टीम को भविष्य में क्या रणनीति बनानी होगी यह महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्र आज सबके सामने है।
अन्ना हजारे के जनआंदोलन को देशभर से बेमिसाल स्वतस्फूर्त जन समर्थन मिलना यह जाहिर कर गया कि भारतवासी भ्रष्टाचार रूपी राक्षस से किस कद्र परेशान है। हमेशा की तरह सता के घोड़े पर सवार सतारूढ़ दल के रणनीतिकार यह अंदाजा लगाने में पूरी तरह से चूक गए कि जन लोकपाल बिल का आंदोलन केवल मात्र मीडिया द्वारा प्रचारित किया गया नहीं है। बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस प्रकार से कुचला गया उससे कांग्रेस में कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम धड़ा हावी था लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं था कि बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन का मुख्य हथियार लाखों करोड़ों रूपए का काला धन विदेशों से भारत लाने को बनाया और यह बात जग जाहिर है कि अगर यह काला धन देश में आता भी है तो प्रत्यक्ष इससे किसी देशवासी को कोई लाभ नहीं दिख रहा था। जबकि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार से पीडित आम आदमी की नब्ज को पकड़ा तथा जनमानस यह भी समझने में सफल रहा कि सही कानून के आने से निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पर व्यापक अंकुश लगने की संभावना नकारी नहीं जा सकती। क्योंकि सूचना अधिकार कानून व लोकायुक्त के कर्नाटक मुख्यमंत्री प्रकरण से यह लगने लगा है कि सही कानून का क्रियानवन प्रभावशाली साबित हो सकता है। दूसरे बाबा रामदेव द्वारा सन्यासी होते हुए 1200 करोड़ का आर्थिक सम्राज्य स्थापित किया जाना जबकि अन्ना हजारे का मंदिर में प्रवास करना दोनों आंदोलनों को मिले जन समर्थन में अंतर पैदा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ। रही सही कसर कांग्रेस प्रवक्ता मनीश तिवारी द्वारा साफ सुथरे व्यक्तित्व के धनी अन्ना हजारे को भ्रष्ट साबित करने के असफल प्रयासों ने पूरी कर दी। केंद्र सरकार के रणनीतिकार अन्ना हजारे को जेल से मजबूरीवश रिहा करने के बाद भी जन आंदोलन की तीव्रता को समझ नहीं पाए तथा रामलीला मैदान में पहुंचे लोगों के बारे में यह सोचकर निश्चित हो गए कि यह भीड़ एक-दो दिन बाद थक हार कर अपने-अपने घर चली जाएगी। लेकिन दिनबदिन रामलीला मैदान पर देशभर से आंदोलनकारियों का हजूम बढ़ता ही गया। तब जाकर इन लोगों के हाथ पांव फूलने शुरू हुए तथा इन्होंने हार नहीं मानी व सिविल सोसायटी के सदस्यों को संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देने का प्रचार आरंभ कर दिया। यह दाव भी जब उल्टा पड़ता दिखा तो आखिरकार दलित, पिछड़ा वर्ग से टीम अन्ना की दूरियां बढ़ाने का कुप्रयास भी किया गया। जिसकी बानगी पूरे देश ने संसद में बहस दौरान सपष्ट रूप से देखी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिन नेताओं की दलित व पिछड़ा वर्ग वोट बैंक से राजनीतिक दुकान चल रही है उन्हें भी मालूम है कि भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा पीडि़त तो दलित व पिछड़ा वर्ग ही है। चूंकि मध्य वर्ग तो पैसे के बल पर अपने काम धंधे फिर भी करवा लेता है लेकिन दलित व पिछड़ा वर्ग की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनकी दुविधा ज्यादा है। इस घटनाक्रम में टीम अन्ना को मिले जबरदस्त जन समर्थन के बावजूद ये तानाकशी सुनने को मिली कि 'चुनाव जीतकर आओ व संसद में बैठकर कानून बनाओंÓ और यह बोली कोई दबे तो कोई खुले स्वर में हर राजनीतिक दल की थी।
वे शायद आसाम का उदहारण भूल चुके हैं जब विद्यार्थियों ने आंदोलन उपरांत चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लिया व असमगण परिषद पार्टी का गठन किया तथा तमाम राजनीतिक दलों को धूल चटाते हुए प्रफूल कुमार महंत प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें। वहीं आंध्रप्रदेश में अभिनेता से एकाएक राजनीति में उतर कर एनटी रामाराव ने तेलगुदेशम पार्टी का गठन किया व दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाई। ऐसी ही स्थिति 1977 में आपात काल उपरांत लोकसभा चुनाव में बनी जब जनता पार्टी ने सता पर कब्जा जमा लिया। हालांकि उसमें ज्यादातर अन्य पार्टियों से आए राजनीतिज्ञ शामिल थे। अब अन्ना हजारे पूरे देश में भ्रमण कर रहे है तथा उन्हें व टीम अन्ना को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि संसदीय प्रणाली के मुताबिक देश वासियों से वे जन समर्थन मांगे तथा आने वाले लोकसभा चुनाव में खुद जैसे प्रत्याशी उतारे ताकि मौजूदा संसद में पहुंचे हुए सदस्यों को भी अहसास हो जाए कि अन्ना हजारे को ठोस जन समर्थन प्राप्त है व अन्ना हजारे देश के प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित होते है तो देश वासियों के लिए इससे बड़ा सौभाग्य और कोई नहीं हो सकता। आखिर कब तक एक-एक जन लोक कल्याणकारी कानून को बनवाने के लिए अन्ना हजारे को अनशन पर बैठना पड़ता रहेगा।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अन्ना समर्थकों का संघर्ष जारी

