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बुधवार, 14 जुलाई 2010

कहां हैं भारत बंद वाले लोग : सावन सिंह

सिरसा,14 जुलाई। विश्वव्यापी मंहगाई और अन्य मुद्दों पर रोजाना प्रांतबंद, देश बंद करवाकर लोगों को परेशान करने वाले राजनैतिक दल प्रदेश में आई बाढ़ को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है और हरियाणा के मुख्यमंत्री चौ.भूपेंद्र सिंह हुड्डा पूरे बाढ़ क्षेत्र का दौरा करके पीडि़त किसानों से हमदर्दी जता रहे हैं। यह बात जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष सावन सिंह ने ओटू में घग्गर नदी पर अपने सैंकड़ों साथियों के साथ किसानों की मदद करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि यह बाढ़ प्राकृतिक आपदा है तथा इस पर राजनीति करने की बजाए पीडि़त लोगों की मदद करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कल तक भारत बंद के लिए सड़कों पर उतरने वाले लोग अपने बाढ़ से ग्रस्त क्षेत्र में किसी भी एक भी किसान की मदद के लिए घर से बाहर नहीं निकल रहा। उन्होंने कहा कि केवल ड्राईंग रूम में बैठकर थोथी ब्यानबाजी करके लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया जा रहा है। सावन सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने केंद्र सरकार ने 1 हजार करोड़ रूपए की आर्थिक मदद की मांग की है और उन्होंने स्पैशल गिरदावरी के आदेश जारी करके किसानों को मदद पहुंचाने की पहल की है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने अम्बाला से लेकर सिरसा तक पूरे क्षेत्र का समूचित दौरा करके बाढ़ से हुए नुक्सान का सही आंकलन जुटा कर केंद्र सरकार को भेज दिया है।
जिलाउपाध्यक्ष ने जरा-जरा सी बात पर दुकानें बंद करवाने वाले लोगों से अपील की कि अब उन्हें बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए भी आगे आना चाहिए और पीेडि़तों के लिए हर संभव सहायता उपलब्ध करवाने के लिए काम करना चाहिए। सावन सिंह ने जिला प्रशासन की भी प्रशंसा की और कहा कि प्रशासन की सर्तकता के कारण ही सिरसा जिला के आबादी वाले इलाकों में बाढ़ का पानी नहीं आया और कृषि क्षेत्र का भी कम से कम नुक्सान होने दिया गया है। कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष ने फिर अपील की कि इस मुद्दे पर सभी राजनैतिक दलगत भावना से ऊपर उठकर पीडि़तों की मदद के लिए आगे आएं। उन्होंने कहा कि वे स्वयं लगातार घग्गर के किनारों पर लोगों के साथ काम में हाथ बंटा रहे हैं।

बुधवार, 7 जुलाई 2010

बढ़ती महंगाई ने मजदूर का जीना दूभर करके रख दिया है--भारूखेड़ा

डबवाली- भारतीय खेत मजदूर यूनियन जनरल ब्लॉक कमेटी की एक बैठक जिला प्रधान भाला राम भारूखेड़ा की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि इस बढ़ती महंगाई ने मजदूर का जीना दूभर करके रख दिया है। मजदूरों को न तो मनरेगा योजना के तहत काम ठीक ढंग से मिलता है तथा न ही खेती कार्यों का। जिसके चलते मजदूर भुखमरी की कगार पर पहुंच गया है। उक्त बैठक को हरियाणा राज्य कमेटी के कोषाध्यक्ष राज कुमार शेखूपुरिया तथा जिला सचिव चैन नागेकी ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर ब्लॉक कमेटी का चुनाव भी करवाया गया। जिसमें सुखदेव को प्रधान, नरेश मसीतां को सचिव व भालाराम भारूखेड़ा को कोषाध्यक्ष चुना गया। यह जानकारी यूनियन के प्रवक्ता ने दी।

