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रविवार, 27 दिसंबर 2009

राजौरी-पुंछ में तेंदुओं-रीछ की शामत

राजौरी,जंगलों में अवैध कटाई और पानी की कमी के कारण तेंदुए न केवल आबादी वाले क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं, बल्कि आदमखोर भी बन रहे हैं। राजौरी और पुंछ में अब तक 16 लोग उनके ग्रास बन चुके हैं, जबकि सौ से ज्यादा जख्मी हो चुके हैं। तेंदुओं के हमलों से आजिज आ चुके इन दोनों जिलों के ग्रामीण अब उन्हें खत्म करने पर उतर आए हैं। ग्रामीण अब तक 12 तेंदुओं और दस रीछों को मौत के घाट उतार चुके हैं। वन्यजीव विभाग भी जंगली जानवरों को रिहायशी क्षेत्रों से दूर रखने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय उन्हें मौत के घाट उतारने का बेहिचक आदेश दे रहा है। यही नहीं वह उन ग्रामीणों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं करता जिनके हाथों तेंदुए अथवा रीछ मारे जा रहे हैं। पिछले कुछ समय में राजौरी और पुंछ जिलों के थन्ना मंडी, नौशहरा, कालाकोट सहित करीब दर्जन भर इलाकों में तेंदुए हमले कर चुके हैं। इसी तरह बुद्धल, सवाड़ी, पीढ़ी, चंडीमंढ आदि क्षेत्रों में रीछों का कहर है। कई गांवों में इन दोनों जानवरों का खौफ इतना बढ़ चुका है कि लोग अकेले और बिना लाठी के घरों से बाहर कदम तक नहीं रखते हैं। जब ग्रामीण किसी जंगली जानवर को मौत के घाट उतार देते हैं तो वन्यजीव विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि गांव के नाम पर मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य का इतिश्री कर लेते हैं। कभी कभार ग्रामीणों से बचकर यदि कोई तेंदुआ निकल भी जाता है तो विभाग उसे मारने का फरमान सुना देता है। वन्यजीव विभाग अभी तक तीन तेंदुओं को मौत के घाट उतारने का आदेश जारी कर चुका है। वन्यजीव विभाग के राजौरी-पुंछ रेंज के अधिकारी विजय सिंह का कहना है कि जो तेंदुए आदमखोर घोषित किए गए हैं उन्हें जल्द ही मार दिया जाएगा। हम लोग गांव-गांव जाकर जानवरों से निपटने के गुर भी लोगों को सिखा रहे हैं। राजौरी में वाइल्ड लाइफ सेंच्युरी व नेशनल पार्क बनाने के लिए प्रस्ताव सरकार के पास भेज रखा है, लेकिन फिलहाल किसी को पता नहीं कि उसे कब मंजूरी मिलेगी।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

चंडीगढ़ : बख्शीश सिंह, भगत सिंह, मदन सिंह, अमर सिंह, सोम प्रकाश, मेहर सिंह, उजागर सिंह, तेजा सिंह, मुकंद सिंह, मस्ता सिंह, दिलीप सिंह, दीप सिंह, अमर सिंह, हरनाम सिंह और मोहन सिंह। ये 15 नाम भी उन लाखों में शुमार हैं, जो कभी सबकुछ दांव पर लगाकर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे थे। वतन को फिरंगियों से निजात दिलाने वाले ये सूरमा अब उस सूची में शामिल हैं, जिन्हें हाल ही में पंजाब विधानसभा ने श्रद्धांजलि अर्पित की है। हर विधानसभा सत्र में यह सूची लंबी हो जाती है और स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या धीरे-धीरे लाखों से सैकड़ों में सिमटती जा रही है। सरकार के ताजा रिकार्ड के अनुसार अब केवल 861 स्वतंत्रता सेनानी जीवित हैं। अपने पतियों के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने की कीमत चुकाने वाली जिंदा गवाहों में शुमार पत्नियों की संख्या भी तेजी से कम हो रही है। स्वतंत्रता सेनानियों के कल्याण की जिम्मेदारी उठाने वाले विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अब 1788 स्वतंत्रता सेनानी विधवाएं जीवित बची हैं। विभागीय सूत्रों ने बताया कि फिलवक्त स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर 2662 पेंशनें वितरित हो रही हैं। इनमें से 13 तो स्वतंत्रता सेनानियों की लड़कियों को विशेष श्रेणी के तहत मिल रही हैं। ये लड़कियां अविवाहित एवं बेरोजगार हैं। यह आंकड़ा जारी वित्तीय वर्ष (2009-10) का है, जबकि बीते वित्तीय वर्ष (2008-09) में यह संख्या 2900 थी। एक वर्ष में ही 250 पेंशनें कम होने का अर्थ स्पष्ट है कि देश धीरे-धीरे अपने अमूल्य गहनों से वंचित हो रहा है। नि:संदेह वक्त का यह कड़वा सच देश के लिए जरा सा भी अहसास पालने वाले देश-प्रेमियों की आंखों को नम कर उनमें देशप्रेम का जज्बा भर देता है। ऐसे लोगों को यह जानकर भी गहरा धक्का लगेगा कि प्रदेश सरकार के स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है, जो बता सके कि पंजाब की सरजमीं ने कुल कितने स्वतंत्रता सेनानी पैदा किए थे। विभाग के सचिव जगजीत पुरी ने इस सवाल पर दैनिक जागरण को दो टूक कहा, कुल कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, कितने जिंदा हैं..यह आंकड़ा एकत्र करने में तीन दिन का समय लगेगा। वहीं, विभागीय सूत्र बताते हैं कि यह आंकड़ा तो है कि स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब से कुल कितने स्वतंत्रता सेनानियों ने हिस्सा लिया था। यह आंकड़ा मोहाली स्थित पुन:अर्थ संपत्ति विभाग के कार्यालय में होगा। स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग के अस्तित्व में आने से पहले यह काम वही विभाग देख रहा था। पता चला है कि स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग ने पुन:अर्थ संपत्ति विभाग के कार्यालय को यह आंकड़ा देने के लिए लिखा हुआ है। ज्ञात रहे, प्रदेश में स्वतंत्र रूप में स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग बने कई दशक गुजर चुके हैं।

