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शुक्रवार, 23 मार्च 2012

MARCH 23RD TRIBUTE TO BHAGATH SINGH, RAJGURU, SUKHDEV



An indebted nation pays rich tribute to its martyrs Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru who sacrificed their lives for the country on March 23, 1931. March 23 is observed as Martyrs’ Day to remember the significant contribution of Bhagat Singh, Sukhdev, Rajguru and other important revolutionaries, who paved the way for the independence of the country.

Whenever we recall the freedom struggle in India, the sacrifice of Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru will automatically comes to our mind. They were great patriots of the country who had launched an effective struggle to root out the British rule from the country. They undergone a lot of hardships and sacrificed their lives for the motherland. They were the real sons of this soil and fought till death, without giving up before the oppressing British rule. Many followed their footsteps and further accelerated the freedom movement, which ultimately culminated into Independence. It was only because of their sacrifices that our country has attained its present status.

“Bhagat Singh, along with Sukhdev and Rajguru were hanged to death on March 23, 1931.On his way to gallows he said to the officer, you are very fortunate to witness how revolutionaries smilingly embrace death for the love of their country. “Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru will be remembered forever for their selfless service to the mother India. They took up the armed struggle, and fought against the British administration, but they never caused any harm to the common people. They fought for the people and for the freedom. The heroic spirit of Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev is an unfailing source of inspiration for the youth of the country. These three inspired the theme of young and modern India and millions of youths in the country see them as icons and role models even today. Their contribution, ideals, slogans and thoughts are as relevant today as they were earlier. Their courage, spirit of adventure and patriotism are an example to be followed by one and all.”

We are very fortunate and we should be proud that we are born in this great country where brave youth like Shaheed Bhagat Singh, Shaheed Sukhdev, and Shaheed Rajguru sacrificed their lives for the sake of our freedom. The sacrifices of such great people could not be ignored, which had secured freedom for the country and its people. We have to learn a lot from the life of Shaheed Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru. We should also imbibe the qualities of the great martyr in their day to day life.

Take a pledge on this day and always to protect the hard earned freedom of the country at any cost and frustrate the evil design of the forces that are bent upon to destroy the integrity of our country. Shun evils like Dowry, poverty, gender inequality, drugs, human inequality, child labour, prostitution, and many more. Every individual needs to take steps in order to make India a better place to live. Come on; let’s help to make a clean and green country, and work for national integrity and peace for the development of the country”. “This would be the true tribute to our martyrs,

My mind raced back to my school days when I learnt a Hindi poem by Pt. Makhanlal Chaturvedi called "PUSHP KI ABHILASHA".The lines of the poem have got etched in my mind. The poem accurately represents the pride and passion for the nation. I find these lines very close to my heart. This poem tells us dedication and patriotism towards our country. The stanza of the poems are really soul stirring. Salute to him who wrote these lines and salute to them who shed their blood for our great motherland

Pushp Ki Abhilasha

Chah Nahin Mai SurBala Ke
Gehnon Mein Guntha Jaaon
Chah Nahin Premi Mala Mein
Bindh, Pyari Ko Lalchaon
Chah Nahin Samraton Ke
Shav Par, He Hari Dala Jaaon
Chah Nahin Devon Ke Sar Par
Chadhon, Bhagya Par Itraoon
Mujhey Tod Lena Banmali,
Us Path Par Tum Dena Phaink
Matra Bhoomi Per Sheesh Chadhaney,
Jis Path Jaayen Veer Anek
Translation:
The Yearning (desire) of a Flower

I don't want to be a part of the necklace of the beautiful girl,I don't want to woo the lady love,I don't want to be spread over dead bodies,I don't want to act snob, after someone offers me to the Gods.
Just pluck me Gardner and throw me on the road,which is taken by the brave soldiers to give away their lives for the Motherland !

I pray for the flower’s wish to be granted.*Peace*

How great were those patriots, How great was their pride, For those who sacrificed their lives for the motherland.

Let us pay our rich tributes to the martyrs.

Perhaps this tribute of mine won't be able to add anything new or glorious to their life but yet my heart rending love & respect and it shall remain till the last breath.

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

हर शहर में टीम अन्ना की जरूरत

भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में बगावत शुरू हो गई है। अन्ना हजारे व उनकी टीम ने लोगों को विरोध की जो राह दिखाई, उस पर आम व खास यहां तक की बच्चे भी चल पड़े हैं। मुद्दा ही ऐसा है कि हर कोई स्व स्फुर्ति से इस मुहिम से जुड़ रहा है। अन्ना टीम व लोगों का विरोध जायज भी है। आज ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है। संतरी से मंत्री तक भ्रष्टाचार रूपी बुराई को बढ़ावा दे रहे हैं। हो सकता है कि कुछ अधिकारी-कर्मचारी भ्रष्टाचार से दूर है और अब वे भी अन्ना का साथ दे रहे हैं मगर हकीकत तो यह है कि भ्रष्टाचार से कोई भी महकमा अछूता नहीं है। काम के बदले रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि काम के लिए बार-बार चक्कर लगवाना भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। जनता की समस्याओं की ओर ध्यान न देना या जनता को किसी भी तरह से परेशान करना, भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। इस तरह के भ्रष्टाचार से जनता को स्थानीय स्तर पर रोजाना दो-चार होना पड़ता है। अधिकारियों को शिकायत करने के बाद ही जब कोई हल नहीं निकलता है तो जाहिर है जनता के दिल में गुस्सा पैदा होगा।
यह गुस्सा लंबे समय से पैदा हो रहा था मगर उसे व्यक्त करने का उचित माध्यम व मंच नहीं मिल रहा था, मगर अन्ना हजारे व उनकी टीम ने वह मंच उपलब्ध करा दिया है। उसी का परिणाम है कि गली-गली, गांव-गांव में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की आवाज मुखर हो रही है। लग रहा है कि जनता जाग चुकी है। जनता में परिवर्तन अंगड़ाई ले रहा है जो निश्चित ही शुभ संकेत हैं। जरूरत इस बात की भी है कि गांव-गांव शहर-शहर में भी अन्ना हजारे व अन्ना टीम पैदा हो। युवाओं को एक ऐसा संगठन बनाना होगा जो बिना किसी लोभ-लालच के जनता की समस्याओं की अनदेखी करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ अहिंसा के माध्यम से आंदोलन करे। यदि ऐसा हो गया तो निश्चित रूप से वर्षों से स्थानीय स्तर पर फैला भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। अब बदलाव की बारी निठल्ले, कामचोर व भ्रष्टा अधिकारियों-कर्मचारियों की है। उन्हें अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव लाना होगा अन्यथा जनता उन्हें माफ करने के मूड में नहीं है।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

खुद अपनी कब्र खोद रही है सरकार

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के अभियान की आवाज को दबाने के लिए सत्ताधारी यूपीए की प्रक्रिया और कार्रवाई से उसके थिंक टैंक का मानसिक दिवालियापन सामने आ गया है। मुझे पता नहीं है कि सरकार में पर्दे के पीछे क्या चल रहा है। लेकिन दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में अन्ना के समर्थकों पर जिस अभूतपूर्व तरीके से धावा बोला गया उससे साफ है कि सरकार गंवा चुकी चीजों को पाने के लिए बेसब्र है। हालांकि उसे इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है कि आगे कैसे बढ़ा जाए। ऐसा करके सरकार न सिर्फ अन्ना के व्यक्तित्व को 'लार्जर दैन लाइफÓ बना रही है, बल्कि इस मामले में अब तक किनारे से तमाशा देख रहे लोगों को भी अन्ना के खेमे में जाने के लिए मजबूर कर रही है।
अन्ना के जनलोकपाल बिल के कई प्रावधानों को लेकर मेरे भी मन में पूर्वाग्रह हैं। उन मुद्दों पर अरविंद केजरीवाल से मेरी लंबी चर्चा भी हुई है। यह विचार-विमर्श इस मुद्दे पर था कि प्रावधानों को हकीकत में लागू करना संभव है या नहीं। हालांकि, इस प्रक्रिया में मुझे ऐसा लगा कि इसे और परिष्कृत किया जा सकता है। उचित विचार-विमर्श इन मतभेदों को दूर किया जा सकता था और एक विश्वसनीय व व्यावहारिक बिल संसद में पेश किया जा सकता था। लेकिन सरकार ने अप्रैल में छल से अन्ना हजारे का अनशन तुड़वा दिया। उस समय सरकार ने जॉइंट ड्राफ्टिंग कमिटी बनाने का वादा किया और निर्लज्जता से अपनी कुटिल चालों को चलना शुरू कर दिया।
मैं पहले भी बहुत बार कह चुका हूं कि इस सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जब सरकार ने यह वादा किया था कि वह सिविल सोसायटी के सदस्यों के साथ मिलकर मजबूत लोकपाल बिल पर काम करेगी तब क्यों? क्योंकि इस सरकार में बहुत से ऐसे लोग हैं जो बहुत ज्यादा होशियार हैं और सोचते हैं कि उनके अलावा और कोई नहीं है जो इस मुद्दे का हल कर सके। लेकिन ऐसा उस समय तो हो सकता था जब देश में 24&7 मीडिया का युग नहीं था, और न ही सोशल मीडिया इतने बड़े पैमाने पर मौजूद था। खास बात यह है कि यह सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की भीड है, जो इतनी होशियार है कि अपने तीखी कॉमेंट्स से गहरा वार कर सकती है। इसलिए यह स्वाभाविक था कि इन्हें समय से पहले अलग कर दिया जाए।
पिछले दो दिनों में सरकार ने जिस तरह से काम किया है, उससे साफ झलकता है कि सरकार में हताशा बढ़ रही है। कोई भी यह समझ सकता है कि स्वतंत्रता दिवस के आसपास सुरक्षा और आतंकी खतरे के मद्देनजऱ वैसे ही हालात काफी गंभीर रहते हैं, लेकिन सरकार ने जो किया वह निहायत ही बेवकूफाना है। कोई भी यह कह सकता है कि तीन दिन में अनशन समाप्त कर दिया जाए और अनशन स्थल के पास 50 से ज्यादा कारें एकत्र न हों? भगवान के लिए यह समझने की कोशिश कीजिए कि यह बड़े पैमाने का व्यापक विरोध-प्रदर्शन है। और ऐसा नहीं है कि इस विरोध-प्रदर्शन का फैसला अचानक से किया गया। इस विरोध-प्रदर्शन की तारीख का महीनों पहले ही ऐलान किया जा चुका था और सरकार के पास पर्याप्त समय था कि वह प्रदर्शन की जगह और दूसरे व्यवस्थाओं के बारे में फैसला करती।
सरकार के प्रति निराशाजनक चिंता और अधिक बढ़ गई क्योंकि दो दिन पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अन्ना पर पूरी तरह से बेतुका पर्नसल अटैक किया था। उनके वाकपटु प्रवक्ता (जिन्हें कैबिनेट फेरबदल में मंत्री बनाए जाने की कवायद थी लेकिन पिछले कुछ ही महीनों के भीतर हुए फेरबदल में दोनों बार वे नहीं बन सके) को अन्ना को करप्ट बताने के लिए मजबूरी में 8 साल पुरानी रिपोर्ट निकलवानी पड़ी।
ये पूरी की पूरी चाल खुद सरकार के ही मत्थे पड़ गई और इस बात का अहसास सरकार को तब हुआ जब हर कोई कांग्रेस के इस वक्त्व्य के खिलाफ जली-कटी सुनाने के मूड में आ गया। यहां तक कि बड़बोले दिग्विजय सिंह ने भी कहा कि अन्ना के खिलाफ कुछ है ही नहीं। लेकिन, हमेशा की तरह, उन्होंने खुद ही अपनी बात काट डाली और कहा कि अरविन्द केजरीवाल करप्ट हैं। मुझे यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि अगर अरविन्द करप्ट हैं तो इस देश में कोई भी व्यक्ति साफ-सुथरा नहीं है।
यह वह समय है जब सरकार को यह पता चल चुका है कि या तो उसके विभागों की गंदी चालबाजियों के दिन पूरे हो गए हैं या फिर उन्हें अपनी रणनीति बदल लेने की जरूरत है। जब करप्शन के कैंसर को नियंत्रित करने के लिए आंदोलन चल रहा है, तो इसे राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रयोग किया जा सकता है। सिर्फ कुछ लोगों के लालच के चलते आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस राज्य में कन्वर्ट हो जाना उन लोगों को एकदम पृथक ही करेगा। इस सरकार ने करप्शन रोकने के लिए कुछ विश्वसनीय कर गुजरने के सुनहरे मौके को गंवा दिया है। किसी अत्याचारी राज्य की तरह काम करने से यह खुद अपनी ही कब्र खोद रही है।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