बुधवार, 26 मई 2010

सोने ने बनाया नया कीर्तिमान

नई दिल्ली: यूरोपीय संकट के असर से दुनिया भर के शेयर बाजार पिट रहे हैं, वहीं सोने की चकाचौंध लगातार बढ़ रही है। मंगलवार को निवेशकों ने शेयरों में भारी गिरावट देख पीली धातु का सहारा लेना बेहतर समझा। इससे स्थानीय सराफा बाजार में जोरदार लिवाली से सोना इस दिन 260 रुपये भड़ककर 18 हजार 660 रुपये प्रति दस ग्राम के नए शिखर पर पहुंच गया। इससे पहले इस महंगी धातु ने बीते साल 3 दिसंबर को 18 हजार 550 रुपये प्रति दस ग्राम का रिकार्ड बनाया था। यूनान से शुरू हुआ कर्ज संकट अब स्पेन तक पहुंच गया है। इस यूरोपीय संकट को गहराते देख मंगलवार को विश्व भर के शेयर बाजार भरभरा गए। सेंसेक्स भी इस दिन एक समय 16 हजार से नीचे आ गया। चूंकि निवेशक सोने को सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प मानते हैं, इसलिए उन्होंने शेयरों का दामन छोड़ पीली धातु में अपना धन लगा दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने के दामों में आई मजबूती से भी इसकी लिवाली ने जोर पकड़ा। न्यूयार्क में सोना 15.30 डालर चढ़कर 1192.30 डालर प्रति औंस पर बंद हुआ। शादी-विवाह के चलते भी घरेलू आभूषण निर्माताओं और खुदरा ग्राहकों की ओर से पीली धातु की जोरदार मांग निकली। स्थानीय सराफा बाजार में सोना आभूषण के भाव 260 रुपये चढ़कर 18 हजार 510 रुपये प्रति दस ग्राम पर पहुंच गए। गिन्नी 75 रुपये बढ़कर 14 हजार 525 रुपये प्रति आठ ग्राम पर बंद हुई। इसके उलट औद्योगिक यूनिटों व सिक्का निर्माताओं की ओर से मांग नहीं रहने के चलते चांदी के दाम 100 रुपये गिरकर 28 हजार 950 रुपये प्रति किलो बोले गए। चांदी साप्ताहिक डिलीवरी 25 रुपये टूटकर 28 हजार 635 रुपये प्रति किलो बंद हुई। चांदी सिक्का पूर्व स्तर 34400-34500 पर यथावत रहा।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

Increasing the propensity to serve the society with altruism instead of increasing the propensity to consume by promoting greed -- Dr. M.M. Goel