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

चंडीगढ़ : बख्शीश सिंह, भगत सिंह, मदन सिंह, अमर सिंह, सोम प्रकाश, मेहर सिंह, उजागर सिंह, तेजा सिंह, मुकंद सिंह, मस्ता सिंह, दिलीप सिंह, दीप सिंह, अमर सिंह, हरनाम सिंह और मोहन सिंह। ये 15 नाम भी उन लाखों में शुमार हैं, जो कभी सबकुछ दांव पर लगाकर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे थे। वतन को फिरंगियों से निजात दिलाने वाले ये सूरमा अब उस सूची में शामिल हैं, जिन्हें हाल ही में पंजाब विधानसभा ने श्रद्धांजलि अर्पित की है। हर विधानसभा सत्र में यह सूची लंबी हो जाती है और स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या धीरे-धीरे लाखों से सैकड़ों में सिमटती जा रही है। सरकार के ताजा रिकार्ड के अनुसार अब केवल 861 स्वतंत्रता सेनानी जीवित हैं। अपने पतियों के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने की कीमत चुकाने वाली जिंदा गवाहों में शुमार पत्नियों की संख्या भी तेजी से कम हो रही है। स्वतंत्रता सेनानियों के कल्याण की जिम्मेदारी उठाने वाले विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अब 1788 स्वतंत्रता सेनानी विधवाएं जीवित बची हैं। विभागीय सूत्रों ने बताया कि फिलवक्त स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर 2662 पेंशनें वितरित हो रही हैं। इनमें से 13 तो स्वतंत्रता सेनानियों की लड़कियों को विशेष श्रेणी के तहत मिल रही हैं। ये लड़कियां अविवाहित एवं बेरोजगार हैं। यह आंकड़ा जारी वित्तीय वर्ष (2009-10) का है, जबकि बीते वित्तीय वर्ष (2008-09) में यह संख्या 2900 थी। एक वर्ष में ही 250 पेंशनें कम होने का अर्थ स्पष्ट है कि देश धीरे-धीरे अपने अमूल्य गहनों से वंचित हो रहा है। नि:संदेह वक्त का यह कड़वा सच देश के लिए जरा सा भी अहसास पालने वाले देश-प्रेमियों की आंखों को नम कर उनमें देशप्रेम का जज्बा भर देता है। ऐसे लोगों को यह जानकर भी गहरा धक्का लगेगा कि प्रदेश सरकार के स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है, जो बता सके कि पंजाब की सरजमीं ने कुल कितने स्वतंत्रता सेनानी पैदा किए थे। विभाग के सचिव जगजीत पुरी ने इस सवाल पर दैनिक जागरण को दो टूक कहा, कुल कितने स्वतंत्रता सेनानी थे, कितने जिंदा हैं..यह आंकड़ा एकत्र करने में तीन दिन का समय लगेगा। वहीं, विभागीय सूत्र बताते हैं कि यह आंकड़ा तो है कि स्वतंत्रता संग्राम में पंजाब से कुल कितने स्वतंत्रता सेनानियों ने हिस्सा लिया था। यह आंकड़ा मोहाली स्थित पुन:अर्थ संपत्ति विभाग के कार्यालय में होगा। स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग के अस्तित्व में आने से पहले यह काम वही विभाग देख रहा था। पता चला है कि स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग ने पुन:अर्थ संपत्ति विभाग के कार्यालय को यह आंकड़ा देने के लिए लिखा हुआ है। ज्ञात रहे, प्रदेश में स्वतंत्र रूप में स्वतंत्रता सेनानी कल्याण विभाग बने कई दशक गुजर चुके हैं।

सरकार ने माना गंगा डुबकी लायक नहीं

नई दिल्ली, भगीरथी के दामन से प्रदूषण के दाग धोने पर अरबों रुपया बहाने के बावजूद सरकार के तथ्य बताते हैं कि गंगोत्री से लेकर डायमंड हार्बर के बीच अधिकतर स्थानों पर गंगा जल से दूर रहने में भलाई है। वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश 30 दिसंबर को वाराणसी में गंगा नदी के प्रदूषण की समीक्षा करेंगे। वह गंगा के उन घाटों का भी मुआयना करेंगे जहां नाले शहर की गंदगी को नदी में उड़ेलते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ताजा आंकड़े बताते हैं कि बनारस के अस्सीघाट पर बीते दो सालों में प्रदूषण का पैमाना कहलाने वाले बीओडी का स्तर कभी भी 3 मिग्रा प्रति लीटर की नियत सीमा तक कम नहीं रहा। बनारस हो या संगम स्थली इलाहाबाद, बीते बारह बरस में पानी का स्तर साफ डी श्रेणी से ऊपर नहीं उठ पाया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पानी के वर्गीकरण के तहत डी श्रेणी का पानी केवल जानवरों के लिए ही मुफीद है। गंगा एक्शन प्लान के नाम पर 800 करोड़ रुपये बहाने के बावजूद गंगा को प्रदूषण मुक्ति में नाकाम रही सरकार खुद संसद में स्वीकार कर चुकी है कि अधिकांश स्थानों पर पानी में मौजूद कोलीफार्म का स्तर निर्धारित सीमा से काफी ज्यादा है। कोलीफार्म की निर्धारित सीमा प्रति 100 मिली पानी में 2500 एमपीएन (सर्वाधिक संभावित संख्या) है। पर्यावरण मंत्रालय मानता है कि ऋषिकेश से लेकर बंगाल के उलबेरिया के बीच सोलह में सात स्थानों पर गंगा का पानी नहाने योग्य नहीं है। इस बारे में बीते दिनों संसद में एक सवाल के जवाब में पर्यावरण मंत्रालय का कहना था कि पानी में कोलीफार्म का स्तर नदी स्नान के कारण बढ़ रहा है और केवल हरिद्वार ही ऐसा स्थान है जहां इसकी मात्रा निर्धारित सीमा में है। इस संबंध में आईआईटी, कानपुर, बीएचईएल और पटना विश्वविद्यालय का अध्ययन बताते हैं कि घुलित आक्सीजन और बीओडी के स्तर में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन कन्नौज से लेकर वाराणसी के बीच स्थिति खराब बनी हुई है।