अब कम करो पेट्रोल-डीजल के दाम: अजय सिंह

डबवाली (यंग फ्लेम) इनेलो ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट के चलते यूपीए सरकार से पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस व मिट्टी के तेल की कीमतें तुरंत घटाए जाने की मांग की है। इनेलो के प्रधान महासचिव व डबवाली के विधायक डॉ. अजय सिंह चौटाला ने कहा कि यूपीए सरकार ने पिछले साल पेट्रोल की कीमतों को सरकारी मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से बाहर करते हुए देशवासियों को यह भरोसा दिया था कि कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के आधार पर अब पेट्रोल के मूल्य तय हुआ करेंगे। इसी के चलते पिछले साल 26 जून से लेकर इस साल मई तक पेट्रोल की कीमतों में नौ बार इजाफा करते हुए करीब 16 रुपए प्रति लीटर पेट्रोल की कीमतें बढ़ा दी गई थी। इतना ही नहीं इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का बहाना लेकर कई बार डीजल, रसोई गैस व मिट्टी के तेल की कीमतें बढ़ाकर आम उपभोक्ता पर न सिर्फ अरबों रुपए का अतिरिक्त बोझ डाला गया बल्कि महंगाई की मार झेल रहे गरीब आदमी की पूरी तरह से कमर तोड़ दी गई। डॉ. अजय सिंह चौटाला ने कहा कि पिछले एक पखवाड़े के दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल से घटकर मात्र 79 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है। इसलिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई कमी का लाभ देश के आम उपभोक्ता को मिलना ही चाहिए।
उन्होंने पेट्रोल की कीमतों में 15 रुपए प्रति लीटर, डीजल की कीमतों में 10 रुपए प्रति लीटर, मिट्टी के तेल की कीमतों में पांच रुपए प्रति लीटर और रसोई गैस की कीमतों में सौ रुपए प्रति सिलेंडर कटौती किए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढऩे का बोझ तुरंत उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाता है तो फिर कीमतें घटने पर राहत भी आम आदमी को मिलनी ही चाहिए। चौटाला ने कहा कि यूपीए सरकार का इस मामले में स्टेंड पूरी तरह से अलोकतांत्रिक व जनविरोधी है। उन्होंने कहा कि आज पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस व मिट्टी के तेल की कीमतों में कटौती करने की बजाय केंद्रीय मंत्री यह दलील दे रहे हैं कि अभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार के भावों की समीक्षा की जा रही है और कीमतें घटाने का कोई फैसला नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि एक समय अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 145 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई थी, उस समय भी भारतीय बाजारों में पेट्रोल की कीमतें मात्र 40 रुपए लीटर के आसपास थी। उन्होंने कहा कि पेट्रोल को पिछले साल 25 जून को नियंत्रणमुक्त करते ही पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार तेल कंपनियों को दिया गया था। इसका नतीजा यह हुआ 26 जून से 15 दिसम्बर तक तेल कंपनियों ने सात बार पेट्रोल की कीमतों में बढ़ौतरी करते हुए 11 रुपए प्रति लीटर तेल की कीमतें बढ़ा दी थी। इसके बाद इस साल मई माह में पेट्रोल की कीमत में पांच रुपए लीटर की और बढ़ौतरी कर दी गई और जून माह में रसोई गैस सिलेंडर 50 रुपए, डीजल में तीन रुपए प्रति लीटर और कैरोसीन में दो रुपए प्रति लीटर बढ़ौतरी की गई।





गुरुवार, 4 अगस्त 2011

इंडिया यंग, लीडरशिप ओल्ड!

कांग्रेस में 'प्रजातांत्रिक राजशाही'
  • कांग्रेस में भविष्यदृष्टा रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी को युवाओं की सदी घोषित किया था। उनका मानना था कि इक्कीसवीं सदी में युवाओं के मजबूत कांधों पर भारत गणराज्य उत्तरोत्तर प्रगति कर सकता है। आज सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र की बागडोर उनकी अर्धांग्नी श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों में है। राजीव पुत्र राहुल भी चालीस को टच कर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत चुका है, पर फिर भी युवा आज भी पार्श्व में ही रहने पर मजबूर हैं। कमोबेश यही आलम भाजपा सहित अन्य राजनैतिक दलों का है। भारत गणराज्य में प्रजातंत्र की सरेआम शवयात्रा निकाली जा रही है। आम जनता प्रजातंत्र के शव पर सर रखकर गगनभेदी करूण रूदन कर रहा है, किन्तु नीति निर्धारकों और विपक्ष में बैठे नेताओं को इसकी आवाज नहीं सुनाई दे रही है। कांग्रेस में युवाओं को आगे लाने के हिमायती सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने तो मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दो साल पहले ही अपने पुत्र जयवर्धन को राघोगढ़ से कांग्रेस का प्रत्याशी तय कर दिया है। अपने आप में यह ''प्रजातांत्रिक राजशाही'' का नायाब उदहारण माना जाएगा।
भारत देश दिनों दिन जवान होता जा रहा है, किन्तु आज भी सियासत की बागड़ोर उमरदराज नेताओं के हाथों में ही खेल रही है। यंगिस्तान की राह इन पुराने नेताओं के हाथों से होकर ही गुजर रही है, किन्तु साठ पार कर चुके नेता आज भी युवाओं को देश की बागडोर सौंपने आतुर नहीं दिख रहे हैं। मनमोहन सिंह के हालिया फेरबदल के बाद जो परिदृश्य उभरकर सामाने आया है उसके अनुसार कैबनेट मंत्रियों की उमर पैंसठ तो मंत्रीमण्डल की औसत आयु साठ साल है। वजीरे आजम सहित 14 मंत्रियों ने सत्तर से ज्यादा सावन देख लिए हैं। अधिकतर मंत्रियों का जन्म गुलाम भारत में हुआ था। सचिन पायलट, अगाथा संगमा और मिलिंद देवड़ा की आयु 35 से कम तो कुमारी सैलजा चालीस के पेटे में हैं।
पिछले कुछ महीनों में यंगिस्तान को तवज्जो मिलने की उम्मीदें बंधी थीं। युवाओं को यह भाव इसलिए नहीं मिला है, कि देश का उमरदराज नेतृत्व उन पर दांव लगाना चाह रहा है, इसके पीछे सीधा कारण दिखाई पड़ रहा है कि देश में 18 से 30 साल तक के करोड़ों मतदाताओं को लुभाने की गरज से साठ की उमर पार कर चुके नेताओं ने यह प्रयोग किया है कि युवाओं को आगे कर युवा मतदाताओं को अपने से जोड़ा जाए। जब लाल बत्ती की बात आती है तो कमान युवाओं के हाथों से खिसलकर फिर साठ की उमर के कांधों पर चली जाती है।
कहने को तो सभी सियासी पार्टियों द्वारा युवाओं को आगे लाने और उनके हाथ में कमान देने की बातें जोरदार तरीके से की जाती हैं, किन्तु विडम्बना ही कही जाएगी कि सियासी दल युवाओं को आगे लाने में कतराती ही हैं। कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी राहुल गांधी को आगे लाया जा रहा है, वह भी इसलिए कि उनके नाम को भुनाकर राजनेता सत्ता की मलाई काट सकें। वरना अन्य राजनैतिक दल तो इस मामले में लगभग मौन ही साधे हुए हैं।
जितने भी युवा चेहरे आज राजनैतिक परिदृश्य में दिखाई पड़ रहे हैं उनमें से अधिक को 'अनुकंपा नियुक्ति' मिली हुई है। अपने पिता की सींची राजनैतिक जमीन को 'सिंपेथी' वोट के जरिए ये युवा काट रहे हैं, वरना कम ही एसे युवा होंगे जिन पर पार्टी ने दांव लगाया हो और वे जीतकर संसद या विधानसभा पहुंचे हों। राजनीति में स्थापित 'घरानों' के वारिसान को ही पार्टी चुनाव में उतारती है और फिर आगे जाकर अपने पिताओं की उंगली पकड़कर ये देश की दशा और दिशा निर्धारित करते हैं। कांग्रेस में युवाओं को आगे लाने के हिमायती सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने तो मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दो साल पहले ही अपने पुत्र जयवर्धन को राघोगढ़ से कांग्रेस का प्रत्याशी तय कर दिया है। यह प्रजातांत्रिक राजशाही का नायाब उदहारण माना जाएगा।
कांग्रेस में सोनिया गांधी (65), मनमोहन सिंह (79), प्रणव मुखर्जी (77), ए.के.अंटोनी (71) के साथ पार्टी में नेताओं की औसत उमर 74 साल है। भाजपा भी इससे पीछे नहीं है अटल बिहारी बाजपेयी (87), एल.के.आड़वाणी (84), राजनाथ सिंह (60), एम.एम.जोशी (77) तो सुषमा स्वराज (59) के साथ यहां औसत उमर 73 दर्ज की गई है। वामदलों में सीपीआईएम में प्रकाश करात (64), सीताराम येचुरी (59), बुद्धदेव भट्टाचार्य (67), अच्युतानंदन (88) के साथ यहां राजनेताओं की औसत उमर 72 तो समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव (71), अमर सिंह (55), जनेश्वर मिश्र (77), रामगोपाल यादव (65) के साथ यह सबसे यंग पार्टी अर्थात यहां औसत उमर 61 है।
सियासी पार्टियों में एक बात और गौरतलब होगी कि जितने भी युवाओं को पार्टियों ने तरजीह दी है, वे सभी जमीनी नहीं कहे जा सकते हैं। ये सभी पार्टियों में पैदा होने के स्थान पर अवतरित हुए हैं। इनमें से हर नेता किसी न किसी का 'केयर ऑफ' ही है, अर्थात यंगस्तान के नेताओं को उनके पहले वाली पीढ़ी के कारण ही जाना जाता है। ग्रास रूट लेबिल से उठकर कोई भी शीर्ष पर नहीं पहुंचा है।
पिछली बार संपन्न हुए आम चुनावों के पहले रायशुमारी के दौरान एक राजनेता ने जब अपने संसदीय क्षेत्र में अपने कार्यकर्ताओं के सामने युवाओं की हिमायत की तो एक प्रौढ़ कार्यकर्ता ने अपनी पीड़ा का इजहार करते हुए कहा कि जब मैं 29 साल पूर्व आपसे जुड़ा था तब युवा था, आज मेरा बच्चा 25 साल का हो गया है, वह पूछता है कि आप तब भी आम कार्यकर्ता थे, आज भी हैं, इन 29 सालों में आपको क्या मिला, आज मैं जवान हो गया हूं, तो किस आधार पर नेताजी युवाओं को आगे लाने की बात करते हैं।
दुनिया के चौधरी अमेरिका में युवाओं और बुजुर्गों के बीच अंतर की एक स्पष्ट फांक दिखाई पड़ती है। अमेरिका जैसे विकसित देश में जहां युवा पर्यावरण, जीवनशैली, रहन सहन और पारिवारिक मूल्यों के बारे में पुरानी पीढ़ी से अपने मत भिन्न रखती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक जीवनशैली के मामले में युवाओं द्वारा तेज गति से बदलाव चाहा जाता है। वैसे हमारी व्यक्तिगत राय में हर राजनैतिक दलों में युवाओं और बुजुर्गों के बीच संतुलन और तालमेल होना चाहिए। यह सच है कि उमर के साथ ही अनुभव का भंडार बढ़ता है, पर यह भी सच है कि उमर बढऩे के साथ ही साथ कार्य करने की क्षमता में भी कमी होती जाती है। जिस गति से युवाओं द्वारा कार्य को अंजाम दिया जाता है उसी तरह मार्गदर्शन के मामले में बुजुर्ग अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।
कितने आश्चर्य की बात है कि जिस ब्यूरोक्रेसी (अफसरशाही) की बैसाखी पर चलकर राजनेता देश को चलता है, उसकी सेवानिवृत्ति की उम्र साठ या बासठ साल निर्धारित है, किन्तु जब बात राजनेताओं की आती है तो चलने, बोलने, हाथ पांव हिलाने में अक्षम नेता भी संसद या विधानसभा में पहुंचने की तमन्ना रखते हैं, यह कहां तक उचित माना जा सकता है। राजनैतिक क्षेत्र में युवा को अलग तरीके से परिभाषित किया जाता है। अघोषित तौर पर कहा जाता है कि राजनीति में युवा अर्थात 45 से 65 साल। इस हिसाब से राहुल गांधी को अगर 'अमूल बेबी' कहा जाता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए। विडम्बना तो देखिए सरकार में काम करने वालों की सेवानिवृत्ति की उम्र निर्धारित है, किन्तु सरकार चलाने वालों की नहीं!
हमारे विचार से महज कुछ चेहरों के आधार पर नहीं, वरन् विचारों के आधार पर युवाओं को व्यापक स्तर पर राजनीति में आने प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कब्र में पैर लटकाने वालों को अब राहुल गांधी से प्रेरणा लेना चाहिए। जब 41 बसंत देखने वाले राहुल गांधी कैबनेट में शामिल होने से खुद को दूर रखे हुए हैं तो फिर साठ पार कर चुके नेता आखिर लाल बत्ती के लिए जोड़तोड़ क्यों करते हैं। उन्हें भी चाहिए कि वे युवाओं को आगे लाने के हिमायती बनें पर राजा दिग्विजय सिंह जैसे नहीं जो खुद तो राजनीतिक मलाई चखने की कामना रखते हैं और अपने ही पुत्र को चुनाव में उतारने की घोषणा भी कर देते हैं, जबकि अभी न प्रत्याशी चुनाव के लिए समीति बनी है और न ही चुनावों की तारीखों की ही घोषणा हुई है। बुजुर्ग राजनैताओं का नैतिक दायित्व यह बनता है कि वे सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर अब मार्गदर्शक की भूमिका में आएं और युवाओं को ईमानदारी से जनसेवा का पाठ पढ़ाएं तभी गांधी के सपनों का भारत आकार ले सकेगा।

गुरुवार, 3 मार्च 2011

सिख दंगों में कांग्रेस पार्टी को अमेरिकी कोर्ट का समन

चंडीगढ़।। अमेरिका की एक जिला अदालत ने कांग्रेस पार्टी को 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के मामले में समन भेजा है। अमेरिका के एक मानवाधिकार संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (एसजेएफ) ने कांग्रेस पार्टी पर 1984 में हुए सिख दंगों की साजिश रचने और उन्हें भड़काने का आरोप लगाया है।
न्यू यॉर्क की जिला अदालत ने एसजेएफ की शिकायत पर कांग्रेस पार्टी को समन जारी किया है। सिख्स फॉर जस्टिस का कहना है, 'कांग्रेस पार्टी ने 1984 में सिख समुदाय के लोगों के खिलाफ साजिश रची, हमलों को बढ़ावा दिया और उनपर हमले किए।' इस मामले में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और शहरी विकास मंत्री कमल नाथ के खिलाफ भी शिकायत दर्ज की गई है। अदालत ने उन्हें भी समन भेजा है। उनपर आरोप है कि उनको गुरुद्वारा रकाब गंज (नई दिल्ली) में कई लोगों ने दंगा भड़काते देखा। उस दिन वह लगभग 4 हजार लोगों की भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे और लोग उनके आदेश को फॉलो कर रहे थे।
सिख्स फॉर जस्टिस ने अपने एक बयान कहा है कि सिखों की जिस तरह से हत्या हुई उसे सिर्फ दंगों का नाम नहीं दिया जा सकता। आरोप है कि कांग्रेस नेताओं ने 18 राज्यों और 100 शहरों में सिखों के खिलाफ हमलों की अगुवाई की थी। अदालत ने अपने आदेश में कहा है, '21 दिन के भीतर आरोपी समन का जवाब दें।' अदालत ने यह समन न्यू यॉर्क के यूनियन स्ट्रीट स्थित इंडियन नैशनल ओवरसीज कांग्रेस के ऑफिस और कमलनाथ को भेजा है।
एसजेएफ के कानूनी सलाहकार गुरपतवंत सिंह पन्नून का इस मामले में कहना है, 'ये हमले सुनयोजित ढंग से किए गए लेकिन इनकी गंभीरता को भारत सरकार ने छिपा कर रखा और लगातार इसे 1984 में सिखों के खिलाफ दंगों का नाम दिया।'

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

ਨਵੇਂ 'ਕਾਲੇ ਕਾਨੂੰਨ' ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੇ ਮੁੱਢਲੇ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਦਾ ...