Hissar,-- ‘We need to increase the propensity to save which increase propensity to invest with multiplier effects for increasing the propensity to serve the society with altruism instead of increasing the propensity to consume by promoting greed through personal loans of various kinds by the banks,’ opined Dr. M.M. Goel, Professor & Chairman Department of Economics, Kurukshetra University, Kurukshetra. He was addressing the participants of the Orientation Course for the university/college lecturers being organized by UGC Academic Staff College, Guru Jambeshwar University, today on ‘Management of Global Economic Crisis’. Externalities (social cost) of an unemployed youth in terms of zero opportunity cost are practically more than perceived in-terms of terrorism of various kinds by the unemployed youth who are interested in making their families millionaire even by becoming human bombs instead of human capital, told Professor Goel. To reduce the fiscal deficit in forth coming union budget 2010-11, it would be relevant for the finance Minister Mr. Parnab Mukarjee to adopt the canons of public expenditure advocated by Bharat Rattan Dr .B. R. Ambedkar in terms of the faithfulness to the intentions of the will of the people, wisdom as provided by the professionals in the field, coupled with well-considered and honest judgment, and economy in execution. The allocation of public expenditure among competing demands and the manner of utilization fall within the domain of Ambedkar’s canons, which can be seen as a touch-stone to see whether a particular items of public spending is necessary or not, said Professor Goel - a keen observer of the Indian economy.
In the second lecture on the topic ‘Excellence Models for Teachers in a Changing Economic Scenario’, Professor Goel said that spirituality is the mantra of real happiness for which India is the best country to learn lessons for life which is other wise ranked 88th in terms of the quality of life index by travel magazine International living on the basis of nine indicators including cost of living in style, risk and safety, culture and leisure, economy, environment, freedom , health, infrastructure and climate out of the 194 nations of the world. The ‘spill over’ effects ( social benefits) of education consisting of proper, productive and practical (3 P) use of hands, head and heart (3 H) are certainly more than the private benefits to the individual which justifies higher allocation of resources by the Government, opined Professor Goel. To encounter the truth of polluted relationship between teachers and students of today, we need to be courageous and realistic in dreams, imagination and tranquility which are essential attributes for sustainable human development. To reduce the critical gap in terms of availability of opportunity of higher education between the rural and urban area in India, Professor Goel justified more allocation of public sector allocation for opening more educational institutions of higher learning in rural areas. He made a call for treating higher education as a highly valuable service that has a price tag and not a heavily subsidized commodity. There is a case for formulating a well-conceived, well planned and equally well implemntable strategy for higher education in India, believes Professor Goel. To keep the higher education within the reach of poor aspirants, Professor Goel made a case for effective monitoring and regulation of the private sector through appropriate policy measures – a judicious mix of policies, which ensure efficient use of the available educational resources. He has justified the use of cost-benefit analysis for developing new projects of higher education. To plug the loopholes in non-performance, he has rightly pointed out the need for accountability. Earlier Dr. B.K.Punia Professor & Director Academic Staff College welcomed & introduced Professor Goel.



शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

यूपी-बिहार ने महंगाई पर केंद्र को घेरा

लखनऊ/पटना, केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार द्वारा महंगाई के लिए राज्यों को जिम्मेदार ठहराने के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार ने गुरुवार को उनके और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यूपी की मुख्यमंत्री मायावती और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि शरद पवार अपनी गैर जिम्मेदाराना बातें बंद करें, क्योंकि महंगाई की असली गुनहगार केंद्र सरकार है जिसकी गलत नीतियों के कारण जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। लखनऊ में एक प्रेस कांफ्रेंस में मायावती ने कहा कि तीन मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से महंगाई बढ़ रही है। पहला केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियां, दूसरा पेट्रोलियम के दामों में की गई भारी वृद्धि और तीसरा कांग्रेस व पूंजीपतियों की साठगांठ। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का हर फैसला जमाखोरों, मुनाफाखोरों तथा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने वाला है। केंद्रीय मंत्री विशेषकर शरद पवार जिस प्रकार बयान देते हैं उससे चीनी के दाम आसमान छूने लगते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब देश में चावल की कमी है तो इसके निर्यात की अनुमति केंद्र ने कैसे दे दी? चावल के निर्यात पर उन्होंने तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की। मायावती ने कहा कि दो साल पहले जब देश में पर्याप्त चीनी पैदा हुई थी तो बफर स्टॉक बनाने के बजाए सस्ते में उसका निर्यात कर दिया। मुख्यमंत्री ने दोहराया कि प्रदेश के किसानों का पूरा गन्ना जब तक पेर नहीं लिया जाता उनकी सरकार बाहर से चीनी आयात की अनुमति कदापि नहीं देगी। केंद्र सरकार महंगाई के लिए राज्यों को जिम्मेदार ठहराना बंद करे और अपनी गलत आर्थिक नीतियों को सुधारे वरना बसपा देशव्यापी आंदोलन छेड़ेगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी नहीं छोड़ा। पटना में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने की घोषणा ठीक वैसी ही है जैसे आग लगने पर गढ्ड़ा खोदना। नीतीश ने कहा कि इस बैठक के स्थान पर प्रधानमंत्री को सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए जिसमें महंगाई को नियंत्रित करने पर गहराई से विचार किया जाए। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि प्रधानमंत्री इस महीने के आखिर में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाएंगे। बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि महंगाई के लिए केंद्र और उसकी नीतियां पूरी तरह जिम्मेदार हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्र के पास कोई दीर्घकालीन नीति नहीं है, जबकि राज्य सरकारें काला बाजारियों और मुनाफाखोरों के प्रति पूरी तरह सतर्क हैं। पवार द्वारा राज्यों को फुटकर बाजार में अपनी एजेंसियों के माध्यम से खाद्य पदार्थ वितरित करने के निर्देश दिए जाने पर नीतीश ने कहा कि अगर कीमतें बढ़ने के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं तो कांग्रेस शासित राज्यों में कीमतें कम क्यों नहीं हो रहीं? उन्होंने बताया कि बिहार में कालाबाजारियों और मुनाफाखोरों के खिलाफ शिकायतों के लिए एक लाइन शुरू की गई है ताकि उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जा सके। इसके अलावा उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता में समिति गठित की गयी है।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