सोमवार, 30 नवंबर 2009

युवाओ को चुनोती देता है ये वरिष्ठ नागरिक जोड़ा



सिरसा (प्रदीप सचदेवा )"जीवन का अन्तिम पड़ाव इसकी साँझ नहीं होता बल्कि ये तो एक नये दिन कि शुरुआत होती है", यह वो सन्देश है जो एक वरिष्ट स्विस नागरिक जोड़ा अपनी साइकिल यात्रा के माध्यम से देता हुआ पूरे विश्व की यात्रा पर है.63 वर्षीय हम्मान और 53 वर्षीय उर्नी विश्व के 9 देशो का साइकिल पर 8000 किलोमीटर यात्रा कर गत दिवस सिरसा पहुँचे.उन्होंने अपने इस प्रवास के दौरान स्थानीय होटल सिटी वियु में रूककर सिरसा को बहुत गहराई से देखा.यहीं पर इस जोड़े ने मल्टीलिंकर्स डोट कॉम के निदेशक प्रदीप सचदेवा के साथ अपनी इस यात्रा के अनुभवो को साँझा किया . उन्होंने बताया कि अपने जीवन के सभी जिम्मेवारिओं को पूरा करने के बाद उन्होंने तन और मन से जवान रहने के मकसद से ये यात्रा का फैसला लिया था,अब इस यात्रा को करते हुए वे अनुभव करते हैं कि उनका फैसला ठीक था.हम्मान बताते हैं कि उनके 35 -33 वर्षीय दो पुत्र हैं जो कि दोनों शादी शुदा हैं और आनंदपूर्वक अपना जीवन जी रहे हैं.अपने कारोबार से फारिग होने के बाद जब उन्होंने अपने बेटों के सामने इस यात्रा करने कि इच्छा प्रगट कि तो उन्होंने न केवल इसमें ख़ुशी जताए बल्कि उन्हें इसके लिए हर तरह का सहयोग देकर उत्साहित भी किया.भारत के बारे में उर्नी को जो सबसे अच्छा लगा वो था यहाँ के लोगो का अपनापन और उनके प्रति रोमंच.
वे कहती हैं कि भारत के लोगों के लिए वे लोग किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों से कम नहीं है,यहाँ तक कि लोग उन्हें छु कर तसल्ली करते हैं कि वे भी इंसान ही हैं.धर्म-सम्प्रदाय के बारे में पूछने पर ये जोड़ा कहता है कि सभी सबसे पहले इंसान ही हैं,धर्म -सम्प्रदाय इसके बाद आते हैं.भारत में वाघा बोर्डर से प्रवेश करने के बाद जब उन्होंने स्वर्ण मंदिर के अमृतसर में दर्शन किये तो उनका अनुबव बहुत अनूठा था.भारत में उनका प्रवास छे महीने का है जिसमे वे हरियाणा के बाद राजस्थान और तमिलनाडु देखेंगे.जिसके बाद वे लगभग आधा दर्जन और देशो का दौरा करेंगे.अगले पड़ाव के लिए जाने से पहले लोगों के नाम दिए सन्देश में इस दम्पति ने कहा कि हमें हमेशा अग्रणी पंक्ति में ही रहना चहिये और जीवन को प्रगतिशील सोच से आगे बढ़ाना चाहिए,वास्तविक ख़ुशी इसी से मिलती है.जो भी हो उर्नी और हम्मान की साइकिल द्वारा पूरे विश्व की यात्रा युवाओं को भी चुनोती देती दिखाई देती है और बोहुतो को जीवन को नये अंदाज में जीने की प्रेरणा देती है. होटल के संचालक रमेश मेहता और इस संवाददाता से शुभकामनाएं स्वीकार कर ये उर्जावान जोड़ा आगे बढ़ गया.

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

काल्पनिक कर्मचारियों को वेतन



दिल्ली नगर निगम में कई हज़ार काल्पनिक कर्मचारी
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दिल्ली सरकार ऐसे 22,853 कर्मचारियों को तनख़्वाह दे रही है जिनका वजूद ही नहीं है.

दिल्ली के मेयर कंवर सेन ने एक बयान में कहा कि इन काल्पनिक कर्मचारियों की तनख़्वाह कुल मिलाकर चार करोड़ 30 लाख डॉलर सालाना बैठती है.

इस घपले का पता तब चला जब प्रशासन ने उपस्थिति दर्ज करने की बायोमिट्रिक प्रणाली लागू की.

संवाददाताओं का कहना है कि ये इस बात का संकेत है कि कुछ सरकारी अधिकारियों ने इन कर्मचारियों की सूची इसलिए बनाई जिससे राज्य कोष से धन निकाल सकें.

दिल्ली नगर निगम में एक लाख से अधिक सफ़ाई कर्मचारी, माली, अध्यापक और अन्य कर्मचारी हैं.

घोटाले की जानकारी

इस मामले की विस्तृत जांच की जाएगी जिससे तथ्यों का पता चल सके. और जिन अधिकारियों ने फ़र्ज़ी कर्मचारियों की सूची बनाकर सरकारी धन खाया है उनके ख़िलाफ़ सख़्त आनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी.

कंवर सैन, दिल्ली के मेयर
दिल्ली नगर निगम ने पिछले साल अगस्त के महीने में बायोमिट्रिक प्रणाली लागू की थी.

शहर के मेयर कंवर सेन का कहना है कि निगम में कुल 104,241 कर्मचारी हैं जबकि रिकॉर्ड के अनुसार इनकी संख्या 127,094 दिखाई जा रही थी.

सेन के कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि भुगतान अधिकारियों के आंकड़ों और बायोमिट्रिक प्रणाली में दर्ज कर्मचारियों की संख्या में 22,853 का अंतर है.

सेन ने कहा, "इस मामले की विस्तृत जांच की जाएगी जिससे तथ्यों का पता चल सके और जिन अधिकारियों ने कर्मचारियों की फ़र्ज़ी सूची बनाकर सरकारी धन खाया है उनके ख़िलाफ़ सख़्त आनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी."

लंबे समय से ये आशंका व्यक्त की जा रही थी कि नगर निगम को काल्पनिक कर्मचारियों के माध्यम से चूना लगाया जा रहा है लेकिन प्रशासन ने हमेशा इन आरोपों का खंडन किया.

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

खंडहरनुमा भवन


यह अररिया का एक अस्पताल है। सदर प्रखंड के रामपुर गांव का स्वास्थ्य उपकेन्द्र। ढाई दशक पहले बने इस अस्पताल में आज तक किसी का इलाज नहीं हुआ। वर्तमान में इस खंडहरनुमा भवन में गांव का एक परिवार निवास कर रहा है। जिले में ऐसे एक नहीं अनेक अस्पताल हैं, जो अरसे से निर्जन बने हुए हैं।

बुधवार, 25 नवंबर 2009

एचआईवी की रोकथाम में भारत का प्रदर्शन बेहतर



नई दिल्ली. एड्स पर नियंत्रण में भारत ने बेहतर प्रदर्शन किया है। यूएनएड्स और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, एचआईवी से सर्वाधिक प्रभावित कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में स्थिति बहुत सुधरी है। यहां 2000 से 2007 के बीच 15 से 24 वर्ष की युवतियों में एचआईवी का संक्रमण 54 फीसदी तक घटा है।

मंगलवार को जारी रिपोर्ट में भारत की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) की कोशिशों का लाभ इन राज्यों के 80 फीसदी सेक्स वर्करों तक पहुंचा है। 2003 से 2006 के बीच देश में सेक्स वर्करों के बीच एचआईवी का संक्रमण 10.3 प्रतिशत से घटकर 4.9 फीसदी रह गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले आठ सालों में दुनिया में एचआईवी के ताजा संक्रमण की रफ्तार में 17 प्रतिशत की कमी आई है। साथ ही इस लाइलाज बीमारी से मरने वालों की संख्या 10 फीसदी तक कम हुई है।

क्या कहते हैं आंकड़े

- 2008 में दुनियाभर में 3.34 करोड़ लोग एड्स पीड़ित थे, जबकि 2007 में यह संख्या 3.3 करोड़ थी।
- 2000 की तुलना में 2008 में एड्स पीड़ितों की संख्या 20 फीसदी से ज्यादा थी।
- दुनियाभर में अब तक 6 करोड़ लोग एचआईवी संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से 2.5 करोड़ की मौत हो चुकी है।
- सब सहारा अफ्रीकी क्षेत्र एड्स से सर्वाधिक प्रभावित।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