ਭਾਰਤੀ ਸੰਵਿਧਾਨ ਦੀ ਡਰਾਫਟਿੰਗ ਕਮੇਟੀ ਦੇ ਚੇਅਰਮੈਨ ਡਾ। ਭੀਮ ਰਾਓ ਅੰਬੇਦਕਰ ਨੇ 25 ਨਵੰਬਰ 1949 ਨੂੰ ਵਿਧਾਨਿਕ ਅਸੈਂਬਲੀ ਵਿਚ ਤੀਜੀ ਵਾਰ ਪੜ੍ਹੇ ਗਏ ਵਿਧਾਨ 'ਤੇ ਹੋਈ ਬਹਿਸ ਸਮੇਂ ਕਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ''26 ਜਨਵਰੀ 1950 ਨੂੰ ਅਸੀਂ ਇਕ ਵਿਰੋਧਾਂ ਭਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ 'ਚ ਦਾਖਲ ਹੋ ਰਹੇ ਹਾਂ-ਸਿਆਸਤ ਵਿਚ ਅਸੀਂ ਇਕ ਬੰਦਾ-ਇਕ ਵੋਟ -ਇਕ ਮੁੱਲ ਦੇ ਅਸੂਲ ਨੂੰ ਮਾਨਤਾ ਦੇਵਾਂਗੇ। ਸਾਡੇ ਸਮਾਜਿਕ ਅਤੇ ਆਰਥਿਕ ਢਾਂਚੇ ਦੇ ਤਰਕ ਵਜੋਂ ਹੀ ਅਸੀਂ ਸਾਡੀ ਸਮਾਜਿਕ ਅਤੇ ਆਰਥਿਕ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਇਕ ਬੰਦਾ ਅਤੇ ਇੱਕ ਮੁੱਲ ਦੇ ਅਸੂਲ ਨੂੰ ਰੱਦ ਕਰਨਾ ਜਾਰੀ ਰੱਖਾਂਗੇ... ਜਿੱਥੋਂ ਤੱਕ ਸੰਭਵ ਹੈ, ਸਾਨੂੰ ਲਾਜ਼ਮੀ ਇਹ ਵਿਰੋਧ ਵੱਧ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨੇੜਲੀ ਘੜੀ ਖ਼ਤਮ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ....।''
ਪਰ ਸੰਵਿਧਾਨ ਲਾਗੂ ਹੋਣ ਤੋਂ ਅੱਜ ਤੱਕ ਸਾਰੇ ਮੁਲਕ ਅੰਦਰਲੇ ਸਮਾਜਿਕ ਅਤੇ ਆਰਥਿਕ ਢਾਂਚੇ 'ਚ ਇਹ ਪਾੜਾ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਜਾਰੀ ਰਹਿ ਰਿਹਾ ਹੈ ਸਗੋਂ ਇਹ ਕਈ ਗੁਣਾ ਹੋਰ ਵਧਿਆ ਹੈ। ਇਹ ਇਸ ਪਾੜੇ ਦਾ ਸਿਖਰ ਹੀ ਹੈ, ਕਿ ਅੱਜ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਅੰੰਨ ਭੰਡਾਰ ਭਰਨ ਵਾਲੇ ਕਿਸਾਨ ਅਤੇ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਲੱਖਾਂ ਦੀ ਤਾਦਾਦ 'ਚ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀਆਂ ਕਰਨ ਤੱਕ ਜਾ ਪੁੱਜੇ ਹਨ ਅਤੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ 40 ਤੋਂ 60 ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਆਬਾਦੀ ਅੱਜ ਦੇ ਜਮਾਨੇ 'ਚ 20 ਰੁਪਏ ਰੋਜ਼ਾਨਾ 'ਚ ਗੁਜਾਰਾ ਕਰਨ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹੈ। ਸਿਤਮ ਜਰੀਫੀ ਤਾਂ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਸਾਡੇ 'ਤੇ ਰਾਜ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਲੋਕ ਇਸ ਪਾੜੇ ਨੂੰ ਘਟਾਉਣ ਦੀ ਥਾਂ ਇਸ ਹਾਲਤ 'ਚੋਂ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਉਠ ਰਹੇ ਹੱਕੀ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਖੂਨ 'ਚ ਡੁਬੋਣ ਲਈ ਭਾਰਤੀ ਸੰਵਿਧਾਨ ਦੇ ਆਰਟੀਕਲ 19 ਦੇ ਤਹਿਤ ਦਿੱਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਦਾ ਹੀ ਖਾਤਮਾ ਕਰਨ 'ਤੇ ਉੱਤਰ ਆਏ ਹਨ। ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਮੌਜੂਦਾ ਅਕਾਲੀ-ਭਾਜਪਾ ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਪਿਛਲੇ ਵਰ੍ਹੇ ਬਣਾਏ ਗਏ ਦੋ ਨਵੇਂ ਕਾਨੂੰਨ 'ਪੰਜਾਬ ਜਨਤਕ ਤੇ ਨਿੱਜੀ ਸੰਪਤੀ ਨੁਕਸਾਨ ਰੋਕੂ ਕਾਨੂੰਨ 2010' ਅਤੇ 'ਪੰਜਾਬ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸੁਰੱਖਿਆ ਗਰੁੱਪ ਕਾਨੂੰਨੂੰ 2010' ਇਸਦੀ ਤਾਜ਼ਾ ਤੇ ਉਘੜਵੀਂ ਉਦਾਹਰਨ ਹੈ।
ਸੰਪਤੀ ਦਾ ਨੁਕਸਾਨ ਰੋਕਣ ਦੇ ਨਾਂਅ ਹੇਠ ਲਿਆਂਦੇ ਗਏ ਪਹਿਲੇ ਕਾਨੂੰਨ ਦੇ ਤਹਿਤ ਕਿਸੇ ਕਿਸਮ ਦੇ ਵੀ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਨੂੰ ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਮੈਜਿਸਟ੍ਰੇਟ ਦੀ ਪ੍ਰਵਾਨਗੀ ਨਾਲ ਹੀ ਨੱਥੀ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ, ਭਾਵੇਂ ਪ੍ਰਵਾਨਗੀ ਨਾ ਮਿਲਣ 'ਤੇ ਦਸ ਦਿਨਾਂ 'ਚ ਸਰਕਾਰ ਕੋਲ ਅਪੀਲ ਦੀ ਮਦ ਰੱਖੀ ਗਈ ਹੈ ਪ੍ਰੰਤੂ ਇਸ 'ਤੇ ਫੈਸਲਾ ਲੈਣ ਲਈ ਕੋਈ ਸਮਾਂ ਸੀਮਾ ਤਹਿ ਨਾ ਕਰਕੇ ਇਕ ਤਰ੍ਹਾਂ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨਾਂ 'ਤੇ ਪੂਰਨ ਪਾਬੰਦੀ ਦੀ ਹਾਲਤ ਪੈਦਾ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ। ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਹੁਣ ਤੱਕ ਰੋਸ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨਾਂ ਦੀ ਗੈਰ ਕਾਨੂੰਨੀ ਢੰਗ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਵੀਡੀਓਗ੍ਰਾਫੀ ਨੂੰ ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਕਾਨੂੰਨੀ ਮਾਨਤਾ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸਗੋਂ ਅਦਾਲਤ 'ਚ ਇਸਨੂੰ ਪੁਖਤਾ ਸਬੂਤ ਵਜੋਂ ਭੁਗਤਾਉਣ ਦਾ ਵੀ ਰਾਹ ਪੱਧਰਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ਇਸ ਕਾਨੂੰਨ ਦੀ ਧਾਰਾ 7 (1) ਕਹਿੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਬਿਨਾਂ ਆਗਿਆ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ ਕਰਨ 'ਤੇ ਇਸਦੇ ਆਯੋਜਕ ਨੂੰ 2 ਸਾਲ ਤੱਕ ਕੈਦ ਤੇ 20 ਹਜ਼ਾਰ ਰੁਪਏ ਜੁਰਮਾਨਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ ਅਤੇ ਜੇਕਰ ਬਿਨਾਂ ਆਗਿਆ ਪ੍ਰਦਰਸ਼ਨ 'ਚ ਅੱਗ ਜਾਂ ਵਿਸਫੋਟਕ ਪਦਾਰਥ ਨਾਲ ਕਿਸੇ ਸੰਪਤੀ ਦਾ ਨੁਕਸਾਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਕਾਨੂੰਨ ਦੀ ਧਾਰਾ 7 (3) ਤਹਿਤ 7 ਸਾਲ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਤੇ 70 ਹਜ਼ਾਰ ਰੁਪਏ ਦਾ ਜੁਰਮਾਨਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ। ਜਦੋਂਕਿ ਹੋਏ ਨੁਕਸਾਨ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਦੀ ਅਦਾਇਗੀ ਵੱਖਰੀ ਕਰਨੀ ਪਵੇਗੀ, ਜਿਸਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਧਾਰਾ 8 (1) 'ਚ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਪਿਛਲੇ ਥੋੜ੍ਹੇ ਸਮੇਂ 'ਚ ਹੀ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਤੇ ਪੁਲਿਸ ਵਲੋਂ ਕਿਸਾਨ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਨੂੰ ਰੋਕਣ ਲਈ ਦਰਜਨਾਂ ਹੀ ਇਰਾਦਾ ਕਤਲ ਵਰਗੇ ਝੂਠੇ ਕੇਸ ਕਿਸਾਨ ਮਜ਼ਦੂਰ ਆਗੂਆਂ 'ਤੇ ਪਾਏ ਗਏ ਹਨ ਅਤੇ ਬਦਲੇ ਦੀ ਰਾਜਨੀਤੀ ਦੇ ਤਹਿਤ ਆਪਣੇ ਸਿਆਸੀ ਵਿਰੋਧੀਆਂ 'ਤੇ ਪਰਚੇ ਦਰਜ ਕਰਨ ਦੀ ਗੱਲ ਆਮ ਬਣੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਇਸ ਨਵੇਂ ਕਾਨੂੰਨ ਤਹਿਤ ਕਿਸੇ ਸੰਪਤੀ ਦਾ ਨੁਕਸਾਨ ਖੁਦ ਹੀ ਕਰਕੇ ਜਾਂ ਕਰਾਕੇ ਪੁਲਿਸ ਤੇ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਲੰਮਾ ਸਮਾਂ ਜੇਲ੍ਹਾਂ 'ਚ ਸੁੱਟਣ ਤੇ ਭਾਰੀ ਆਰਥਿਕ ਬੋਝ ਹੇਠ ਨੱਪਣ ਲਈ ਆਪਣੇ ਜਾਬਰ ਕਦਮਾਂ ਨੂੰ ਕਾਨੂੰਨੀ ਪੁਸ਼ਾਕ ਹੀ ਪਹਿਨਾਈ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਕਾਨੂੰਨ ਦੀ ਮਿਹਰਬਾਨੀ ਕਰਕੇ ਅਕਸਰ ਹੀ ਰਾਹਗੀਰਾਂ ਨੂੰ ਜਾਂ ਫੁੱਟਪਾਥਾਂ 'ਤੇ ਨਰਕ ਭੋਗਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਗੱਡੀਆਂ ਹੇਠ ਦਰੜਨ ਵਾਲੇ ਅਮੀਰਜਾਦੇ ਜਾਂ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਸਿਖਰਲੇ ਟੰਬਿਆਂ 'ਤੇ ਬੈਠੇ ਲੋਕ ਹਮੇਸ਼ਾ ਸਜ਼ਾ ਤੋਂ ਬਚ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਅਜਿਹੇ ਮੌਕਿਆਂ 'ਤੇ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਗੁੱਸਾ ਇਨ੍ਹਾਂ ਗੱਡੀਆਂ 'ਤੇ ਨਿਕਲਣਾ ਕੋਈ ਅਲੋਕਾਰੀ ਗੱਲ ਨਹੀਂ, ਪਰ ਮੌਜੂਦਾ ਕਾਨੂੰਨ ਅਜਿਹੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਵੀ 7 ਸਾਲ ਕੈਦ ਤੇ 70 ਹਜ਼ਾਰ ਜੁਰਮਾਨੇ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਨੁਕਸਾਨ ਦੀ ਭਰਪਾਈ ਦੀ ਮਾਰ ਹੇਠ ਲਿਆਉਂਦਾ ਹੈ।

ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸੁਰੱਖਿਆ ਗਰੁੱਪ ਕਾਨੂੰਨ ਪਹਿਲੇ ਤੋਂ ਵੀ ਜਾਬਰ ਤੇ ਹਿੰਸਕ ਹੋ ਨਿਬੜਦਾ ਹੈ। ਕਹਿਣ ਨੂੰ ਤਾਂ ਇਹ ਕਾਨੂੰਨ ਕੌਮ ਵਿਰੋਧੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਦਬਾਉਣ ਅਤੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਖਤਰੇ ਵਾਲੇ ਵਿਅਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਸਪੈਸ਼ਲ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦੇਣ ਦੇ ਨਾਂਅ 'ਤੇ ਲਿਆਂਦਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਪਰ ਇਸਦੀ ਧਾਰਾ 14 ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਖੁਲਾਸਾ ਕਰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸੁਰੱਖਿਆ ਗਰੁੱਪ 'ਚ ਤਾਇਨਾਤ ਕੋਈ ਮੁਲਾਜ਼ਮ ਜਾਂ ਅਧਿਕਾਰੀ ਜੇਕਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਗੋਲੀ ਵੀ ਮਾਰ ਦੇਵੇ ਤਾਂ ਉਸ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਨੂੰਨੀ ਕਾਰਵਾਈ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ ਕਿਉਂਕਿ ਉਸਨੇ ਅਜਿਹਾ ਕੰਮ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦੀ ਨੇਕ ਨੀਯਤ ਨਾਲ ਜੋ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਇਸ ਕਾਨੂੰਨ ਦੀ ਧਾਰਾ 2 (ਅ) ਮੁਤਾਬਕ 'ਕੌਮ ਵਿਰੋਧੀ ਤਾਕਤ' ਉਹ ਵਿਅਕਤੀ ਜਾਂ ਸੰਗਠਨ ਹੈ ਜੋ ਆਪਣੇ ਮੰਤਵ ਲਈ ਕੋਈ ਗੈਰਕਾਨੂੰਨੀ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ।' ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦਫਾ 144 ਦੀ ਉਲੰਘਣਾ, ਜਨਤਕ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਸਿਗਰਟ ਬੀੜੀ ਪੀਣਾ ਜਾਂ ਟ੍ਰੈਫਿਕ ਦੇ ਨਿਯਮਾਂ ਦੀ ਉਲੰਘਣਾ ਵੀ ਗੈਰਕਾਨੂੰਨੀ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਸਬੰਧਤ ਵਿਅਕਤੀ ਇਸ ਕਾਨੂੰਨ ਮੁਤਾਬਕ ਕੌਮ ਵਿਰੋਧੀ ਸ਼ਕਤੀ ਹੋਵੇਗਾ ਤੇ ਉਹਦੇ ਨਾਲ ਉਥੇ ਹੀ ਨਜਿੱਠਿਆ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਹ ਗੱਲ ਕਿਸੇ ਤੋਂ ਲੁਕੀ ਨਹੀਂ ਕਿ ਅਨੇਕਾਂ ਸਿਆਸਤਦਾਨ ਭੂ-ਮਾਫੀਆ, ਰੇਤ ਮਾਫੀਆ 'ਚ ਵਟੇ ਹੋਏ ਹਨ ਅਤੇ ਸੂਦਖੋਰ ਆੜਤੀਏ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀਆਂ ਜਮੀਨਾਂ ਕੌਡੀਆਂ ਦੇ ਭਾਅ ਹਥਿਆਉਣ ਦੇ ਧੰਦੇ ਵਿਚ ਲੱਗੇ ਹੋਏ ਹਨ। ਅਜਿਹੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਸਪੈਸ਼ਲ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦਿੱਤੀ ਜਾਣੀ ਹੈ। ਇਉਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਹਿੱਸਿਆਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਅੰਨ੍ਹੀ ਲੁੱਟ ਨੂੰ ਵਧਾਉਣ ਖਾਤਰ ਇਸ ਕਾਨੂੰਨ ਤਹਿਤ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦੇ ਨਾਂਅ ਹੇਠ ਕਤਲ ਕਰਨ ਤੱਕ ਦਾ ਲਾਇਸੰਸ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਹਾਲਤ 'ਚ ਭਲਾ ਗਣਤੰਤਰ ਦਿਵਸ 'ਤੇ ਸੰਵਿਧਾਨ ਦੇ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਕੀ ਅਰਥ ਰਹਿ ਜਾਂਦੇ ਹਨ? ਇਸ ਵਿਚੋਂ ਤਾਂ ਇਹੀ ਸਿੱਟਾ ਨਿਕਲਦਾ ਹੈ ਕਿ ਹਾਲਾਤਾਂ ਨੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਚੁਰਾਹੇ 'ਤੇ ਲਿਆ ਖੜ੍ਹਾਇਆ ਹੈ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕੋਲ ਹੁਣ ਹੋਰ ਕੋਈ ਚਾਰਾ ਨਹੀਂ ਸਿਵਾਏ ਇਸਦੇ ਕਿ ਉਹ ਮੌਜੂਦਾ ਰਾਜ ਪ੍ਰਬੰਧ (ਸਮੇਤ ਸੰਵਿਧਾਨ ਦੇ) ਨੂੰ ਵਗਾਹ ਮਾਰਨ ਲਈ ਤਲੀ ਧਰਕੇ ਉਠ ਖੜੇ ਹੋਣ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਡਾ. ਅੰਬੇਦਕਰ ਵਲੋਂ ਵੀ ਭਵਿੱਖਬਾਣੀ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ ''.....ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਉਹ ਜਿਹੜੇ ਇਸ ਨਾਬਰਾਬਰੀ ਦੀ ਮਾਰ ਝੱਲਦੇ ਹਨ, ਸਿਆਸੀ ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਦੇ ਇਸ ਤਾਣੇ ਬਾਣੇ ਨੂੰ ਉਡਾ ਦੇਣਗੇ-ਜਿਹੜਾ ਇੰਨੀ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਉਸਾਰਿਆ ਗਿਆ ਹੈ....।'' ਇਹ ਸ਼ਬਦ ਇਸੇ ਗੱਲ ਦੀ ਤਰਜਮਾਨੀ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਮੌਜੂਦਾ ਸਮੇਂ 'ਚ ਵਿਰਾਟ ਰੂਪ ਧਾਰ ਚੁੱਕੇ ਨੁਕਸ 'ਆਜ਼ਾਦੀ' ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਿਰਜੇ ਗਏ ਤਾਣੇ-ਬਾਣੇ ਵਿਚ ਹੀ ਸਮੋਏ ਹੋਏ ਸਨ। ਜਿਸਦੀ ਪੁਸ਼ਟੀ ਵਿਧਾਨਕ ਅਸੰਬਲੀ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਵਜੋਂ ਡਾ: ਰਾਜਿੰਦਰ ਪ੍ਰਸਾਦ ਵੱਲੋਂ ਵੀ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ ਕਿ ''ਸਾਡੇ ਕਾਨੂੰਨ ਵਿਚ ਅਜਿਹੀਆਂ ਮੱਦਾਂ ਹੈਗੀਆਂ ਜਿਹੜੀਆਂ ਕਈਆਂ ਨੂੰ ਇੱਕ ਜਾਂ ਦੂਜੇ ਨੁਕਸ ਤੋਂ ਇਤਰਾਜ਼ਯੋਗ ਲੱਗਦੀਆਂ ਹਨ। ਸਾਨੂੰ ਮੰਨਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਨੁਕਸ ਮੁਲਕ ਅੰਦਰਲੀ ਸਮੁੱਚੀ ਲੋਕਾਈ ਦੀ ਹਾਲਤ 'ਚ ਸਮੋਏ ਹੋਏ ਹਨ।'' ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੁਕਸਾਂ ਦੀ ਉੱਘੜਵੀਂ ਉਦਾਰਹਣ ਸੰਵਿਧਾਨ ਘੜਨੀ ਦੀ ਬਣਤਰ ਤੋਂ ਵੀ ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਕਿ ਇਸਦੇ ਮੈਂਬਰਾਂ ਦੀ ਚੋਣ 90 ਫ਼ੀਸਦੀ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਬਾਹਰ ਰੱਖ ਕੇ 1935 ਦੇ ਐਕਟ ਦੇ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਹੀ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ।
ਲਛਮਣ ਸਿੰਘ ਸੇਵੇਵਾਲਾ
ਲੇਖਕ ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਦੇ ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਹਨ

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

ਸਾਡਾ ਨੈਸ਼ਨਲ 'ਟਰੈਕਟਰ'