पवार पर बरसीं महिला मंत्री

नई दिल्ली, लगातार बढ़ रही महंगाई के मुद्दे पर केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार न सिर्फ विपक्ष बल्कि अपने सहयोगियों के बीच भी घिरे हैं। बुधवार को कैबिनेट की बैठक में गरीबों का समर्थन पाकर सत्ता में आई तृणमूल नेता ममता बनर्जी खासतौर पर आक्रामक दिखीं। जबकि केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने भी पवार से जानना चाहा कि आखिर सरकार कर क्या रही है? जबकि आमतौर पर हावी रहने वाले पवार सफाई देते दिखे। महंगाई उनकी जेब पर भले ही भारी न हो, जनता की बेचैनी नेताओं को आशंकित करने लगी है। विपक्ष पूरे देश में आंदोलन की तैयारी कर रहा है। खासतौर पर ममता परेशान हैं। उन्होंने पवार से सवाल पूछ लिया। उन्होंने कहा, महंगाई से लोग त्राहि त्राहि कर रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से उन्हें आश्वासन तक नहीं मिल रहा है। सरकार को बताना चाहिए कि महंगाई रोकने के लिए क्या किया जा रहा है। कम से कम जनता को दिखना तो चाहिए कि सरकार महंगाई रोकने को प्रयत्नशील है। सुझाव दिया कि आवश्यक वस्तुओं के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना चाहिए। अंबिका सोनी ने भी यही सवाल उठाए। बताते हैं कि कुछ दूसरे मंत्रियों ने भी महंगाई पर चुप्पी को गलत बताया और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त बनाने तथा जमाखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की।