पौने दो लाख लोगों ने व्यापार मेले में मनाया संडे


नई दिल्ली प्रगति मैदान में चल रहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में रविवार को दर्शकों का सैलाब उमड़ पड़ा। हर तरफ खचाखच लोग। पांव रखने की भी जगह नहीं। न कोई हॉल और न ही अलग-अलग राज्यों के पवेलियन ही छूटे। इनमें घुसना मानों किसी बड़ी कामयाबी को हासिल कर लेने जैसा था। किसी फूड स्टाल पर बैठने की जगह नहीं थी। एक अनुमान के मुताबिक रविवार को मेला देखने तकरीबन पौने दो लाख दर्शक पहुंचे। इनमें से करीब एक लाख लोग टिकट खरीदकर आए थे। भीड़ का आलम रहा कि सुबह मेला शुरू होने के कुछ घंटे बाद से ही विभिन्न राज्यों के पवेलियनों में लंबी-लंबी लाइनों में लग कर ही प्रवेश मिल रहा था। ऐसा था नजारा : रविवार को मेले में भीड़ सुबह 10 बजे से ही बढ़ने लग गई। लोगों के लिए पहला व आखिरी संडे होने के कारण शायद हर कोई आज ही मेला देख लेना चाहता था। दोपहर होते-होते दर्शकों का आंकड़ा डेढ़ लाख तक पहुंचने लगा। विभिन्न हॉल व राज्य मंडपों में लाइन लगाकर ही प्रवेश मिल पा रहा था। कहां उमड़ी ज्यादा भीड़ : सबसे ज्यादा दर्शक रक्षा मंडप, घरेलू उपकरणों (हाल नंबर 1), इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (हाल नंबर 11), सरस (हाल नंबर 7डी), सौंदर्य प्रसाधन (हाल नंबर 4 एवं 5), खाद्य पदार्थ (हाल नंबर 2) में अधिक नजर आए। इन सभी हॉलों में प्रवेश के लिए दर्शकों को लाइनों में लगना पड़ा। राज्य मंडपों में भी भीड़ कम नहीं थी। राष्ट्रमंडल खेल के प्रचार-प्रसार के लिए दिल्ली पवेलियन के बाहरी हिस्से को खेल व शेरा के रंग में रंगा गया है। दिनभर सबसे ज्यादा भीड़ इस पवेलियन में ही रही। विदेशी पवेलियन देखने की चाह भी हर किसी के मन में नजर आई। इस कड़ी में जब लोग हाल संख्या-12ए में पहुंचे तो भीड़ को नियंत्रित करने के लिए दोपहर 3 बजे के करीब कुछ देर एंट्री रोकनी पड़ी। दर्शक सुरक्षा कर्मियों से हाथापाई पर उतर आए। पार्किंग भी पड़ गई कम : प्रगति मैदान के आसपास बने पार्किंग स्थल भी छोटे पड़ गए। भगवान दास रोड, पुराना किला रोड, भैरों रोड और इंडिया गेट पार्किंग में बड़ी संख्या में गाडि़यां खड़ी थीं। निजी वाहनों से आए लोगों को पूरे दिन ट्रैफिक पुलिस यही समझती रही कि वह इन जगहों के अलावा पार्किग के लिए कहीं और जगह तलाशें। दुकानदारों के चेहरे पर लौटी रौनक : रविवार को उमड़े जनसैलाब को देख स्टाल विक्रेता भी काफी खुश नजर आ रहे थे। बहुत से लोगों ने खरीदारी की। एक स्टॉल विक्रेता ने कहा, इस भीड़ की इंतजार तो हम कई दिनों से कर रहे थे। मेले में जितने ज्यादा दर्शक आते हैं, उतना ही व्यापार बढ़ता है और प्रचार होता है। हजारों दर्शक मायूस लौटे : सुरक्षा कारणों व भीड़ अनियंत्रित न हो जाए इस कारण मेले में शाम 4 बजे के बाद लोगों की एंट्री पर रोक लगा दी गई। इसकी जानकारी न होने से हजारों लोग प्रगति मैदान के सभी एंट्री गेट पर अंदर घुसने के लिए हंगामा करने लगे। उन्हें शांत कराने में तैनात सुरक्षा जवानों को भी काफी मशक्कत करनी पड़ी। घंटे भर के प्रयास के बाद आखिरकर लोगों को मायूस होकर लौटना पड़ा।

बुधवार, 18 नवंबर 2009

कानून से ऊपर है पंजाब पुलिस


युवक को हीटर पर बैठाने के पंजाब पुलिस के कारनामे पर हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है। इस मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि लगता है पुलिस अपने को कानून से ऊपर समझती है। वह यह सोचती है कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हाईकोर्ट ने राज्य के गृह सचिव व पंजाब पुलिस की आलोचना की। जस्टिस खेहर ने कहा कि वह इस बारे में राज्य के गृह सचिव से बात करना चाहते हैं कि इस मामले में उन्होंने क्या किया है। मई से अब तक सरकार ने दोषियों के खिलाफ कुछ भी कार्रवाई नहीं की है। सरकारी वकील ने बताया कि इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों को संस्पेंड कर दिया गया है। जिस पर कोर्ट ने कहा कि गृह सचिव को तुरंत कोर्ट में पेश होकर जवाब देना चाहिए। सरकारी वकील ने कहा कि उन्हें तेज बुखार है, इसलिए वह कोर्ट में तुरंत पेश नहीं हो सकते। कोर्ट अब सोमवार को मामले की सुनवाई करेगी। चंडीगढ़ के एक संगठन ने समाचार पत्रों में प्रकाशित फिरोजपुर पुलिस द्वारा युवक को डकैती में शामिल होना कुबूल करवाने के लिए नंगा करके हीटर पर बैठाया खबर को आधार बना याचिका दाखिल की थी।

दुनिया के भ्रष्टतम देशों में भारत भी




बर्लिन। भारत दुनिया के भ्रष्टतम देशों में शुमार है। सकार क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मामले में 180 देशों की सूची में भारत का स्थानर 84वां है। दुनिया में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की बुधवार को एक साथ विभिन्न देशों में जारी वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के मुकाबले पाकिस्तान में भ्रष्टाचार ज्यादा है।
2.4 अंकों के सात वह 138वें स्थान पर है। भ्रष्टाचार के मामले में जो देश इस सूची में सबसे निचले पायदान पर हैं, वे सभी संघर्ष य हिंस से प्रभावित हैं। इनमें अफगानिस्तान, म्यांमार, इराक, सोमालिया और सूडान प्रमुख हैं। इस सूची में न्यूजीलैंड, डेनमार्क और सिंगापुर ईमानदार देशों में शुमार किए गए हैं। सर्विया, घाना, पेरू और बुर्किना फासो जैसे विकासशील देशों की स्थिति भारत से बेहतर है। उन्हें इस सूची में क्रमश: 83, 79 और 75वें स्थान पर रखा गया है। चीन की स्थिति भी भारत से थो़डी बेहतर है। उसे 3.6 अंक मिले हैं। भारत के अन्य प़डोसी देशों में नेपाल 143वें स्थान के साथ भारत से काफी नीचे है जबकि बांग्लादेश पाकिस्तान के साथ 139वें स्थान पर है। श्रीलंका 3.1 अंकों के साथ 97वें स्थान पर है।
स्विस बैंकिंग कानून बदलने की सिफारिश
संस्था ने पहली बार सिफारिश की है कि स्विट्जरलैंड जैसे देशों के बैंकिंग कानून में संशोधन किया जाना चाहिए, जहां काली कमाई को सुरक्षित रखा जाता है। संस्था ने कहा कि अब समय आ गया है जब बैंकिंग कानून में गोपनीयता का प्रावधान समाप्त होना चाहिए। ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के प्रमुख आरएच तहलियानी ने कहा कि उनकी संस्था ने पाया कि गरीबी और भ्रष्टाचार में सीधा संबंध है, जिससे गरीबी से ल़डने में मुश्किल आ रही है तथा संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य हासिल करने की कोशिश भी नाकाम