ਇਕਬਾਲ ਸਿੰਘ ਸ਼ਾਂਤ
 ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ ਦੇਸ਼ ਤਰੱਕੀ ਦੀਆਂ ਲੀਹਾਂ 'ਤੇ ਵਧ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਅਗਲੇ ਦੋ ਦਹਾਕਿਆਂ 'ਚ ਦੁਨੀਆਂ ਵਿਚ ਮਹਾਂਸ਼ਕਤੀ ਵਜੋਂ ਸਥਾਪਿਤ ਹੋ ਜਾਵਾਂਗੇ। ਪਰ ਕਿਹਦੇ ਸਹਾਰੇ ? ਸਫ਼ੈਦ ਕੱਪੜਿਆਂ ਦੀ ਆੜ 'ਚ ਕਾਲੀਆਂ ਕਰਤੂਤਾਂ ਨਾਲ ਦੇਸ਼ 'ਤੇ ਰਾਜ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਲੀਡਰਾਂ ਸਹਾਰੇ ਜਾਂ ਫਿਰ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਪੜ੍ਹੀ-ਲਿਖੀ ਜਮਾਤ, ਜਿਸਨੂੰ ਜੀ 2-ਸਪੈਕਟ੍ਰਮ, ਜਿਹੇ ਘਪਲਿਆਂ ਰਾਹੀਂ ਅਰਥਚਾਰੇ ਨੂੰ ਢਾਹ ਲਾਉਣ ਤੋਂ ਵਿਹਲ ਨਹੀਂ ਜਾਂ ਫਿਰ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਭਵਿੱਖ ਨੌਜਵਾਨਾਂ ਵਰਗ, ਜਿਹੜਾ ਨਸ਼ਿਆਂ ਅਤੇ ਸੈਕਸ ਦੀ ਮਾਰ ਹੇਠ ਆਪਣੀ ਪ੍ਰਜਨਣ ਤਾਕਤ ਤੱਕ ਵੀ ਗਵਾਉਂਦਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਪਰ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਲੀਡਰਾਂ ਨੂੰ ਭਰੋਸਾ ਹੈ। ਆਪਣੇ ਨੈਸ਼ਨਲ ਟਰੈਕਟਰ (ਜੁਗਾੜੂ ਸੋਚ) 'ਤੇ। ਜਿਸਦੇ ਜਰੀਏ ਸਾਡਾ ਕੌਮੀ ਚਰਿੱਤਰ (ਨੈਸ਼ਨਲ ਕਰੈਕਟਰ) ਦਿਨੋਂ-ਦਿਨ -ਨੈਸ਼ਨਲ ਟਰੈਕਟਰ ਵਿਚ ਤਬਦੀਲ ਹੁੰਦਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਸਭ ਤੋਂ ਮੰਦਭਾਗੀ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਇਸਦੇ ਚਾਰ ਟਾਇਰ ਵੀ ਬਰਾਬਰ ਦੇ ਨਹੀਂ ਭਾਵ ਕਿਸੇ ਪਾਸੇ ਕੋਈ ਨਿਯਮ ਨਹੀਂ, ਨੀਤੀ ਨਹੀਂ। ਹਰ ਪਾਸੇ ਦਿਖਾਈ ਦੇ ਰਹੀ ਹੈ ਸਿਰਫ਼ ਅੱਗੇ ਵਧਣ ਦੀ ਦੌੜ।
ਅੱਜ ਅਸੀਂ ਚੰਦਰਮਾਂ 'ਤੇ ਵਾਸੇ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਪਰ ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ 75 ਫ਼ੀਸਦੀ ਤੋਂ ਵੀ ਵੱਧ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਸੜਕਾਂ 'ਤੇ ਵਹੀਕਲ ਚਲਾਉਣ ਦੀ ਅਕਲ ਨਹੀਂ। ਹਨ੍ਹੇਰੇ 'ਚ ਸਾਹਮਣਿਓਂ ਆਉਂਦੀ ਗੱਡੀ ਨੂੰ ਰਾਹ ਵਿਖਾਉਣ ਲਈ ਡਿੱਪਰ ਮਾਰਨ ਦੀ ਸੁਰਤ ਨਹੀਂ। ਲੋਕਾਂ ਵਿਚ ਸਾਫ਼-ਸਫ਼ਾਈ ਪ੍ਰਤੀ ਭਾਵਨਾ ਇੰਨੀ ਘੱਟ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਘਰ ਦਾ ਕੂੜਾ ਸੜਕ ਵਿਚਕਾਰ ਸੁੱਟਣ ਤੋਂ ਨਹੀਂ ਝਿਜਕਦੇ। ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਬਿਜਲੀ ਤੇ ਟੈਕਸ ਦੀ ਚੋਰੀ ਕਰਕੇ ਇੰਝ ਮਜ਼ਾ ਆਉਂਦਾ ਹੈ ਜਿਵੇਂ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਤੋਂ ਕ੍ਰਿਕਟ ਦਾ ਮੈਚ ਜਿੱਤ ਲਿਆ ਹੋਵੇ। ਅਜੇ ਤਾਂ ਸ਼ੁਕਰ ਹੈ ਕਿ ਟੈਲੀਫੋਨ ਅਤੇ ਮੋਬਾਇਲਾਂ ਦੇ ਮੀਟਰ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਘਰਾਂ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਲੱਗੇ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਜੁਗਾੜੂ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ 'ਤੇ ਵੀ ਕੁੰਡੀਆਂ ਲਾਉਣ 'ਚ ਕੋਈ ਕਸਰ ਨਹੀਂ ਛੱਡਣੀ ਸੀ।
ਸਾਡੇ 'ਨੈਸ਼ਨਲ ਟਰੈਕਟਰ' ਦਾ ਇੰਨਾ ਬੋਲਬਾਲਾ ਹੈ ਕਿ ਸਾਡੇ ਬਹੁਤੇ ਵਕੀਲ ਅਪਰਾਧੀਆਂ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾ ਦਿਵਾਉਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕਾਨੂੰਨ ਦੇ ਸ਼ਿਕੰਜ਼ੇ 'ਚੋਂ ਬਚਣ ਦੀਆਂ ਘੁੰਡੀਆਂ ਸਿਖਾਉਂਦੇ ਹਨ। ਅਦਾਲਤਾਂ 'ਚ ਇਨਸਾਫ਼ ਲਈ ਜ਼ਿੰਦਗੀਆਂ ਲੰਘ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ ਪਰ ਉਥੋਂ ਮਿਲਦੀ ਹੈ ਸਿਰਫ਼ ਤਰੀਕ ਤੇ ਤਰੀਕ... ਅਤੇ ਅੰਕਲ ਜੱਜਾਂ ਦੀ ਭੂਮਿਕਾ ਨੇ ਵੀ ਨਿਆਂਪਾਲਿਕਾ 'ਤੇ ਪ੍ਰਸ਼ਨ ਚਿੰਨ੍ਹ ਲਗਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ।
ਖਾਕੀ ਵਰਦੀ ਦੀ ਹਾਲਤ ਇਹ ਹੈ ਹਾਕਮਾਂ ਦੇ ਪਿੰਡ ਬਾਦਲ 'ਚ ਪ੍ਰਜਾਪਤ ਕੁਲਵੰਤ ਸਿੰਘ ਦਾ ਪਰਿਵਾਰ ਮਹੀਨਿਆਂ ਤੋਂ ਆਪਣੇ ਖੇਤ ਨੂੰ ਲਾਂਘੇ ਲਈ ਦਰ-ਦਰ ਭਟਕ ਰਿਹਾ ਹੈ ਪਰ ਉਸਨੂੰ ਖਾਕੀ ਵਰਦੀ ਦੇ ਜ਼ੋਰ 'ਤੇ ਖੇਤ ਨੂੰ ਲਾਂਘਾ ਤਾਂ ਦੂਰ ਖੰਘਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਵੀ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾ ਰਹੀ। ਇਹ ਸਿਰਫ਼ ਹਾਕਮਾਂ ਦੇ ਪਿੰਡ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਹੈ ਬਾਕੀ ਸੂਬੇ ਅਤੇ ਦੇਸ਼ 'ਚ ਖਾਕੀ ਦੀਆਂ ਕਾਰਗੁਜਾਰੀਆਂ ਕਿਸੇ ਤੋਂ ਲੁਕੀਆਂ ਨਹੀਂ।
ਸਾਡੇ 62 ਸਾਲਾ ਗਣਤੰਤਰ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਹੈ ਕਿ ਮੋਇਆਂ ਨੂੰ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਮਿਲ ਰਹੀਆਂ ਹਨ, ਜਿਉਂਦੇ ਜੀਅ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਖਾਤਰ ਸੰਗਤ ਦਰਸ਼ਨਾਂ ਵਿਚ ਭਟਕ ਰਹੇ ਹਨ। ਚਿੱਟਕੱਪੜਿਆਂ ਤੇ ਧਨਾਢਾਂ ਦੇ ਕੁੱਤੇ ਲੂਵੀ ਮਹਿੰਗੇ ਬਿਸਕੁੱਟ ਖਾਂਦੇ ਹਨ ਤੇ ਮਹਿੰਗੀਆਂ ਕਾਰਾਂ 'ਤੇ ਘੁੰਮਦੇ ਹਨ, ਜਦੋਂ ਕਿ ਗਰੀਬਾਂ ਦੇ ਬੱਚੇ ਦੋ ਡੰਗ ਦੀ ਰੋਟੀ ਖਾਤਰ ਢਾਬਿਆਂ 'ਤੇ ਜੂਠੇ ਭਾਂਡੇ ਮਾਂਜਣ ਨੂੰ ਮਜ਼ਬੂਰ ਹਨ। ਬਾਲ ਮਜ਼ਦੂਰੀ ਖਿਲਾਫ਼ ਕਾਨੂੰਨ ਤਾਂ ਹੈ ਪਰ ਭੁੱਖੇ ਬੱਚਿਆਂ ਦੇ ਢਿੱਡ ਭਰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਜੁਗਾੜ ਨਹੀਂ। ਸਰਕਾਰੀ ਗੋਦਾਮਾਂ 'ਚ ਕਰੋੜਾਂ ਟਨ ਅਨਾਜ ਸੜ ਰਿਹਾ ਹੈ ਪਰ ਲੋੜਵੰਦਾਂ ਨੂੰ ਖਾਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਨਹੀਂ।
ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਧਰਮਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਦਿਨੋਂ ਦਿਨ ਵਧ ਰਹੀ ਹੈ ਪਰ ਸਮਾਜਿਕ ਇਖ਼ਲਾਕ ਖ਼ਤਮ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਕੋਈ ਕਿਸੇ ਸਾਧ ਦੀ ਡਫ਼ਲੀ ਵਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਤੇ ਕਿਸੇ ਉਤੇ ਫਲਾਣੇ ਬਾਬੇ ਦਾ ਜਨੂੰਨ ਸਵਾਰ ਹੈ। ਦੇਸ਼ ਪ੍ਰਤੀ ਲੋਕਾਂ 'ਚ ਐਨਾ ਕੁ ਦੇਸ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਬਚਿਆ ਹੈ ਕਿ ਅਜਿਹੇ ਅਖੌਤੀ ਸਾਧਾਂ ਦੀਆਂ ਕਰਤੂਤਾਂ 'ਤੇ ਪਰਦਾ ਪਾਉਣ ਲਈ ਪਲਾਂ 'ਚ ਲੱਖਾਂ-ਕਰੋੜਾਂ ਦੀ ਸਰਕਾਰੀ ਜਾਇਦਾਦਾਂ ਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਗੱਡੀਆਂ ਮੋਟਰਾਂ ਨੂੰ ਅੱਗ ਦੀ ਭੇਟ ਚਾੜ੍ਹ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
ਕਦੇ ਸੋਚਿਆ ਕਿਸੇ ਨੇ ਕਿ ਕੋਈ ਵੀ ਧਰਮ ਜਾਂ ਪੰਥ ਲੜਾਈ ਝਗੜੇ ਜਾਂ ਫਸਾਦ ਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦਾ। ਧਰਮ ਤੇ ਸਮਾਜਕ ਠੇਕੇਦਾਰੀਆਂ ਨੇ ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਪੈਦਾ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਹੈ ਕਿ ਦੁਖੀ ਹੋਇਆ ਮਨ ਕਰਦੈ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਧਰਮਾਂ 'ਤੇ ਪਾਬੰਦੀ ਲਗਾ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ ਤੇ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਰੱਬ ਦਾ ਨਾਂਅ ਲੈਣ ਦੀ ਇਜ਼ਾਜਤ ਵੀ ਨਾ ਹੋਵੇ। ਅੱਜ ਧਰਮ ਦੀ ਆੜ ਵਿਚ ਔਰਤਾਂ ਦੀ ਆਬਰੂ ਨਾਲ ਖਿਲਵਾੜ ਕੀਤਾ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਤੇ ਹਰ ਪਾਸੇ ਸਿਰਫ਼ ਭਾਵਨਾਵਾਂ ਦਾ ਵਪਾਰ ਭਾਰੂ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਲੱਖਾਂ ਪੜ੍ਹੇ-ਲਿਖੇ ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰ ਮੁੰਡੇ ਕੁੜੀਆਂ ਆਪਣੇ ਹੱਕਾਂ ਖਾਤਰ ਸੜਕਾਂ ਦੀ ਖਾਕ ਛਾਣਦੇ ਹੋਏ ਜ਼ਬਰ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਬਣ ਰਹੇ ਹਨ।
ਅਜਿਹੇ ਹਾਲਾਤਾਂ ਵਿਚ ਆਪਣੇ ਹੱਥੋਂ ਵਿਉਂਤੀ ਦੁਨੀਆਂ ਦੇ ਅਜੋਕੇ ਸਾਇਬਰ ਇਨਸਾਨਾਂ ਤੋਂ ਡਰਦਾ ਰੱਬ ਵੀ ਵਿਚਾਰਾ ਕਿਸੇ ਖੂੰਜੇ ਰੋਣ ਰੋਣਹਾਕਾ ਹੋਇਆ ਬੈਠਾ ਹੈ ਪਰ ਲੱਗਦੈ ਕਿ ਹੁਣ ਉਹਦੇ ਹੱਥੋਂ ਵੀ ਬਾਜ਼ੀ ਖੁੰਝ ਗਈ ਹੈ। ਮਹਿੰਗਾਈ ਸਿਖ਼ਰਾਂ ਨੂੰ ਪੁੱਜ ਗਈ ਐ ਤੇ ਗੰਢਿਆਂ ਤੇ ਟਮਾਟਰਾਂ ਨੇ ਰਸੋਈ ਦਾ ਜਾਇਕਾ ਵਿਗਾੜ ਰੱਖਿਆ ਹੈ।
ਦੇਸ਼ ਦਾ ਭਵਿੱਖ ਮੰਨੀ ਜਾਂਦੀ ਨਵੀਂ ਪੀੜੀ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹਾ-ਲਿਖਾ ਕੇ ਚਰਿੱਤਰਵਾਨ ਬਣਾਉਣ ਵਾਲੇ ਸਰਕਾਰੀ ਸਕੂਲਾਂ ਦੇ ਅਧਿਆਪਕਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਆਪਣੀ ਕਾਬਲੀਅਤ 'ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਨਹੀਂ ਜਾਪਦਾ ਤਦੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਜੁਆਕ ਕਾਨਵੈਂਟ ਸਕੂਲਾਂ ਵਿਚੋਂ ਸਿੱਖਿਆ ਹਾਸਲ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਸਮਾਜ ਦਾ ਚੌਥਾ ਥੰਮ ਮੀਡੀਆ ਵੀ ਥਾਂ-ਥਾਂ ਖੁਰਦਾ ਨਜ਼ਰ ਆ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਪੇਡ ਖ਼ਬਰਾਂ ਤੇ ਮੀਡੀਆ ਦੇ ਕੌਮੀ ਪੱਧਰ ਦੇ ਝੰਡਾਬਰਦਾਰਾਂ ਦੇ ਨਾਂ 2ਜੀ-ਸਪੈਕਟ੍ਰਮ ਘਪਲੇ 'ਚ ਆਉਣ ਨਾਲ ਗਣਤੰਤਰ ਦੀ ਇੱਕ ਹੋਰ ਚੂਲ ਹਿਲਦੀ ਨਜ਼ਰ ਆ ਰਹੀ ਹੈ।ਇਹ ਵੀ ਸਾਡਾ ਕੌਮੀ ਚਰਿੱਤਰ ਹੈ ਕਿ ਆਮ ਜਨਤਾ ਲਈ ਆਈਆਂ ਸਰਕਾਰੀ ਗਰਾਂਟਾਂ ਵਿਚੋਂ ਸਿਰਫ਼ 20 ਤੋਂ 25 ਫ਼ੀਸਦੀ ਹਿੱਸਾ ਹੀ ਹਕੀਕੀ ਤੌਰ 'ਤੇ ਲੱਗਦਾ ਹੈ। ਤਦੇ ਅੱਜ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਲੱਖਾਂ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਕਰੋੜ ਰੁਪਇਆ ਸਵਿਸ ਬੈਂਕ ਦੇ ਖਾਤਿਆਂ ਦਾ ਸ਼ਿੰਗਾਰ ਬਣ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਸੰਵਿਧਾਨ ਗਠਨ ਦੇ 62 ਵਰਿਆਂ ਬਾਅਦ ਵੀ ਜ਼ਮੀਨੀ ਪੱਧਰ 'ਤੇ ਹਾਲਾਤ ਇਹ ਹਨ ਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੀ 70-75 ਫ਼ੀਸਦੀ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਮੁੱਢਲੇ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਅਤੇ ਕਾਨੂੰਨੀ ਕਦਰਾਂ-ਕੀਮਤਾਂ ਦਾ ਹੀ ਗਿਆਨ ਨਹੀਂ ਤੇ ਉਹ ਅੰਨ੍ਹੇ-ਬੋਲਿਆਂ ਵਾਂਗ ਅਖੌਤੀ ਸਿਆਸਤਦਾਨਾਂ ਦੀ ਬਿਨਾਂ ਇਖਲਾਕੀ ਸੋਚ ਪਹਿਚਾਣੇ ਵੋਟ ਪਾ ਦਿੰਦੇ ਹਨ। ..'ਤੇ ਫਿਰ ਵੋਟਾਂ ਦੀ ਭੀਖ ਮੰਗਣ ਵਾਲੇ ਆਗੂ ਜਿੱਤਣ ਮਗਰੋਂ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਮਾਇਆ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਭੀਖ ਵਜੋਂ ਦਿੰਦੇ ਹਨ। ਵੋਟਾਂ ਦੀ ਖਰੀਦੋ-ਫਰੋਖ਼ਤ ਨੇ ਵੀ ਸਮੁੱਚੀਆਂ ਲੋਕਤੰਤਰਿਕ ਕਦਰਾਂ-ਕੀਮਤਾਂ ਨੂੰ ਲਗਭਗ ਢਹਿ-ਢੇਰੀ ਕਰਕੇ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ ਹੈ।
ਅੱਜ ਦੇਸ਼ 'ਚ ਜ਼ਮੀਰ, ਇਖਲਾਕ, ਰਿਸ਼ਤਿਆਂ ਅਤੇ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨੀਅਤ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਮਰਨ ਕੰਢੇ ਹੈ ਪਰ ਫਿਰ ਵੀ ਹਰ ਕੋਈ ਖੁਸ਼ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਇਹੋ ਵਰਤਾਰਾ ਅੱਜ-ਕੱਲ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਫਿੱਟ ਹੈ। ਰਾਜਸੀ ਆਗੂ ਆਪਣੇ ਸੌੜੇ ਹਿੱਤਾਂ ਲਈ ਗਰੀਬ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦੇਣ ਦੀ ਥਾਂ ਆਟਾ-ਦਾਲ, ਸ਼ਗੁਨ ਸਕੀਮ ਤੇ ਮੁਫ਼ਤ ਬਿਜਲੀ ਜਿਹੀਆਂ ਰਿਆਇਤਾਂ ਦੇ ਕੇ ਮਾਨਸਿਕ ਤੇ ਆਰਥਿਕ ਤੌਰ 'ਤੇ ਅਪਾਹਜ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ।
ਪੰਜ ਵਰ੍ਹੇ ਵੇਖਦਿਆਂ ਨੂੰ ਹੋ ਗਏ ਬਾਪੂ ਤੋਂ ਲੰਬੀ 'ਚੋਂ ਸੇਮ ਨਹੀਂ ਨਿਕਲੀ, ਪੁੱਤ ਵੱਲੋਂ ਐਲਾਨਿਆ ਬਠਿੰਡੇ ਦੀਆਂ ਝੀਲਾਂ ਵਾਲਾ ਫਾਈਵ ਸਟਾਰ ਹੋਟਲ ਦਾ ਕਿਧਰੇ ਨਾਮੋ ਨਿਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਦਿਸਦਾ। ਬਾਪੂ ਨੇ ਇੱਕ-ਇੱਕ ਪਿੰਡ 'ਚ 5-5 ਖੇਡ ਕਿੱਟਾਂ ਵੰਡ ਕੇ ਵੋਟਾਂ ਦੀ ਬਿਸਾਤ ਵਿਛਾਈ ਹੈ। ਅਜੇ ਸਾਂਝੀ ਕੰਧ ਵਾਲੇ 'ਸ਼ਰੀਕਾਂ' ਦਾ ਸਿਆਸੀ ਖੌਫ਼ ਸਿਰ ਲੂ'ਤੇ ਹੈ ਅਤੇ ਉੱਪਰੋਂ ਘਰ ਵਿਚੋਂ ਉੱਠੇ 'ਨਵੇਂ ਸ਼ਰੀਕਾਂ' ਨੇ ਸੇਵੀਆਂ ਦੀ ਸਾਂਝੀ ਕੜਾਹੀ 'ਚ ਲੂਣ ਪਾ ਕੇ ਨਵੀਂ ਭਸੂੜੀ ਪਾ ਰੱਖੀ ਹੈ।
ਜਿੱਥੇ ਇੱਕ ''ਕਾਕਾ'' ਕਾਮਰੇਡਾਂ ਦੀ ਤਰਜ਼ 'ਤੇ 25 ਸਾਲਾਂ ਦੀ 'ਸਰਦਾਰੀ' ਭਾਲਦੈ ਤੇ ਦੂਜਾ 'ਨਿਜਾਮ' ਬਦਲਣ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕਰਕੇ ਜਾਗੋ ਕੱਢਦੈ ਫਿਰਦੈ। ਸੂਬੇ ਦੇ ਕਾਂਗਰਸੀ ਵਿਰੋਧੀ ਧਿਰ ਦੀ ਭੂਮਿਕਾ ਭੁਲਾ ਪਿਛਲੇ ਚਾਰ ਵਰ੍ਹਿਆਂ ਤੋਂ ਆਪਣੇ ਰਵਾਇਤੀ ਕੁੱਕੜ-ਕਲੇਸ਼ ਵਿਚ ਉਲਝੇ ਹੋਏ ਹਨ।
ਪਿਆਰੇ ਪਾਠਕੋ! ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਇਸ ਲੇਖ ਰਾਹੀਂ ਸਿਸਟਮ ਵਿਚ ਗਣਤੰਤਰ ਦਿਵਸ ਮੌਕੇ ਕੋਈ ਸੁਧਾਰ ਲਿਆਉਣ ਲਈ ਕੋਈ ਅਪੀਲ ਨਹੀਂ ਕਰ ਰਿਹਾ, ਕਿਉਂਕਿ ਇਹੋ ਲੂਲੂ-ਜਿਹਾ ਵਰਤਾਰਾ ਦੇਸ਼ ਦੇ 96 ਫ਼ੀਸਦੀ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਹੱਡਾਂ ਵਿਚ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਰਚ-ਮਿੱਚ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ। ਮੇਰੀ ਕਲਮ ਰਾਹੀਂ ਲਿਖੀਆਂ ਸਤਰਾਂ ਤਾਂ ਸਿਰਫ਼ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਚਾਰ ਫ਼ੀਸਦੀ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਹਨ। ਜਿਹੜੀ ਸ਼ਾਇਦ ਕਦੇ-ਕਦਾਈ ਪਰ ਗੂੰਜਦੀ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਰਹੇਗੀ।
ਅੱਜ ਸਿਰਫ਼ ਲੋੜ ਹੈ ਤਾਂ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟ ਚਿੱਟਕੱਪੜਿਆਂ ਦੀ ਸਫ਼ੈਦ ਪੁਸ਼ਾਕ ਨੂੰ ਸਿਆਹ ਕਾਲੇ ਰੰਗ ਵਿਚ ਤਬਦੀਲ ਕਰਨ ਦੀ, ਤਾਂ ਜੋ ਪਾਕ ਚਿੱਟਾ ਰੰਗ ਕਲੰਕਿਤ ਤੇ ਦਾਗਦਾਰ ਹੋਣੋਂ ਬਚ ਸਕੇ ਤੇ ਸ਼ਾਇਦ ਸਾਡਾ 'ਟਰੈਕਟਰ' ਬਣਿਆ 'ਕਰੈਕਟਰ' ਮੁੜ ਤੋਂ ਬਹਾਲ ਹੋ ਸਕੇ।
98148-26100/93178-26100