महंगाई : मुख्यमंत्रियों से होगा जवाब-तलब

नई दिल्ली,-महंगाई जैसे आम आदमी से जुडे़ मुद्दे पर घटक दलों समेत विपक्ष के निशाने पर आई केंद्र सरकार ने बुधवार को राज्यों को लपेटे में ले लिया। कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने दो टूक कह दिया कि बढ़ती कीमतों के लिए अकेले केंद्र ही नहीं बल्कि राज्य सरकारें भी बराबर की जिम्मेदार हैं। पवार की दलीलों के बाद अंतत: प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाने का निर्णय किया, जिसमें महंगाई पर राज्यों की जवाबदेही तय की जाएगी। यह सम्मेलन जनवरी के आखिरी सप्ताह में बुलाया जाएगा। इसमें राज्यों में आवश्यक वस्तु अधिनियम पर अमल और जमाखोरी रोकने जैसे मुद्दों की समीक्षा की जाएगी। केंद्रीय मंत्रिमंडल समिति की बैठक में चौतरफा घिरे पवार ने थोक व खुदरा मूल्यों में भारी अंतर के लिए राज्यों पर आरोप मढ़े। कहा, दाल व खाद्य तेल पर 10 से 15 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी देने के बावजूद ज्यादातर राज्यों ने उत्साह नहीं दिखाया। सब्सिडी वाला खाद्य तेल बांटने वाले राज्यों में महाराष्ट्र, आंध्र, तमिलनाडु और हिमाचल प्रमुख हैं। जबकि आंध्र, बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा और हिमाचल में सब्सिडी वाली दालें बेची जा रही हैं। पवार ने कहा जमाखोरी पर पाबंदी लगाने के लिए केंद्र ने राज्यों को आवश्यक वस्तु अधिनियम की शक्ति प्रदान तो कर दी, लेकिन उसका प्रयोग नहीं किया जा रहा है। आवंटित अनाजों को भी राज्य उठाने में हीलाहवाली कर रहे हैं। राज्यों ने आवंटित 20 लाख टन गेहूं में केवल 1.59 लाख टन उठाया है, जबकि 10 लाख टन चावल में 2.9 लाख टन। राशन दुकानों से अधिक से अधिक खाद्यान्न वितरित करने की अपील भी राज्यों से की गई, लेकिन बीपीएल और अंत्योदय अन्न योजना में भी राज्यों ने कोताही बरती है। ऐसे राज्यों के नामों का उल्लेख करते हुए पवार ने केंद्रीय एजेंसियों को सक्रिय करने का ऐलान किया।

बुधवार, 13 जनवरी 2010

कीमतें कम करने की कवायद शुरू

नई दिल्ली, महंगाई की आंच से बुरी तरह झुलस रही केंद्र सरकार अब बढ़ती कीमतों को रोकने की कवायद शुरू कर रही है। इसके लिए सरकार ने एक पैकेज तैयार किया है जिसके तहत चीनी, गेहूं और दालों की कीमतों को नीचे लाने की कोशिश की जाएगी। खाद्य मंत्रालय के इस पैकेज पर अमल के बाद न सिर्फ बंदरगाहों पर अटकी पड़ी आयातित चीनी को खुले बाजार में बेचा जाएगा बल्कि आयातित दालों की मौजूदा टेंडर प्रक्रिया को भी बदलकर उसे खुले बाजार में डालने की कोशिश की जा रही है। सरकार आसान शर्तो पर खुले बाजार में भारी मात्रा में गेहूं की आपूर्ति बढ़ाना चाहती है ताकि इसकी बढ़ती कीमतों पर भी लगाम लगाई जा सके। खाद्य मंत्रालय के इस पैकेज पर बुधवार को होने वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल की मूल्य समिति पर विचार होगा। यह बैठक पहले मंगलवार को होनी थी, लेकिन इसे बुधवार तक के लिए टाल दिया गया है। दरअसल सरकार के कदमों में तेजी महंगाई के मुद्दे पर अचानक सियासत गरमाने की वजह से आई है। कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार सत्तारूढ़ कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं। हालांकि एनसीपी के नेता डीपी त्रिपाठी ने कहा कि महंगाई के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल को सामूहिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। खाद्य मंत्रालय ने जो प्रस्ताव तैयार किए हैं, उनमें खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति में आड़े आ रही कानूनी अड़चनें खास हैं। इससे कांडला बंदरगाह पर महीनों से डंप आयातित कच्ची चीनी जल्द से जल्द खुले बाजार में पहुंचाने का रास्ता साफ हो जाएगा। कच्ची चीनी के इस स्टॉक को दूसरे राज्यों में ले जाने के लिए कस्टम नियमों में संशोधन करना जरूरी हो गया है। दालों की मांग व आपूर्ति में खास अंतर न होने के बावजूद कीमतों के बहुत बढ़ जाने पर सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं। दरअसल दाल की आयातक सरकारी एजेंसियों के नियमों से जमाखोरी को बढ़ावा मिलता है। उदाहरण के लिए एसटीसी, पीईसी, नैफेड और एमएमटीसी जैसी कंपनियां आयातित दालों को बेचने के लिए हमेशा बड़े सौदों के टेंडर करती हैं। ऐसे में दाल का सौदा बड़ी व्यापारिक कंपनियां करती हैं, जो जिंस बाजार को अपनी अंगुलियों पर नचाती हैं।