ड्राइवर को सूली चढ़ा बच निकलते हैं सभी

अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं के लिए व्यक्तियों को सूली पर चढ़ाने की परंपरा है, जबकि विभागीय संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से साफ बच निकलती हैं। भारत में सालाना करीब एक लाख 40 हजार सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। इनमें 90 प्रतिशत मामलों में ड्राइवर को दोषी माना जाता है लापरवाही से गाड़ी चलाने का मुकदमा चलता है। सिर्फ आठ प्रतिशत मामलों में वाहन मालिकों को कसूरवार ठहराया जाता है। दो फीसदी दुर्घटनाओं में ही पीडब्लूडी, ट्रैफिक पुलिस या आरटीओ की जिम्मेदारी तय होती है। ऐसे मामले अपवाद ही हैं जहां गढ्डेदार सड़क, गलत मोड़, बेढब ढलान, बेवजह स्पीड बे्रकर, मिट्टी-रोड़ी-बजरी जैसे बेजा अवरोध, गलत या अनुपस्थित यातायात संकेतक अथवा त्रुटिपूर्ण यातायात व्यवस्था और इनसे जुड़े विभागों को दुर्घटना के लिए जिम्मेदार माना गया हो, जबकि पचास प्रतिशत दुर्घटनाओं में इन की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका होती है। यहां तक कि वाहन में निर्माणगत खराबी भी दुर्घटना का कारण हो सकती है, जिसके लिए वाहन निर्माता की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए लेकिन भारत में कानूनी प्रावधान होते हुए भी ज्यादातर विभाग दुर्घटना की जिम्मेदारी से साफ बच निकलते हैं। मोटर वाहन एक्ट, 1988 की धारा 135 में बाकायदा इस बात की व्यवस्था है कि प्रत्येक दुर्घटना की राज्य सरकार द्वारा विधिवत जांच एवं विश्लेषण होना चाहिए ताकि हादसे के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों तथा एजेंसियों की जिम्मेदार तय की जा सके। परंतु इस नियम की शायद ही कोई परवाह की जाती है। नतीजतन कई मर्तबा बेगुनाहों को सजा हो जाती है, जबकि असली गुनहगार छूट जाते हैं और दुर्घटनाओं को बढ़ाते रहते हैं। किसका है कसूर : सड़क हादसों के लिए दूसरे कारक किस तरह जिम्मेदार हो सकते हैं, इसे समझने के लिए मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे पर 1995 के दौरान हुए हादसों की जांच पर निगाह डालना उचित रहेगा। उस समय यह एक्सप्रेस-वे नया-नया बना था और इस पर एक के बाद एक दुर्घटनाएं हो रही थीं। जब गहन जांच हुई तो पाया गया कि दुर्घटनाएं टायरों की वजह से हो रही थीं जिन्हें एक्सप्रेस-वे जैसी परिस्थितियां झेलने के लिए नहीं बनाया गया था। इसके बाद वहां ट्रकों के लिए रफ्तार सीमा तय कर दी गई, जिससे दुर्घटनाएं थम गई। दूसरा उदाहरण दिल्ली-गुड़गांव और नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे का है। अब तक जिम्मेदार एजेंसियों ने इनके कारणों की समुचित जांच नहीं की है। इन दोनों एक्सप्रेस-वे के डिजाइन में गंभीर खामियां हैं जिससे गलत जगहों पर निकासी और प्रवेश के रास्ते दे दिए गए हैं। इसके अलावा दूसरी गड़बड़ी गलत-अस्पष्ट-छोटे एवं भ्रामक यातायात संकेतक तथा प्रकाश की अपर्याप्त व्यवस्था की है।

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

ताड़ी पीकर भूख मिटाते बच्चे


कटिहार जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब बच्चे दूध की जगह ताड़ी पी रहे हैं। उनके अभिभावकों का मानना है कि ताड़ी पीने के बाद नशे की अवस्था में मजदूरी करने में उन्हें दिक्कत नहीं होती है। ताड़ी इन मासूमों के लिए पेट की ज्वाला शांत करने का जरिया बन गई है। लगता है इनके लिए तमाम सरकारी योजनाएं भी बेकार साबित हो रही हंै।

रविवार, 15 नवंबर 2009

दिल्ली के भिखारियों ने आगरा में ठिकाना बनाया


राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के चलते दिल्ली से हटाये जा रहे भिखारियों ने ताज नगरी को ठिकाना बनाया है। दिल्ली से नजदीक और पर्यटन नगरी होने की वजह से आगरा उनके लिये मुफीद है। अब तक सैकड़ों भिखारी शहर में प्रवेश कर चुके हैं। दिल्ली सरकार ने 2010 के कामनवेल्थ गेम्स से पहले राजधानी को साफ सुथरा बनाने का अभियान छेड़ रखा है, इनमें राजधानी में मौजूद भिखारियों की बड़ी फौज को हटाना भी शामिल है जिन्होंने सड़कों और चौराहों (लालबत्तियों) के इर्द-गिर्द कब्जा जमा रखा था। सरकारी मुहिम ने इन्हें पलायन के लिए मजबूर कर दिया है। दिल्ली से चार दिन पूर्व कुनबे समेत यहां आने वाली सावित्री (65) ने एमजी रोड के फुटपाथ पर डेरा डाल रखा है। मूलत: राजस्थान की निवासी सावित्री ने बताया कि 15 साल से भी ज्यादा समय वह दिल्ली में फुटपाथ पर रही। वहीं पर भीख मांग कर बच्चों को पाल पोस कर बड़ा किया। यहां आने वाली वह अकेली नहीं है। बबीता, भूरी, माया, रजनी, मालती जैसी दर्जनों महिलाएं परिवार सहित यहां आ गई हैं। मध्य प्रदेश के मोहम्मद, फर्रुखाबाद के रामदीन, सूरज, किशोरी, हरी आदि ने भी एमजी रोड के फुटपाथ पर डेरा डाल रखा है। बहुत से भिखारियों ने कैंट, फोर्ट रेलवे स्टेशन, बिजलीघर, लाल किले के आसपास ठिकाना बनाया है। कैंट स्टेशन पर उतरने वाले सैलानियों को घेरना शुरू कर दिया है। तरीका वही दिल्ली वाला है लाल बत्ती पर किसी गाड़ी के रुकते ही उसे कमीज से साफ करना फिर एवज में पैसे मांगना। कम उम्र बच्चे सामान बेचते नजर आते हैं।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

शहर जाई लइका, होशियार हो जाई!