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

Veena is a bookie, has tarnished my image: Dheeraj

New Delhi,(PTI)Indian photo-journalist Dheeraj Dikshit, who had been accused of being involved in spot-fixing by Veena Malik, today claimed that the Pakistani actor is a "bookmaker", managing seven of her country''s top players, and demanded the Ministry of External Affairs to immediately cancel her visa. Malik, who is participating in the reality TV show Bigg Boss-4 on Colors channel, had accused Dikshit of being involved in match-fixing and remaining in touch with her ex-boyfriend Mohammad Asif.
Pakistan speedster Asif is currently suspended by the ICC pending a disciplinary hearing into allegations of spot-fixing during the Lord''s Test in August. "I have written a letter to the Ministry of External Affairs, demanding the cancellation of her visa.I don''t want her to remain in India for a minute. She has tarnished my image, left me unemployed."It''s an assassination of my character. I am not being able to pay attention towards anything.
I want the government to take defiant action against Veena," said an angry Dheeraj. "The Colors channel is portraying her like a big celebrity.
How can you cast a characterless person in any Indian show? One needs to understand she tried to drag an Indian national into the murky world of betting and fixing. She is a criminal, a match-fixer," claimed the controversial photographer.
Dikshit, who accepted he was close to pace bowler Asif professionally, revealed that it was in the month of January this year that he got a call from the model-turned-actress in Dhaka. "I have never met her and during our first interaction, she tried to become very friendly.Before calling me, she called me at my Delhi number 4-5 times which my wife answered. My wife gave her my Dhaka number and on the very first note, she started flirting with me.
"Veena was aware of the fact that I was good friends with Asif and so she contacted me. She said we could strike a big deal if I wish so.
She said she is managing seven top players and to substantiate her claims, she told me the results of Pakistan''s upcoming series with Australia, Sri Lanka and England. Later, I found, her claims were all true," said Dheeraj.
The photographer also claimed that Mazhar Majeed, the man at the centre of the spot-fixing controversy that engulfed the Lord''s Test, was Veena''s London-based boyfriend and known and dated each other on and off for three years. "She used to say that Maz is her London-based boyfriend.Later I realised that ''Maz'' is Mazhar Majeed who used to get endorsement deal for the players," he said. Dikshit, who is contemplating legal action against Veena, also alleged that he is receiving death threats from an unknown number on his mobile phone.

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

स्वर्गीय राजीव गांधी की जयन्ती अक्षय ऊर्जा दिवस तथा सद्भावना दिवस के तौर पर हर्षोल्लास के साथ मनाई

डबवाली-उपमण्डल के गांव अलीकां में स्थित नेहरू कॉन्वेंट स्कूल तथा नेहरू आईटीआई कॉलेज के प्रांगण में आज पूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गीय राजीव गांधी की जयन्ती अक्षय ऊर्जा दिवस तथा सद्भावना दिवस के तौर पर हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। इस अवसर पर एक ड्राईंग प्रतियोगिता तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। जिसमें बच्चों ने विभिन्न प्रकार के नृत्य प्रस्तुत कर समां बांध दिया। दो चरणों में करवाई गई ड्राईंग प्रतियोगिता में भी बच्चों ने बढ़ - चढ़ कर भाग लिया। कार्यक्रम के अन्त में प्रधानाचार्य श्री शर्मा ने बच्चों को पुरस्कार वितरित किए। मंच संचालन अध्यापिका ए. जैकब ने बाखूबी निभाया। उधर स्थानीय राजा राम कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में भी स्वर्गीय राजीव गांधी की जयन्ति सदभावना दिवस के रूप में मनाई गई। इस अवसर पर एनसीसी कैडेट्स तथा छात्र - छात्राओं को एकता की शपथ दिलवाई गई तथा सर्व-धर्म प्रार्थना की गई। यह जानकारी देते हुए प्रधानाचार्या निर्मल गर्ग ने बताया कि इस अवसर पर निबन्ध लेखन व प्रश्रोत्तरी प्रतियोगिता भी करवाई गई।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

भारत बंद अह्वान के तहत आज बाज़ार पूर्ण रूप से बंद

डबवाली-केन्द्र सरकार द्वारा की गई पैट्रोलियम पदार्थों की मुल्य वृद्धि के विरोध में किए गए भारत बंद अह्वान के तहत आज सिरसा, डबवाली, कालांवाली व आस-पास के इलाके पूर्ण रूप से बंद रहे।डबवाली शहर बंद को सफल बनाने को लेकर आज इनैलो नेता एवं पूर्व विधायक डा. सीता राम के नेतृत्व में रणवीर सिंह राणा, नगरपार्षद गुरजीत सिंह, इनैलो महावीर सहारण, कार्यालय प्रभारी महेन्द्र डूडी, प्रह्लाद सिंह, टेकचंद छाबड़ा, दर्शनमान, गुरचरण सिंह नम्बरदार व अन्य कार्यकर्ताओं ने मुख्य बाजार, जीटीरोड, कालोनी रोड, बस स्टैंड रोड, सब्जी मण्डी, चौटाला रोड का रूट मार्च कर डबवाली बंद का जायजा लिया। उधर अन्य विपक्षी दल भाजपा के भाजपा कर्मचारी प्रकोष्ठ के प्रदेश प्रभारी एसडी कपूर, डबवाली भाजपा प्रभारी सतीश जग्गा, मण्डल महामंत्री बलदेव सिंह मांगेआना, दाता रात बसौड, मनू राम शर्मा व अन्य कार्यकर्ताओं ने भी बाजारों में घूम-घूमकर डबवाली बंद का जायजा लिया तथा कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी डबवाली बंद में पूर्ण सहयोग देते हुए पूरे शहर में रूट मार्च किया।
डबवाली बंद के दौरान पूर्व विधायक डा. सीता राम ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि डबवाली बंद को सफल बनाने के लिए सभी विपक्षी दलों का पूर्ण सहयोग रहा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने जनता पर भारी भरकम महंगाई का बोझ डाल दिया है जिससे गरीब आदमी के भूखो मरने की नौबत आ गई है और देश की आम जनता कांग्रेस सरकार से छूटकारा पाने का रास्ता ढूंढ़ रही है। उन्होंने कहा कि आज डबवाली के व्यापारियों व आम जनता ने डीजल, पैट्रोल, मिट्टी का तेल व रसोई गैस के बढ़े हुए मूल्यों के विरोध में अपने कारोबार बंद रखकर केन्द्र की गूंगी बहरी व सोई हुई सरकार को जगाने का प्रयास किया है। पूर्व विधायक ने कहा कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार आम जनता की परवाह न करते हुए पूंजीपतियों के हाथों में खेल रही है।
भाजपा नेता एसडी कपूर, सतीश जग्गा, बलदेव मांगेआना व कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता कामरेड गणपत राय व अन्य कार्यकर्ताओं ने कहा कि लोकसभा चुनाव से पूर्व की केन्द्र सककार ने देश की भोली-भाली जनता को महंगाई कम करने के झूठे आश्वासन देकर सत्ता हासिल की है। लेकिन अब देश की जनता पूर्ण रूप से जागरूक हो चुकी है ।आज सभी विपक्षी दलों ने केन्द्र सरकार से पैट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, रसोई गैस में की गई भारी मूल्य वृद्धि को शीघ्र वापिस लेने की मांग की है ताकि आम जनता अपना सुखी जीवन व्यतीत कर सके।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