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

चीनी पर छिड़ी तकरार

नई दिल्ली/लखनऊ, एजेंसिया : चीनी के 50 रुपये प्रति किलो बिकने के आसार के बीच विभिन्न नेताओं के बीच तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई है। चीनी के बढ़ते दामों को लेकर चौतरफा आलोचना से घिरे कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार ने सोमवार को चीनी के चढ़ते दामों के लिए एक बार फिर उत्तर प्रदेश सरकार पर ठीकरा फोड़ा तो मुख्यमंत्री मायावती ने उन पर पलटवार किया। मायावती ने कहा कि कृषि मंत्री का बयान न केवल गैरजिम्मेदाराना है, बल्कि संवेदनहीन भी। खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार ने नई दिल्ली में संवाददाताओं से कहा कि आयातित कच्ची चीनी कांडला बंदरगाह पर दो माह से अधिक समय से पड़ी हुई हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार चीनी मिलों को इसके प्रसंस्करण की अनुमति नहीं दे रही है। पवार ने कहा कि अगर चीनी मिलों ने प्रसंस्करण किया होता तो हर महीने अतिरिक्त ढाई लाख टन चीनी की उपलब्धता बढ़ी होती और इससे कीमतें कम हुई होतीं। यूपी सरकार को कच्च्ची चीनी के प्रसंस्करण पर लगे प्रतिबंध को उठाए जाने के बारे में पत्र लिखे जाने का जिक्र करते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि हम उन्हें समझा पाने में सफल नहीं रहे। उनके मुताबिक वे उत्तर प्रदेश की समस्या को मूल्य मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के साथ सुलझाएंगे। सीसीपी की कल बैठक होनी है जिसमें खाद्य सामग्रियों विशेषकर चीनी की मूल्य वृद्धि के बारे में विचार विमर्श किया जाएगा। ज्ञात हो कि दिल्ली में खुदरा बाजार में चीनी की कीमत 45 रुपये प्रति किलो चल रही है जो जनवरी 2009 के मुकाबले दोगुने से अधिक है। शरद पवार का बयान सार्वजनिक होने के कुछ ही देर बाद लखनऊ में मुख्यमंत्री मायावती ने एक बयान जारी कर यह कहते हुए उनकी खबर ली कि यह एक जिम्मेदार मंत्री का सबसे अधिक गैर जिम्मेदाराना और संवेदनहीन बयान है। बसपा प्रमुख ने केंद्र सरकार को घेरते हुए कहा कि मूल्य वृद्धि पर अंकुश लगाने के स्थान पर केंद्रीय मंत्री उकसावे वाले बयान देते रहे। उनके अनुसार केंद्रीय मंत्रियों के ऐसे बयानों ने कालाबाजारियों और जमाखोरों का मनोबल ही बढ़ाया कि मुद्रास्फीति मे अभी और वृद्धि होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों के असंतोष को देखते हुए उनकी सरकार ने प्रदेश में कच्च्ची चीनी के परिवहन को स्थगित करने का परामर्श रेलवे बोर्ड को दिया था।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