शहर जाई लइका तो होशियार हो जाई। बाल तस्कर कुछ इसी प्रकार का झांसा देकर ग्रामीणों के देते हैं और उनके बच्चे को शहर जाकर बेच देते हैं। अपने बच्चों का भविष्य संवरने का सपना लिए आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोग इनके झांसे में आ जाते हैं और उनका भविष्य तो दूर वर्तमान भी बर्बाद हो जाता है। इस तरह का खुलासा रक्सौल इलाके में बच्चों की बरामदगी के बाद हुआ। बता दें कि इन दिनों पूरा उत्तर बिहार चाइल्ड ट्रैफिकिंग की जद में है। इसका मूल कारण यहां का भौगोलिक बनावट और प्राकृतिक आपदाएं हैं। गरीबी का लाभ उठाकर दलाल यहां के बच्चों को ही नहीं बल्कि औरतों, और लड़कियों को भी खरीदकर अन्य राज्यों में बेच देते हैं। बच्चे तो कई बार मुक्त करा लिए जाते हैं, लेकिन हैरत की बात है कि दलाल हत्थे नहीं चढ़ पाते। सूत्रों के अनुसार दलाल बड़ी चालाकी से भोले-भाले ग्रामीणों में पहले पैठ बनाते हैं फिर उन्हें छलते हैं। ये लोग दबे-कुचले गरीब परिवार के 10 से 15 वर्ष के बच्चों को काम सिखाने और शहर में पढ़ाने का प्रलोभन देते हैं। अभिभावकों को तत्काल 10-15 हजार रुपये एडवांस देते हैं। उनका तर्क होता है, कंपनी ने काम सिखाने की एवज में परिजन को आर्थिक सहयोग दिया है। इसके बाद बच्चों के कथित रिश्तेदार बनकर दूसरे राज्यों में लेकर जाते हैं। इन बच्चों से रात-दिन काम लेते हैं। घर वालों से बातचीत नहीं करने देते हैं। वहीं लड़कियों को घर में बच्चों की देखरेख करने, नृत्य-संगीत सिखाने व हीरोइन बनाने का सब्जबाग दिखाते हैं। अभिभावकों को हर साल लाखों की इसके बाद शुरू होती है इनकी जिंदगी से खिलवाड़। यह ट्रैफिकिंग मुख्य रूप से मानव अंगों की खरीद-बिक्री, बंधुआ मजदूरी, भीख मांगने, सेक्स वर्कर बनाए जाने, बार में शराब परोसने जैसे गलत धंधों के लिए होता है। मुजफ्फरपुर से गुजरने वाली ट्रेनों से बच्चे अमृतसर, फिरोजाबाद, दिल्ली और मुंबई भेजे जाते हैं। दलाल रिश्तेदार बनकर बच्चों को ठिकाने तक पहुंचाते हैं। ये छोटे-छोटे ग्रुपों में बंटे होते हैं, ताकि किसी को शक नहीं हो। मई 2007 में बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता सफदर तौकीर ने कटिहार से आने वाली पैसेंजर ट्रेन में सकरा से मुजफ्फरपुर के बीच अभियान चलाया तो आठ बच्चे मुक्त कराए गए। इनके साथ दलाल इमाम हुसैन भी दबोचा गया था। उप श्रमायुक्त पृथ्वीराज की मानें तो बच्चों को मुक्त कराने के लिए तिरहुत में दल गठित किए गए हैं। तिरहुत में जुलाई 2009 से सितम्बर तक दुकानों को निशाना बनाकर छापेमारी की गई। इस दौरान 36 बाल मजदूर मुक्त कराए गए। 39 मुकदमे दायर किए गए हैं। इनमें मुजफ्फरपुर में 17, सीतामढ़ी में तीन, शिवहर में दो, हाजीपुर में 17 मुकदमे दायर हुए हैं। टै्रफिकिंग के लिए बेतिया भी बदनाम रहा है। यहां कई दलाल पकड़े जा चुके हैं। वैसे श्रम विभाग का धावा दल गत तीन माह में छापेमारी कर आधा दर्जन मामलों का पर्दाफाश कर चुका है। वहीं इंडो-नेपाल बार्डर स्थित रक्सौल में तीन माह के दौरान 42 बच्चे तस्करों के चंगुल से छुड़ाए गए। करीब एक दर्जन तस्कर भी दबोचे गए। सीतामढ़ी में तीन वर्ष पूर्व बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने करीब 200 बच्चों को मुक्त कराया था। वर्तमान में चाइल्ड लाइन नामक संगठन बच्चों को बालश्रम से बचाने के अभियान में जुटा है। समस्तीपुर में वर्ष 08 में मजदूरी कराने के नाम पर ले जाए जा रहे 250 बच्चे मुक्त कराए गए थे। उधर, मधुबनी के इंडो-नेपाल सीमांचल में यह कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। दरभंगा में भी आए दिन बच्चे मुक्त कराए जाते रहे हैं। चूंकि यहां रेल मार्ग की सुविधा है, सो अन्य जिलों से बच्चे लाकर बाहर भेजे जाते हैं। 14 बच्चों के साथ दो दलाल शिवहर के तरियानी थाना के चकसुरगाही गांव निवासी अनिल कुमार साह तथा सीतामढ़ी के बेलसंड थाना अंतर्गत बसौल गांव के रतन साह को दरभंगा जंक्शन पर गिरफ्तार किया गया।