बापू बाजार में चोरी

उदयपुर--शहर के बापू बाजार में मंगलवार की रात 6 व्यापारिक प्रतिष्ठानों से नकदी सहित लाखों का माल चोरी हो गया। चोरो ने एक छत से दुकान में प्रवेश किया और एक के बाद एक छह प्रतिष्ठानों से माल चुराया। पिछले पंद्रह दिनों में एक ही अंदाज में चोरी की इस दूसरी बड़ी वारदात से व्यापारियों में दहशत का माहौल है। चोरी की बढ़ती वारदातों से पुलिस कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। गौरतलब है कि शक्तिनगर में गत 30 मई को चोरों ने छत और रोशनदान से दुकानों में घुसकर लाखों की चोरी की वारदात को अंजाम दिया है।
साड़ी शोरूम से एक लाख की नकदी चोरी : शक्तिनगर निवासी अशोक पुत्र गोविंदराम कालरा के महाराजा साड़ी पैलेस के चार मंजिला शोरूम से एक लाख रुपए नकद व कुछ सिक्के ले गए। तिजोरी भी तोड़ दी।
विज्ञापन एजेंसी व फोटोग्राफर की दुकान में चोरी : बापूबाजार टाउनहॉल लिंक रोड के सामने स्थित सेक्टर 11 निवासी शिवकुमार पुत्र मांगीलाल कसारा की विज्ञापन एजेंसी शिवा एडवरटाइजिंग एवं मार्केटिंग में चोरी हुई। शिवकुमार का बेटा दीपक ऑफिस खोलने आया तो देखा कि दरवाजा कब्जे सहित उखाड़ा हुआ था और अलमारी सहित सारा सामान बिखरा पड़ा था। यहां से चोर 19 हजार 987 रुपए और एक मोबाइल चुरा लिया।
इसी इमारत में दूसरे फ्लोर पर फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और एलबम तैयार करने की एजेंसी पुष्पक डिजिटल से चोर लकड़ी का दरवाजे का तोड़ अंदर घुसे। यहां से 15 सौ रुपए नकद, दो तोला सोने का लॉकेट और एक अंगूठी चुरा ले गए। यहां काम करने वाला पायड़ा निवासी लोकेश सालवी जब सुबह आया तो घटना का पता चला। उसने मालिक उमेश चौहान को सूचना दी। चोरों ने यहां बल्लियां फंसाकर दरवाजा तोड़ा।

यहां भी हुई चोरी
चार मंजिला रेडिमेड शोरूम मालिक मेहता भवन, सुंदरवास निवासी प्रकाश पुत्र गोविंदलाल मेहता ने बताया कि चोर15 हजार नकद, रेडिमेड कपड़े चुरा कर ले गए।
भूपालपुरा निवासी हरकलाल पुत्र भोलीलाल दुग्गड़ की क्वालिटी प्लास्टिक एजेंसी में गल्ला तोड़कर दो हजार रुपए ले गए।
रामा इंजीनियरिंग की इमारत के प्रथम तल पर मेडिकल व्यवसायी प्रकाश डिस्ट्रीब्यूटर्स से तिजोरी तोड़कर करीब 30 हजार नकदी चोरी हुई। दुकान मालिक जवाहरनगर निवासी रामप्रकाश पुत्र लोकुमल सिंधी ने बताया कि चोर उनके पड़ोस में निर्माणाधीन इमारत से उनकी इमारत पर चढ़े और दरवाजा उखाड़ कर वारदात कर गए।

सिपाही थके हारे, चोरों के वारे न्यारे!

पुलिस गश्त के बावजूद पंद्रह दिनों में पुलिस नियंत्रण कक्ष से कुछ ही दूरी पर हुई चोरी की दो बड़ी वारदातों पर पुलिस कार्रवाई पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। शक्तिनगर में हुई चोरी की वारदात के अनुसंधान में पुलिस अब तक यह पता लगा पाई है कि इस प्रकार की वारदात डेरों में रहने वाले युवक करते हैं। पुलिस किसी डेरे में दबिश देती, उससे पहले चोरों ने दूसरी बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया। दोनों ही वारदातों में एक ही मोडस ऑपरेंडी सामने आई है। दूसरी वारदात में घटना स्थल पर मिले फिंगर प्रिंट, फुटमार्क से मिलान करवाया जा रहा है। अगर ये प्रिंट मिलते हैं तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि दोनों वारदातों को एक ही गिरोह ने अंजाम दिया है। इस गिरोह में शामिल युवाओं की उम्र भी 20 से 25 साल के बीच बताई जा रही है। चोरों ने शक्तिनगर में वारदात के दौरान मोमबत्ती जलाई थी और बापूबाजार में इमरजेंसी लाइट। पहली वारदात में धूम्रपान किया था और दूसरी में शौच करके चले गए।

दुकानदार : गश्त बढ़ाएं
विज्ञापन एजेंसी के शिवकुमार रावत का कहना है कि अब तक सुरक्षित माने जाने वाला बापूबाजार भी चोरों के निशाने पर है। पुलिस सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध करें ताकि भविष्य में ऐसी वारदातें नहीं हो।

पुलिस : गिरोह की तलाश
एएसपी तेजराजसिंह का कहना है कि शक्तिनगर और बापू बाजार की वारदात को एक ही तरीका है। ऐसे गिरोह के सदस्यों के फिंगर प्रिंट निकलवाए हैं। खानाबदोश के डेरों में तलाशी की जा रही है। पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है।

भाजपा फिर बचाव में आई ममता ने आंखें दिखाई

दिल्ली/कोलकाता, एजेंसी: नक्सल मुद्दे पर जहां मुख्य विपक्षी दल भाजपा पी. चिदंबरम का खुला समर्थन कर रही है वहीं सरकार में शामिल तृणमूल कांग्रेस गृह मंत्री के लिए लगातार मुसीबत खड़ी कर रही है। तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और केंद्रीय रेल मंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि माकपा ने पश्चिमी मिदनापुर जिले में माओवाद निरोधी संयुक्त अभियान को अगवा कर लिया है और चिदंबरम इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। ममता ने कहा कि लालगढ़ में एक भी माओवादी नहीं है। वहां माकपा कैडरों के इशारे पर आदिवासियों व विपक्षी समर्थकों के खिलाफ केंद्र और राज्य सरकार का संयुक्त पुलिस अभियान चल रहा है। ममता ने कहा कि उनके पास इस बात के साक्ष्य हैं कि जंगल महल में 200 माकपा कैडरों के कैंप चल रहे हैं। उन्होंने चिदंबरम से सवाल किया कि वह बताएं कि क्या माकपा कैडरों को संरक्षण देने और विपक्षी समर्थकों की हत्या के लिए लालगढ़ में संयुक्त ऑपरेशन चलाया जा रहा है? ममता ने कहा कि दर्जनों कैंपों में हथियारों का जखीरा मौजूद है। इसके सहारे प्रतिदिन तृणमूल समर्थकों की हत्या की जा रही है। बंगाल में तुगलकी शासन चल रहा है। जब दंगे के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से पूछताछ हो सकती है तो नंदीग्राम में मारे गए लोगों के लिए बुद्धदेव से क्यों नहीं हो सकती। ममता के इतर भाजपा ने चिदंबरम का समर्थन करते हुए कहा है कि इस युद्ध जैसी स्थिति में देश को एक स्वर में बोलने की जरूरत है। भाजपा ने कहा कि इस समस्या से लड़ने के बारे में सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी में एक राय नहीं है। भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि दिग्विजय सिंह द्वारा चिदंबरम के दृष्टिकोण की सार्वजनिक आलोचना इस बात का सुबूत है कि माओवाद के खिलाफ लड़ाई के मामले पर कांग्रेस में मतभेद हैं। उन्होंने कहा कि दिग्विजय के बयान ने हमारी इस आशंका को पक्का कर दिया है कि केंद्रीय बल बिना किसी उचित तैयारी के भेजे गए थे।

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

नक्सलियों ने भेदा खुफिया तंत्र

नई दिल्ली -नक्सलियों ने अब तक के सबसे बड़े इस हमले के लिए शिकंजा भी बेहद अचूक तैयार किया था। उन्होंने सुरक्षा बलों के खुफिया तंत्र में घुसपैठ कर उस इलाके में नक्सल ट्रेनिंग कैंप चलने की झूठी सूचना भिजवाई। कार्रवाई के लिए जब सुरक्षा बल पहुंचे तो उन पर तीन तरफ से घात लगा कर जबर्दस्त हमला किया गया। सुरक्षा बलों के खुफिया नेटवर्क में नक्सलियों की घुसपैठ कितनी तगड़ी थी, इस बात का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि वहां उपलब्ध सारी फोर्स इस सूचना पर कार्रवाई के लिए निकल पड़ी। गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि ऐसी सूचना पर फौरी कार्रवाई तभी होती है, जब सूत्र बहुत पुराना और विश्वसनीय हो। इसके बावजूद इतने बड़े अभियान पर निकलने से पहले उसे दूसरे सूत्रों से भी पक्का किया जाता है। इसलिए लगता है कि नक्सलियों ने वहां के सरकारी खुफिया नेटवर्क में बहुत जोरदार पैठ बनाई थी। सीआरपीएफ की डेढ़ कंपनी हमले के इरादे से निकल पड़ी। नक्सलियों की कामयाबी में कुछ योगदान वहां मौजूद सुरक्षा बलों की ओर से लिया गया रणनीतिक फैसला भी हो सकता है। ऐसे ऑपरेशन को संचालित करने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि आम तौर पर अभियान में शामिल सारे लोग एक साथ किसी जगह नहीं जाते। जबकि नक्सलियों ने जिस जगह सुरक्षा बलों को घेरकर मारा वह तीन तरफ से ऊंची पहाडि़यों से घिरा मैदान जैसा इलाका था। लिहाजा सुरक्षा बलों को पलटवार का कोई मौका भी नहीं मिल पाया। ऐसे में सुरक्षा बलों के पास सिर्फ छुपकर खुद को बचाना ही एकमात्र चारा था। जवानों ने पेड़ की ओट ली, लेकिन नक्सलियों ने वहां पहले से ही प्रेशर माइंस लगाई हुई थीं। ज्यादातर मौतें इन प्रेशर माइंस के फटने से हुईं। यह हमला नक्सलियों के बेहतर खुफिया तंत्र और गुरिल्ला रणनीति के साथ ही आधुनिकतम तकनीक के इस्तेमाल में बढ़ती उनकी महारथ के संकेत दे रहा है। इस हमले में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग रोधी गाड़ी (एमपीवी) को भी उड़ा दिया। गृह मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि नक्सलियों की ट्रेनिंग में इस्तेमाल होने वाला ऐसा दस्तावेज हाल ही में बरामद किया गया था जिसमें एमपीवी उड़ाने की तकनीक समझाई गई है, लेकिन यहां उन्होंने इस तकनीक का इस्तेमाल भी कर दिखाया। इस तकनीक में एमपीवी को उड़ाने के लिए काफी बड़ी मात्रा में विस्फोटक की जरूरत होती है।