पूरे साल गिरा प्रोपर्टी का पारा

मुम्बई ।।जब गुब्बारा अपनी क्षमता तक फूल चुका हो तो उसके आगे हवा भरने में उसका फूटना तय है। प्रॉपर्टी मार्केट के लिए साल 2009 की शुरुआत कुछ इसी अंदाज मेंहुई। पहले से ही रिसेशन की आंच में तप रहा रीयल इस्टेट का गुब्बारा साल की शुरुआत में ही फूट चुका था। ऊपर से म्हाडा के 3,863 फ्लैटों के लॉटरी का एनाउंसमेंट क्या हुआ, मानो लोग प्राइवेट बिल्डरों को जैसे भूल ही गए और पीछे हो लिए म्हाडा के घरों के। एक-एक व्यक्ति ने 5-10 फॉर्म भरे। मध्य रेल के एक गार्ड ने खुद और अपनी बीवी के नाम कुल 18 फार्म भरे। म्हाडा के इस भारी ऑफर के पीछे जनता इस कदर भागी कि इसके पास पौने पांच लाख आवेदन आ गए।
चूंकि आर्थिक मंदी के चलते लोगों की सैलरी में कटौती हो रही थी, कंपनियां अपने कर्मचारियों की छंटनी कर रही थी, होम लोन के रेट बढ़ते चले जा रहे थे, कमर्शल बैंकों का भरोसा बिल्डरों पर से उठता जा रहा था, सो बिल्डरों को 16 से 20 प्रतिशत तक की ब्याज दर से लोन मिलने लगा था... कुल मिलाकर यह हुआ कि फ्लैट खरीददारों की जेब ढीली हो गई और बिल्डरों के पास लिक्विडिटी (पैसे) की कमी हो गई। फ्लैट खरीददार न तो बिल्डरों के फ्लैट खरीदने की पोजीशन में थे और ना ही बिल्डर अपने प्रोजेक्ट का काम आगे बढ़ाने की पोजीशन में थे। जिन बिल्डरों के पास होल्डिंग कैपेसिटी थी उन्होंने अपने रेट रोके रखे, मगर जिनके पास पैसे का अभाव था उन्होंने अपने रेट घटाना शुरू कर दिए।
नतीजा यह हुआ कि फरवरी बीतते-बीतते प्रॉपर्टी मार्केट में 20 प्रतिशत तक का करेक्शन आ चुका था। चूंकि सभी पोटैंशियल खरीददारों ने अपना लक म्हाडा के भरोसे रख छोड़ा था, अत: जब तक मई में लॉटरी नहीं निकली तब तक बिल्डरों के यहां इन्क्वायरी लगभग जीरो हो गई थी। अब तक प्रॉपर्टी मार्केट में करेक्शन के साथ-साथ बिल्डर कुछ ऑफर भी लेकर खरीददारों को रिझाने के लिए आ चुके थे। जुलाई तक बड़े-बड़े बिल्डर जो 1-बीएचके जैसे घरों का फार्मूला भूल चुके थे देखते-देखते कई बिल्डर अपने अफोर्डेबल हाउसिंग के कई प्रोजेक्ट लेकर मैदान में कूद पड़े। टाटा, डीएलएफ, पार्श्वनाथ, लैंडक्राफ्ट, जेपी जैसी बड़ी रीयल इस्टेट कंपनियों के अलावा मेफेयर हाउसिंग, रुस्तमजी बिल्डर, लोढ़ा ग्रुप, हावरे बिल्डर्स, रौनक ग्रुप, निर्माण ग्रुप, विजय ग्रुप, हीरानंदानी, नाहर, ऑर्बिट, कल्पतरू, कीस्टोन, ओबेरॉय, रहेजा, एकता, वाधवा, निर्मल ग्रुप, रॉयल पाम जैसे बिल्डर मुम्बई के बिल्डरों ने सस्ते रेट पर बुकिंग शुरू की। मगर जब खरीददारों को यह लगा यहां भी अफोडेर्बल हाउसिंग सुपर-बिल्ट अप पर बेचे जा रहे हैं वे और शहरों से काफी दूर हैं तो खरीददारों का इधर भी मोहभंग हो गया। हां, नाहर ग्रुप को अपने फ्लैटों की बुकिंग पूरी करने में जरूर कामयाबी मिली। बकौल श्री नाहर, हमारे पास फ्लैट बुक कराने वालों की वेटिंग लिस्ट में लाइन लग गई और दो हफ्ते के अंदर हमारे 700 फ्लैट बुक हो गए जो अपने आप में एक रिकार्ड है। रॉयल पॉम बिल्डर्स ने एक-एक करके कई कमशिर्यल सेगमेंट की अफोडेर्बल प्रोजेक्ट लांच कर जरूर काफी हद तक सफलता पाई। बाकी बिल्डर साल भर माथे से पसीना ही पोंछते रहे।
मार्केट की फीकी पड़ती रंगत को निखारने के लिए बिल्डरों ने सरकार के पास गुहार लगाई और सरकार को बजट के बाद जुलाई में स्टिमुलस पैकेज लाना पड़ा। इसमें पहला तो यह कि 10 लाख रुपए तक के लोन के ब्याज में 1 प्रतिशत की कमी, बशर्ते प्रॉपर्टी की कीमत 20 लाख रुपए से ज्यादा न हो। दूसरा यह कि उन प्रोजेक्टों में इनकम टैक्स ऐक्ट 80आईबी के तहत टैक्स में छूट, जिनका कंस्ट्रक्शन मार्च 2007 और मार्च 2008 के बीच शुरू हुआ हो और मार्च 2012 के पहले कंप्लीट हो जाना हो। बस, यहां से फिर से प्रॉपर्टी मार्केट का गिरना बंद हुआ। कई बिल्डरों ने अपने रेट फिर से 10 प्रतिशत तक बढ़ा दिए। जिसका नतीजा यह हुआ कि खरीदारों ने अपने फैसले को फिर से टाल दिया। मगर चूंकि पिछले दिनों कई जमीन के सौदे आसमानी कीमतों पर हुए हैं, अत: लोगों को यह आभास हो रहा है कि प्रॉपर्टी मार्केट फिर से अपनी रफ्तार पकड़ सकता है।