त्रासदी : सब कुछ गंवा के होश भी खो बैठे


सरकार के अथक प्रयास के बाद कोसी की धारा जिस होकर बहती थी बहने लगी, मगर इसकी बदली धारा ने जो तबाही मचायी उस त्रासदी से उपजे अवसाद का कहर आज भी यहां के तीन हजार से ज्यादा लोग झेल रहे हैं। बाढ़ की विभषिका ने कोसी के 3397 लोगों को मानसिक रूप से विकलांग बना दिया है। अपना सब कुछ कोसी की धारा में बह जाने का सदमा ये नहीं झेल पाये और अपना होश खो बैठे। पिछले साल आयी कोसी की बाढ़ में मुरलीगंज में 812, त्रिवेणीगंज में 691, छातापुर में 1892 व पूर्णिया में 3 लोगों का सब कुछ लूट गया। कइयों को अब भी पानी से डर लगता है, तो कई मानसिक रूप से विकलांग होकर कोसी का नाम रटते-रटते दिन और रात काट देते हैं। इनमें सैकड़ों पीडि़तों का इलाज विकलांग भौतिक पुर्नवास केन्द्र में अब भी किया जा रहा है। इस केन्द्र का संचालन हैंडीकैप इंटरनेशनल एवं दीपालय विकलांग मानसिक स्वास्थ्य संस्थान द्वारा होता है। मुरलीगंज के जोरगामा के रहने वाले अनमोल पोद्दार का सब कुछ कोसी की तेज धारा में बह गया। तबाही इतनी तेजी से आयी की इनके परिवार का एक बच्चा भी पानी की तेज धारा के साथ बह गया। इसका उन्हें जबरदस्त सदमा लगा और वे मानसिक रूप से विकलांग हो गये। कोसी की बदली धारा ने सकली खातून, छकाड़गढ़, छातापुर की जिंदगी भी वीरान कर दी। अपने परिवार का सब कुछ खोने का गम वह नहीं झेल पायी। सुपौल के ही जदिया निवासी कविता कुमारी तथा पूर्णिया के नौलखी के शिवनारायण यादव एवं बौराही के बालकराम ऋषिदेव भी कोसी में अपना सब कुछ खोने के बाद मानसिक रूप से विकलांग हो गये हैं। छातापुर के रविन्द्र साह को तो कोसी की बाढ़ के बाद पानी से इस कदर खौफ पैदा हो गया है की वह पानी देखते ही भागने लगता है। रविन्द्र की पत्नी कोसी की तेज धारा में बह गयी। मधेपुरा के कुमारखंड के वीरन्द्र प्रसाद की बाढ़ के बाद मानसिक विकलांगता इस कदर बढ़ गयी है कि यह आदमी जितनी देर भी जगा रहता है कोसी-कोसी की रट लगाये रखता है। इस व्यक्ति के दो बेटे कोसी के बाढ़ के बाद कहां गये आज तक इसका पता नहीं चला। प्रदीप साह का भी कुछ यही हाल है वह चुपचाप रोते रहता है। किसी तरह सरकारी जमीन पर उसके द्वारा फूस का मकान बनाया गया था। जिसमें कोसी के तबाही के दिन उसका पूरा परिवार सोया हुआ था। जब तक यह परिवार संभलता कोसी की उफनती धारा उन्हें अपने साथ बहा ले गयी। उनकी पत्नी सुदमिया देवी कहती है कि पति की मानसिक स्थिति इस सदमे के बाद इतनी खराब हो गयी है की वे कुछ बोल ही नहीं पाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट : आधा दर्जन जज लैंड लॉर्ड भी


सुप्रीमकोर्ट के करीब आधा दर्जन जज लैंडलार्ड भी हैं। किसी के पास एकड़ों जमीन है तो किसी के पास छह-छह प्लाट। बड़े शहरों में मकान अलग से हैं। संपत्ति ब्योरे के मुताबिक, जस्टिस दलवीर भंडारी के पास महरौली इलाके में 14 बीघा 15 बिसवा, जोधपुर के ओसिया तहसील में 76 बीघा जमीन है। दिल्ली के तिलक मार्ग पर सागर अपार्टमेंट में 1753 वर्गफीट का फ्लैट, ग्रेटर नोएडा में 292.79 वर्गमीटर का रिहायशी भूखंड, जोधपुर के सरदारपुरा में पैतृकमकान और प्लाट भी है। न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी व उनकी पत्नी के नाम जयपुर की नारायण सिटी में दो सौ वर्ग गज के दो प्लाट, सनसिटी जयपुर में 542 वर्गफीट का प्लाट है। 155 वर्गगज का एक प्लाट उनकी पत्‍‌नी के नाम है। जयपुर के नजदीक 355 वर्गगज के दो प्लाटों के अलावा सिंघवी जोधपुर पावटा सी रोड पैतृक मकान में भी हिस्सेदार हैं। जस्टिस आरवी. रवींद्रन व उनकी पत्नी के नाम बंगलूर में कुल चार प्लाट हैं और दो मकानों में हिस्सेदारी है। बंगलूर की डिकसन रोड ट्रेड सेंटर की दो यूनिटों तथा रिचमंड टावर की आफिस यूनिट में भी उनकी हिस्सेदारी है। जस्टिस मुकुंदकम शर्मा व उनकी पत्नी के नाम ग्रेटर नोएडा में 293 वर्गमीटर, नोएडा सेक्टर-105 में 247 वर्गमीटर तथा फरीदाबाद पार्क लैंड में 265 वर्गमीटर के प्लाट हैं। साथ ही गुवाहाटी में 337 वर्गमीटर का दो मंजिला पैतृक मकान भी है। इसमें सीजीएचएस डिस्पेंसरी चल रही है जिससे 32,000 रुपये मासिक किराया आता है। जस्टिस पी.सदाशिवम के पास एक ही मकान चेन्नई में है। वह भी 1999 से किराये पर उठा है, लेकिन उनके और पत्नी के नाम कुल 21 एकड़ से ज्यादा जमीन तमिलनाडु के इरोड जिले में है। जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी व उनकी पत्नी के नाम दो फ्लैट, दो मकान तथा विरासत में मिली 15 एकड़ से ज्यादा जमीन है। हैदराबाद के रंगारेड्डी जिले के पैतृक मकान में हिस्सेदारी अलग से है। जस्टिस रेड्डी का हैदराबाद जुबली हिल्स में 3500 वर्गफीट का मकान, रंगारेड्डी जिले में 244 वर्गगज का घर तथा पत्नी के नाम हैदराबाद में फ्लैट है। जस्टिस बीएस. चौहान की नोएडा सेक्टर-15 ए में कोठी के अलावा सेक्टर-18 में धर्मपैलेस नामक पारिवारिक फर्म में हिस्सेदारी है। मुजफ्फर नगर के जसोला गांव के पैतृक मकान में हिस्सेदारी के साथ ही 200 बीघा जमीन में तिहाई हिस्सा है। जस्टिस वीएस सिरपुरकर व उनकी पत्नी के नाम नागपुर में दो मकान, एक प्लाट है जबकि जस्टिस दीपक वर्मा के पास भोपाल में 2400 वर्गफीट का प्लाट, दिल्ली के द्वारका में तीन बेडरूम का फ्लैट के अलावा जबलपुर के पैतृक मकान में हिस्सेदारी है। जबलपुर में दस एकड़ जमीन भी है। मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन के पास फरीदाबाद में 444 वर्गगज का भूखंड, इरनाकुलम कनयानूर में दो बेडरूम फ्लैट और एक भूखंड के अलावा पत्‍‌नी व उनके नाम जमीन भी है। जस्टिस आरएम लोधा के पास मंुबई बांद्रा में फ्लैट तथा जयपुर सिविल लाइंस में मकान है जबकि उनकी पत्नी के पास जयपुर में 400 वर्गगज का भूखंड है।