डबवाली (यंग फ्लेम) जहां केंद्र सरकार जन लोकपाल बिल पास करने के लिए आनाकानी कर रही है। वहीं अन्ना हजारे के समर्थकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। महिलाओं एवं पुरूषों के अलावा अब छोटे बच्चे भी जन लोकपाल बिल के समर्थन सड़कों पर उतर आए है। इसी कड़ी में जन लोकपाल बिल को संसद में पास करवाकर कानून बनवाने के समर्थन में आज स्थानीय बिश्रोई सभा के सदस्यों ने सरकार के खिलाफ रोष प्रदर्शन किया। बिश्रोई सभा के सदस्य आज बिश्राई धर्मशाला में एकत्रित और वहां से एक जलूस की शक्ल में स्थानीय कोर्ट कॉम्पलैक्स में स्थित एसडीएम कार्यालय पहुंचे। जहां पर उन्होंने एसडीएम मुनीश नागपाल की मार्फत राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपा। जिसमें बिश्रोई सभा द्वारा जन लोकपाल बिल को कानून बनाने की अपील की गई। ताकि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके। इस अवसर पर जीव रक्षा के प्रधान सुरेंद्र कुमार, अनिल कुमार, राम दलीप, दलीप चंद, सुलेश कुमार, राम कुमार, कृष्ण कुमार पूनियां, जगदीश, हेमराज के अलावा बिश्रोई सभा के अन्य सदस्य उपस्थित थे। उधर, अन्ना हजारे के समर्थन में जीटी रोड एसोसिएशन के सदस्यों सुखविंद्र सिंह 'काला जापानीÓ, आर के नीना, प्रमोद कुमार कोछड़, संजय मैहता, जसबीर सिंह अन्य ने आज से जीटी रोड पर अनशन शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि जब तक केंद्र सरकार लोकपाल बिल पास नहीं कर देती उनका आंदोलन जारी रहेगा। उधर, स्थानीय वार्ड 15 में सभी गली वसियों और बच्चों ने अन्ना के समर्थन में कैंडल मार्च किया। इस कैंडल मार्च में महिलाओं पुरूषों के अलावा बच्चों ने भी भारी संख्या में भाग लिया। जिसमें रमेश कुमार, रोशन कुमार, गोगी, शांती देवी, कंचन, अंगूरी देवी, शंकुतला, सीमा, किरण, बिमला, सुंदरी, नीलम के अलावा विशाल, अभिषेक, कोमल, प्रियंका, ललित, सूरज, अंजू, मंगू, सुमन, तनु, काकी, रोहित, नेहा, योगित, दीपा, कविता, स्नेहा एवं गीता के अवाला अन्य बच्चों, महिलाओं पुरूषों ने भाग लिया।