चीनी चली 60 की चाल

नई दिल्ली, बड़े ग्राहकों की खरीद व फ्री सेल कोटा नियमों पर अमल न होने से चीनी और कड़वी हो सकती है। पिछले एक पखवाड़े में चीनी के मूल्य 950 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ चुके हैं। जिंस बाजार के जानकारों की मानें तो खुले बाजार में चीनी के मूल्य 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाने के संकेत हैं। चीनी की कहानी भी अजीब है, जो दिल्ली में 50 रुपये किलो मिल रही है जबकि पड़ोस के शहर चंडीगढ़ में सिर्फ 32 रुपये किलो में उपलब्ध है, जहां चीनी का मुट्ठी भर उत्पादन भी नहीं होता है। इसके पीछे दिल्ली की मंडी में जमाखोरों व बडे़ ग्राहकों की भारी मौजूदगी को जिम्मेदार माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार को देखते हुए यहां के जमाखोर तो अपना स्टाक भरने में लगे ही हैं, चीनी का इस्तेमाल करने वाली बड़ी ग्राहक कंपनियां भी खूब चीनी जमा कर रही हैं। इसी कारण देश के अलग-अलग शहरों में चीनी मूल्यों में भारी अंतर है। जबकि औसत मूल्य 37 रुपये प्रति किलो है। सरकारी नियम-कानूनों पर पुख्ता अमल न होने से भी चीनी के भाव बेकाबू होने लगे हैं। खाद्य मंत्रालय चीनी मिलों के लिए खुले बाजार में हर महीने कोटा जारी करता है, जिसे बेचना अनिवार्य होता है। ऐसा न कर पाने वाली मिलों पर सख्त नियम है कि चीनी की जो मात्रा नहीं बिक पाएगी, उसे लेवी कोटे में तब्दील कर दिया जाएगा, लेकिन इस नियम पर शायद ही ठीक से अमल होता है। नतीजतन, हालत बिगड़ते जा रहे हैं।

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