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

पराली से बने बिजली, खाद से खेत बने जवान


किसान एक सप्ताह देर से गेहूं की बिजाई करता है तो उसे प्रति एकड़ ढाई क्विंटल उत्पादन कम मिलेगा। अगर देरी दो सप्ताह की है तो नुकसान पांच क्विंटल होगा। इसी को ध्यान में रखकर किसान गेहूं की बिजाई करने के लिए खेत करने को धान की पराली जला देते हैं। यह सरासर गलत है। खेतों को पराली की आग से बचाने के लिए लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) व गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनीमल साइंस यूनिवर्सिटी (गडवासू) के विज्ञानी प्रयास में जुटे हुए हैं। वे पराली नहीं जलाने के विकल्पों पर काम कर रहे हैं। एक महत्वपूर्ण विकल्प तो यही है कि पराली को उन राज्यों को बेचा जाए, जहां चारे की कमी है। ऐसे राज्यों में राजस्थान, जम्मू-कश्मीर व गुजरात शामिल हैं। इससे किसान की पौ बारह हो जाएगी। उसके लिए यह स्थिति आम के आम गुठलियों के दाम वाली हो जाएगी। बस किसान को पराली जलाने के बजाय इस दिशा में सोचना होगा। पीएयू के वीसी डा. कंग ने खुलासा किया कि पराली का सदुपयोग करने के लिए पंजाब व केंद्र सरकार को दोनों यूनिवर्सिटियों ने कई प्रस्ताव बनाकर दिए हैं। उन्होंने पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए भी लिखा है। उनके अनुसार, 14 नवंबर से गेहूं की बिजाई सब जगह शुरू हो रही है। खेत को च्च्छे ढंग से खाली करने के लिए एक महीना लगता है। विज्ञानियों ने जीरो ट्रिल मशीन तैयार की है, जो पराली को जमीन पर बिछाती चलती है। उसके बाद हैपी सीडर का इस्तेमाल किया जाता है। किसानों को जागरूक करने के लिए दो साल से हैप्पी सीडर मशीन का ट्रायल दिया जा रहा है। इसके अलावा स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम को कंबाइन हार्वेस्ट के साथ लगा दिया जाता है, जो स्ट्रा यानी पराली को जमीन पर बिछा देता है। बेलिंग स्ट्रा मतलब पराली को बेल बनाकर चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अभी बेलिंग मशीन की कीमत छह लाख रुपये है, जिसे कम करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इलेक्ट्रीसिटी बेलिंग में भी पराली का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस मशीन में सिलिकॉन अधिक होता है, जिसकी ज्वलन क्षमता 750-800 डिग्री होती है। तापमान बढ़ाने के लिए इसके साथ लकड़ी व अन्य ईधन को मिश्रित किया जा सकता है। इससे बिजली प्राप्त की जा सकती है। बायो-गैस बनाने के लिए भी पराली प्रयोग में लाई जा सकती है। पीएयू के निदेशक (अनुसंधान) डा. परमजीत सिंह मिन्हास ने बताया कि यूनिवर्सिटी के डा. एके जैन कपूरथला में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रीन्युएबल एनर्जी पर काम कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी का लक्ष्य है कि भविष्य में पराली का इस्तेमाल अधिक से अधिक ऊर्जा बनाने में किया जाए। गडवासू के वीसी डा. वीके तनेजा ने बताया कि उनके यहां पराली को पशुओं के लिए इस्तेमाल करने पर खोज चल रही है। न्यूट्रीशियन विभाग पशुओं के लिए धान की पराली व गेहूं की तूड़ी का प्रयोग कर रहा है। पराली पशुओं के बिस्तर के लिए इस्तेमाल की जा रही है। इससे पशुओं के मलमूत्र से कंपोस्ट खाद तैयार की जाती है। यूरिया के अलावा अन्य न्यूट्रीटेंस व मिनरल मिलाकर इस खाद की गुणवत्ता भी बढ़ाई जा सकती है।

कालाबाजारी पर स्मार्ट पंच

सस्ते राशन की कालाबाजारी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार अब स्मार्ट कार्ड जारी करेगी। इससे एक व्यक्ति के नाम से दो स्थान पर बन रहे राशन कार्ड के गोरखधंधे पर नकेल कसी जाएगी। इसकी शुरुआत राजधानी के मशोबरा व शिमला शहरी ब्लाक से होगी। स्मार्ट कार्ड योजना के पीछे सरकार का मकसद सस्ते राशन की कालाबाजारी रोकने के साथ-साथ बढ़ते फर्जी राशन कार्डो की संख्या पर अंकुश लगाना भी है। इस योजना की जमीन राशन कार्ड पर सस्ता राशन लेने के लिए बन चुके मौजूदा हालात ने तैयार की है। वर्तमान हालात देखें तो लोग सस्ते राशन के लिए एक ही परिवार में रह रहे सदस्यों के अलग-अलग राशन कार्ड बना लेते हैं। प्रदेश में राशन प्रति राशन कार्ड के हिसाब से सप्लाई हो रहा है। इस कारण जहां एक छोटे परिवार को कम राशन नसीब हो रहा है वहीं बड़ा परिवार प्रशासन की आंखों में धूल झोंक कर ज्यादा राशन पा रहा है। स्मार्ट कार्ड को इन हालात पर काबू पाने में ज्यादा कारगर माना जा रहा है। खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले मंत्री रमेश धवाला का कहना है कि इस योजना को प्रथम चरण में शिमला के दो खंडों में लागू किया जाएगा। अगर इसके अपेक्षित परिणाम रहे तो इस व्यवस्था को पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा।

Headley 'in league' with 26/11 terrorists



New Delhi: David Coleman Headley, the Pakistan-born American national in custody in the US for allegedly plotting terror attacks, visited India nine times between 2006-2009.


CNN-IBN has learnt this after accessing Headley’s passport, which he acquired in March 2006 after allegedly joining the Lashkar-e-Toiba, the group blamed for the terrorist attacks in Mumbai last year.


The passport shows that Headley visited New Delhi, Mumbai, Kochi, Pune, Ahmedabad, Lucknow and Agra between 2006-2009--trips investigators suspect were recces for terrorist attack conspiracies.


Headley, while visiting Mumbai in March 2006, listed Hotel Trident as a place of residence. He stayed at guesthouse near the CST Railway Terminus and he booked a room at the Taj Hotel. The Trident, the Taj, and the CST terminus were three main targets of terrorists during the November 2008 attacks.


Headley visited New Delhi in March 2009 and stayed in two hotels in Paharganj, close to the railway station in the national capital’s historic area. Records show he stayed at Anand Hotel and De Holiday International for three days.


IANS reports that information provided by the FBI has revealed that Headley operated a visa agency in Mumbai for almost two years until July 2008 and had travelled to India on business visas nine times between 2006 and 2009.


FBI agents arrested Headley on October 18 from Chicago's O'Hare International Airport as he was preparing to board a flight to Philadelphia, and subsequently arrested Tahawwur Hussain Rana. The two intended to travel to Pakistan, apparently to firm up their latest terror designs.


Headley and Rana, a Canadian citizen of Pakistani origin, are being held on charges of plotting attacks in India at the behest of the LeT.


India’s National Investigation Agency has been charged with probing Headley’s visits to India and is expected to soon file charges against him in a court in New Delh

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