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

पक्ष-विपक्ष की लामबंदी तेज

नई दिल्ली,-लोस व राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने संबंधी विधेयक पर संसद में लामबंदी तेज हो गई है। बिल के मौजूदा स्वरूप पर विपक्ष बंटा हुआ है। सपा, राजद व जद (यू) ने विधेयक के विरोध का ऐलान कर दिया है जबकि भाजपा व वामदलों ने इसका समर्थन करने की घोषणा की है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला दिवस पर इसे देश की महिलाओं के लिए दिया जाने वाला तोहफा करार दिया है तो विधेयक विरोधियों की नाराजगी कम करने के लिए कानून मंत्री ने पिछड़ा वर्ग आरक्षण को अलग मुद्दा बताते हुए उसके लिए अलग पहल करने का सुझाव दिया है। वहीं, राज्यसभा की कार्यमंत्रणा समिति ने विधेयक को सोमवार को सदन में पेश करने और उस पर चर्चा व पारित कराने के लिए चार घंटे का समय आवंटित कर दिया है। विधेयक को पेश करने व उसे पारित कराने के लिए माहौल बनाने में जुटी सरकार की तरफ से कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने नई पहल करते हुए कहा है कि संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा में अनुसूचित जाति जनजातियों को आरक्षण प्रदान किया गया है लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए ऐसा कोई आरक्षण नहीं है। जब तक यह नहीं होता, महिला आरक्षण के मामले में ऐसा नहीं कर सकते हैं। अगर विधेयक के विरोधी अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर बेहद इच्छुक है तो पहले उन्हें लोस और विस में अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं और पुरुषों के आरक्षित स्थान के लिए राष्ट्रीय आम सहमति कायम करनी चाहिए। यह पूरी तरह अलग मुद्दा है और यह काम इस विधेयक को पारित करने के बाद भी हो सकता है। विपक्षी दलों का मानना है कि इस समय बिना सहमति विधेयक लाने का सरकार का इरादा केवल विपक्षी एकता को तोड़ने का है। सूत्रों के अनुसार विपक्ष के सभी दल अपनी अपनी रणनीति के मुताबिक इस विधेयक का समर्थन व विरोध तो करेंगे, लेकिन अन्य मुद्दों पर उनकी एकता बरकरार रहेगी। संविधान संशोधन विधेयक होने के नाते सदन का व्यवस्थित होना और उसकी संख्या का बहुमत के सदन में होने और उसमें भी दो तिहाई का समर्थन जरूरी है। मौजूदा स्थिति में सदन का व्यवस्थित होना संभव नहीं दिखता है। पहले के विधेयक पेश होने के मौकों पर भी दोनों सदन भारी हंगामे के गवाह रह चुके हैं। सपा, राजद व जद (यू) ने साफ कर दिया है कि विधेयक का वे विरोध करेंगे। सपा की तरफ से लोकसभा में मुलायम सिंह यादव ने बुधवार को ही चेतावनी दे दी थी। गुरुवार को राज्यसभा में रामगोपाल यादव ने भी दो टूक कहा कि जद (यू) नेता नीतीश व शरद यादव, राजद नेता लालू यादव, सपा नेता मुलायम सिंह यादव और बसपा नेता मायावती इस मामले पर एकजुट हों। साथ ही वे संयुक्त बैठक कर विचार करें कि पिछड़ों के खिलाफ किस तरह की साजिश की जा रही है। इसके खिलाफ रणनीति भी बनायें ताकि यह साजिश सफल न होने पाये। लालू यादव ने कहा है कि हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध करते हुए कहा कि देश की राष्ट्रपति महिला हैं, लोकसभा की अध्यक्ष महिला हैं, कांग्रेस अध्यक्ष और संप्रग की अध्यक्ष भी महिला हैं और वे यहां महिला कोटे के कारण नहीं आईं हैं।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

विदेश भेजने के नाम पर एक व्यक्ति से लाखों रूपये ऐंठने का मामला

डबवाली(आजाद) विदेश भेजने के नाम पर उपमंडल के गांव मसीतां के एक व्यक्ति से लाखों रूपये ऐंठने का मामला प्रकाश में आया है। पीडि़त व्यक्ति ने अपने वकील के माध्यम से डीएसपी डबवाली, एसएचओ थाना शहर डबवाली, सीआईए सिरसा, डीजीपी चण्डीगढ़ क्राईम ब्रांच पंजाब पुलिस को एक लिखित शिकायत भेजकर अपने पैसे वापिस दिलवाने की मांग की है। अधिकारियों को भेजी गई शिकायत में पीडि़त गांव मसीतां निवासी सुखराज सिंह पुत्र वजीर ङ्क्षसह ने आरोप लगाया है कि वह गांव मसीतां में खेतीबाड़ी का कार्य करता है तथा अपनी आॢथक स्थिति सुधारने के लिए उसने विदेश जाने का मन बनाया। इसी दौरान उसे गांव डबवाली निवासी भिन्दर सिंह ने उसे फिलीपींस भेजने का झांसा देकर उससे इसकी एवज में साढ़े चार लाख रूपयों की मांग की। फिलीपींस जाने के लालच में उसने उक्त भिन्दर ङ्क्षसह को चार बार में साढ़े चार लाख रूपये दे दिए। इसके बाद उक्त भिन्दर सिंह ने उसे मुम्बई एयरपोर्ट से फिलीपींस के लिए रवाना कर दिया। फिलीपींस पहुंचने पर एयरपोर्ट पर उसे सर्वजीत ङ्क्षसह, जगतार सिंह, गुरमी व चरणजीत उर्फ सोढी एक टैक्सी में बिठा कर अपने घर ले गए एवं उन्होंने उसे एक कमरे में बन्द कर दिया तथा मेरी कागजी कार्रवाई के नाम पर उसके परिजनों से लाखों रूपये मंगवा लिए। सुखराज ङ्क्षसह ने आरोप लगाया कि इन लोगों ने फिलीपींस में उसे जान से मारने की धमकी देकर डराया-धमकाया। इसके पश्चात उसने फिलीपींस में रहने वाले अपने दूर के संबंधी अमनदीप से सम्पर्क किया तथा उसे आपबीती बताई। अमनदीप ने बाद में उसे टिकट आदि का इंतजाम कर वापिस भारत भेजा। यहां पहुंचकर उसने अपने परिजनों को इसकी जानकारी दी। अपने परिजनों सहित वह स्वयं भिन्दर आदि से मिले तथा अपने पैसों की मांग की। उन्होंने आजकल कहते हुए उन्हें टरकाना शुरू कर दिया। पीडि़त सुखराज सिंह ने आरोप लगाया कि इस मामले में थाना शहर पुलिस व डीएसपी को शिकायत करने के बावजूद इंसाफ नहीं मिला। जब इस बारे में थाना शहर के एएसआई कैलाश चन्द्र से सम्पर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि इस मामले में शिकायतकर्ता के पास गवाह आदि सबूत न होने से मामला दर्ज नहीं किया गया।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

Indian High Commissioner to meet officials in Queensland

PTI ,--Indian High Commissioner Sujatha Singh is set to hold talks with Queensland’s senior police and community leaders over the ongoing attacks on Indians in this Australian state. Media reports said Queensland’s political leaders have defended Australia saying it is not a racist country. The comments came after report of the Indian High Commissioner would attend a meeting with senior police and community leaders in the state. Queensland Premier Anna Bligh said she believed that the country was a very tolerant and encompassing community.
“But racism from time to time does rear its ugly head,” she said. Brisbane City Council Mayor Campbell Newman also agreed to the view, saying at an Australia Day event that he did not believe Australia was a racist country.

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

कॉमनवेल्‍थ की साइट पर भारत की जमीन पाक में

एजेंसी
नई दिल्‍ली. कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन की आधिकारिक साइट पर लगे हिंदुस्‍तान के नक्‍शे से जम्‍मू-कश्‍मीर और गुजरात का एक बड़ा हिस्‍सा गायब है। इसे पाकिस्‍तान में दिखाया गया है। यह स्‍थिति तब है जब भारत कॉमनवेल्‍थ फेडरेशन का प्रमुख मेंबर है। भारत की राजधानी में इस साल कॉमनवेल्थ गेम्स भी होने वाले हैं। इस वेबसाइट को कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन अपडेट करती है। यह ख्ाबर जैसे ही सामने आई, फेडरेशन से लेकर दिल्ली गेम्स ऑर्गनाइजिंग कमिटी तक में बवाल मच गया है। कमिटी के सचिव ललित भनोट ने इसे एक गंभीर मामला बताते हुए कहा है कि यह एक गंभीर मामला है। भनोट ने कहा कि इसे बिलकुल स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ में फेडरशन से इस नक्शे को हटाने के लिए कहा जाएगा।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

Embarrassment over Indian ad with Pakistan ex-air chief

The advertisement appeared in Indian newspapers on Sunday


Indian officials have apologised after a government advertisement included an image of a Pakistani ex-air force chief alongside various acclaimed Indians. Tanvir Mahmood Ahmed was pictured with notable Indians such as Prime Minister Manmohan Singh and cricketer Kapil Dev in an anti-female foeticide campaign. The full-page newspaper ad was produced by the women and child development ministry for National Girl Child Day.
The government has ordered an inquiry into the error.
Former Air Marshal Ahmed said the inclusion of his photograph in the advertisement was probably an "innocent mistake". Shocked "The prime minister's office has noted with regret the inclusion of a foreign national's photograph in a government of India advertisement. While an internal inquiry has been instituted, the PMO apologises to the public for this lapse," the prime minister's media adviser Harish Khare said in a statement. The full-page advertisement appeared in Indian newspapers on Sunday and had photos of the Prime Minister Manmohan Singh, Congress party chief Sonia Gandhi and junior minister for women and child development Krishna Tirath. The advertisement also included photographs of two of India's cricketing heroes, Kapil Dev and Virendra Sehwag, as well as musician Amjad Ali Khan. Many people in India were shocked to see that the advertisement also included the photograph of former Air Chief Marshal Tanvir Ahmed, a former chief in the Pakistani Air Force. Mrs Tirath said she had set up a committee to find out how the photograph appeared in the advertisement. "I have expressed regret and also sought an apology on behalf of the ministry over the lapses. We should be cautious so that such mistakes are not repeated in the future," she said. The minister said the inquiry committee will give its report in a fortnight. "I wasn't aware about this... I was busy with a golf match and didn't know about this development," news agency Press Trust of India quoted retired Air Chief Marshal Ahmed as saying. "I guess it's just one of those errors. It must be an innocent mistake," he said.


मंगलवार, 19 जनवरी 2010

सभी डीम्ड विश्वविद्यालय खत्म होंगे, छात्रों को मिलेगी डिग्री: सिब्बल

नई दिल्ली, एजेंसी केंद्र सरकार से स्पष्ट कर दिया है कि आखिरकार सभी डीम्ड विश्वविद्यालयों को जाना होगा। लेकिन जिन डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता समाप्त करने से संबंधित कार्यबल की रिपोर्ट को स्वीकार किया गया है, उन संस्थाओं के किसी भी छात्र को इससे प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा और उन्हें विश्वविद्यालय की डिग्री मिलेगी।मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने मंगलवार को कहा कि यह मामला उच्चतम न्यायालय के अधीन है। डीम्ड विश्वविद्याल के संबंध में कई तरह की शिकायतों के मद्देनजर जून 2009 में प्रो. पीके टंडन के नेतृत्व में एक कार्यबल का गठन किया गया था। समिति ने अपनी सिफारिशें पेश की हैं। हमने कार्यबल की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है और इसे उच्चतम न्यायालय के समक्ष पेश कर दिया है। उन्होंने कहा कि अब यह विषय न्यायालय को तय करना है।
सामाजिक मुद्दों पर संपादकों के 10वें सम्मेलन से इतर एक प्रश्न के उत्तर में सिब्बल ने कहा कि सरकार का इरादा यह बिल्कुल नहीं है कि इसके कारण कोई भी छात्र प्रभावित हो। इसके दायरे में आने वाले सभी छात्रों को डिग्री मिलेगी। उनके हितों की रक्षा की जाएगी।केंद्र ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में पेश हलफनामे में कहा कि उसने देश के उन 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों की मान्यता समाप्त करने से संबंधित एक कार्यबल की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है, जिन पर आरोप है कि वह शैक्षिक संस्थाओं की बजाय पारिवारिक जागीर के रूप में काम कर रहे हैं। सिब्बल ने कहा कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही कुछ समय पहले रिपोर्ट प्राप्त हो जाने के बावजूद इसे सार्वजनिक नहीं किया था। उन्होंने कहा कि कार्यबल की रिपोर्ट के आधार पर हमने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट कर दिया कि इन छात्रों के हितों की रक्षा के लिए क्या कार्ययोजना है।आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि डीम्ड विश्वविद्यालय मूल रूप से कॉलेज रहे हैं, जिन्हें डीम्ड का दर्जा प्रदान किया गया था, अब इनका डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा वापस लेने के बाद भी ये कॉलेज तो बने ही रहेंगे। उन्होंने कहा कि इस स्थिति में ये किसी अन्य विश्वविद्यालय से समबद्धता प्राप्त कर डिग्री प्रदान कर सकते हैं।बहरहाल, सिब्बल ने मामला न्यायालय के अधीन होने के कारण इस पर विशेष कुछ भी बताने से इनकार कर दिया। हालांकि उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि आने वाले समय में डीम्ड विश्वविद्याल की अवधारणा समाप्त हो जाएगी।इससे पहले सोमवार को केंद्र ने अपने एक शपथ पत्र में कहा था कि 13 राज्यों में स्थित इन विश्वविद्यालयों के कॉलेजों में पढ़ने वाले करीब दो लाख विद्यार्थियों के भविष्य को अंधकारमय होने से बचाने के लिए उन्हें मूल विश्वविद्यालयों से मान्यता प्राप्त कॉलेजों में फिर से पढ़ने जाने की अनुमति होगी।न्यायालय में यह शपथपत्र मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पेश किया था। मंत्रालय ने कहा था कि सरकार ने उच्च अधिकार प्राप्त पीएन टंडन समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है तथा इस समस्या से निपटने के लिए सुझाव देने के लिए विशेष कार्य बल गठित करने का निर्णय किया है।शपथपत्र में कहा गया कि समीक्षा समिति को डीम्ड विश्वविद्यालय की मान्यता प्राप्त कुछ संस्थानों की कार्यप्रणाली में कई गड़बड़ियों की जानकारी प्राप्त हुई। इन शिक्षण संस्थाओं के प्रबंधन बोर्ड की संरचना भी बढ़ेगी, क्योंकि इनके कामकाज पर नियंत्रण पेशेवर शिक्षाविदों की बजाय परिवार के लोगों का था।केंद्र के अनुसार नियमों का उल्लंघन करने वाले 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों में से अधिकतर पोस्ट ग्रेजुएट और अंडरग्रेजुएट पाठ्यक्रमों का संचालन कर रहे थे। पाठ्यक्रम ढीले-ढाले और इनके नाम भी भ्रमित करने वाले थे और उनमें दाखिला क्षमता से कहीं अधिक और असंगत तरीके से विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया था।

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