हर शहर में टीम अन्ना की जरूरत

भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में बगावत शुरू हो गई है। अन्ना हजारे व उनकी टीम ने लोगों को विरोध की जो राह दिखाई, उस पर आम व खास यहां तक की बच्चे भी चल पड़े हैं। मुद्दा ही ऐसा है कि हर कोई स्व स्फुर्ति से इस मुहिम से जुड़ रहा है। अन्ना टीम व लोगों का विरोध जायज भी है। आज ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है। संतरी से मंत्री तक भ्रष्टाचार रूपी बुराई को बढ़ावा दे रहे हैं। हो सकता है कि कुछ अधिकारी-कर्मचारी भ्रष्टाचार से दूर है और अब वे भी अन्ना का साथ दे रहे हैं मगर हकीकत तो यह है कि भ्रष्टाचार से कोई भी महकमा अछूता नहीं है। काम के बदले रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि काम के लिए बार-बार चक्कर लगवाना भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। जनता की समस्याओं की ओर ध्यान न देना या जनता को किसी भी तरह से परेशान करना, भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। इस तरह के भ्रष्टाचार से जनता को स्थानीय स्तर पर रोजाना दो-चार होना पड़ता है। अधिकारियों को शिकायत करने के बाद ही जब कोई हल नहीं निकलता है तो जाहिर है जनता के दिल में गुस्सा पैदा होगा।
यह गुस्सा लंबे समय से पैदा हो रहा था मगर उसे व्यक्त करने का उचित माध्यम व मंच नहीं मिल रहा था, मगर अन्ना हजारे व उनकी टीम ने वह मंच उपलब्ध करा दिया है। उसी का परिणाम है कि गली-गली, गांव-गांव में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की आवाज मुखर हो रही है। लग रहा है कि जनता जाग चुकी है। जनता में परिवर्तन अंगड़ाई ले रहा है जो निश्चित ही शुभ संकेत हैं। जरूरत इस बात की भी है कि गांव-गांव शहर-शहर में भी अन्ना हजारे व अन्ना टीम पैदा हो। युवाओं को एक ऐसा संगठन बनाना होगा जो बिना किसी लोभ-लालच के जनता की समस्याओं की अनदेखी करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ अहिंसा के माध्यम से आंदोलन करे। यदि ऐसा हो गया तो निश्चित रूप से वर्षों से स्थानीय स्तर पर फैला भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। अब बदलाव की बारी निठल्ले, कामचोर व भ्रष्टा अधिकारियों-कर्मचारियों की है। उन्हें अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव लाना होगा अन्यथा जनता उन्हें माफ करने के मूड में नहीं है।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

खुद अपनी कब्र खोद रही है सरकार

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के अभियान की आवाज को दबाने के लिए सत्ताधारी यूपीए की प्रक्रिया और कार्रवाई से उसके थिंक टैंक का मानसिक दिवालियापन सामने आ गया है। मुझे पता नहीं है कि सरकार में पर्दे के पीछे क्या चल रहा है। लेकिन दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में अन्ना के समर्थकों पर जिस अभूतपूर्व तरीके से धावा बोला गया उससे साफ है कि सरकार गंवा चुकी चीजों को पाने के लिए बेसब्र है। हालांकि उसे इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है कि आगे कैसे बढ़ा जाए। ऐसा करके सरकार न सिर्फ अन्ना के व्यक्तित्व को 'लार्जर दैन लाइफÓ बना रही है, बल्कि इस मामले में अब तक किनारे से तमाशा देख रहे लोगों को भी अन्ना के खेमे में जाने के लिए मजबूर कर रही है।
अन्ना के जनलोकपाल बिल के कई प्रावधानों को लेकर मेरे भी मन में पूर्वाग्रह हैं। उन मुद्दों पर अरविंद केजरीवाल से मेरी लंबी चर्चा भी हुई है। यह विचार-विमर्श इस मुद्दे पर था कि प्रावधानों को हकीकत में लागू करना संभव है या नहीं। हालांकि, इस प्रक्रिया में मुझे ऐसा लगा कि इसे और परिष्कृत किया जा सकता है। उचित विचार-विमर्श इन मतभेदों को दूर किया जा सकता था और एक विश्वसनीय व व्यावहारिक बिल संसद में पेश किया जा सकता था। लेकिन सरकार ने अप्रैल में छल से अन्ना हजारे का अनशन तुड़वा दिया। उस समय सरकार ने जॉइंट ड्राफ्टिंग कमिटी बनाने का वादा किया और निर्लज्जता से अपनी कुटिल चालों को चलना शुरू कर दिया।
मैं पहले भी बहुत बार कह चुका हूं कि इस सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जब सरकार ने यह वादा किया था कि वह सिविल सोसायटी के सदस्यों के साथ मिलकर मजबूत लोकपाल बिल पर काम करेगी तब क्यों? क्योंकि इस सरकार में बहुत से ऐसे लोग हैं जो बहुत ज्यादा होशियार हैं और सोचते हैं कि उनके अलावा और कोई नहीं है जो इस मुद्दे का हल कर सके। लेकिन ऐसा उस समय तो हो सकता था जब देश में 24&7 मीडिया का युग नहीं था, और न ही सोशल मीडिया इतने बड़े पैमाने पर मौजूद था। खास बात यह है कि यह सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की भीड है, जो इतनी होशियार है कि अपने तीखी कॉमेंट्स से गहरा वार कर सकती है। इसलिए यह स्वाभाविक था कि इन्हें समय से पहले अलग कर दिया जाए।
पिछले दो दिनों में सरकार ने जिस तरह से काम किया है, उससे साफ झलकता है कि सरकार में हताशा बढ़ रही है। कोई भी यह समझ सकता है कि स्वतंत्रता दिवस के आसपास सुरक्षा और आतंकी खतरे के मद्देनजऱ वैसे ही हालात काफी गंभीर रहते हैं, लेकिन सरकार ने जो किया वह निहायत ही बेवकूफाना है। कोई भी यह कह सकता है कि तीन दिन में अनशन समाप्त कर दिया जाए और अनशन स्थल के पास 50 से ज्यादा कारें एकत्र न हों? भगवान के लिए यह समझने की कोशिश कीजिए कि यह बड़े पैमाने का व्यापक विरोध-प्रदर्शन है। और ऐसा नहीं है कि इस विरोध-प्रदर्शन का फैसला अचानक से किया गया। इस विरोध-प्रदर्शन की तारीख का महीनों पहले ही ऐलान किया जा चुका था और सरकार के पास पर्याप्त समय था कि वह प्रदर्शन की जगह और दूसरे व्यवस्थाओं के बारे में फैसला करती।
सरकार के प्रति निराशाजनक चिंता और अधिक बढ़ गई क्योंकि दो दिन पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अन्ना पर पूरी तरह से बेतुका पर्नसल अटैक किया था। उनके वाकपटु प्रवक्ता (जिन्हें कैबिनेट फेरबदल में मंत्री बनाए जाने की कवायद थी लेकिन पिछले कुछ ही महीनों के भीतर हुए फेरबदल में दोनों बार वे नहीं बन सके) को अन्ना को करप्ट बताने के लिए मजबूरी में 8 साल पुरानी रिपोर्ट निकलवानी पड़ी।
ये पूरी की पूरी चाल खुद सरकार के ही मत्थे पड़ गई और इस बात का अहसास सरकार को तब हुआ जब हर कोई कांग्रेस के इस वक्त्व्य के खिलाफ जली-कटी सुनाने के मूड में आ गया। यहां तक कि बड़बोले दिग्विजय सिंह ने भी कहा कि अन्ना के खिलाफ कुछ है ही नहीं। लेकिन, हमेशा की तरह, उन्होंने खुद ही अपनी बात काट डाली और कहा कि अरविन्द केजरीवाल करप्ट हैं। मुझे यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि अगर अरविन्द करप्ट हैं तो इस देश में कोई भी व्यक्ति साफ-सुथरा नहीं है।
यह वह समय है जब सरकार को यह पता चल चुका है कि या तो उसके विभागों की गंदी चालबाजियों के दिन पूरे हो गए हैं या फिर उन्हें अपनी रणनीति बदल लेने की जरूरत है। जब करप्शन के कैंसर को नियंत्रित करने के लिए आंदोलन चल रहा है, तो इसे राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रयोग किया जा सकता है। सिर्फ कुछ लोगों के लालच के चलते आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस राज्य में कन्वर्ट हो जाना उन लोगों को एकदम पृथक ही करेगा। इस सरकार ने करप्शन रोकने के लिए कुछ विश्वसनीय कर गुजरने के सुनहरे मौके को गंवा दिया है। किसी अत्याचारी राज्य की तरह काम करने से यह खुद अपनी ही कब्र खोद रही है।

अन्ना की आंधी पंहुची डबवाली,रोष प्रदर्शन किया

डबवाली (यंग फ्लेम) अन्ना हजारे की गिरफ्तारी की खबर जैसे ही फैली भारी संख्या में उनके समर्थक सड़कों पर उतरने लगे। जो सड़कों पर नहीं उतर पाए उन्होंने इंटरनेट के जरिए अपने गुस्से और अन्ना के प्रति समर्थन का इजहार किया। जहां पूरे देश में अन्ना की आंधी चल रही है वहीं डबवाली में भी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए है और वंदे मातरम के नारे लगाते हुए मुख्य बाजार से काफीले के रूप में सड़कों से होते हुए एसडीएम कार्यालय पहुंचे। वहां पर उन्होंने एसडीएम मुनीश नागपाल के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। जिसमें उन्ना हजारे उनके समर्थकों को गैरकानूनी से हिरासत से रिहा करने लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की मांग की गई। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनआंदोलन चला रहे गांधीवादी नेता अन्ना हजारे उनके समर्थकों के खिलाफ जिस प्रकार से दमन की कार्यवही की जा रही है उससे हम देशवासी बेहद आहत है। भ्रष्टाचार देश के लिए कलंक है। ऐसे में भ्रष्टाचार मिटाने वाले अन्ना हजारे ने जो जन लोकपाल बिल पेश किया है उसे संसद में मंजूर करने की मांग की। इस मौके पर वियोगी हरि शर्मा, राम कुमार सोनी, राजेश हाकू, संजीव शाद, हरि प्रकाश शर्मा, जितेंद्र खेरा, सुभाष सेठी, सतीश जैन अन्य लोग ने रोष मार्च में हिस्सा लिया।



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