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सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

पटाखे=सौ स्कूल या दस लाख हैंडपंप


शनिवार रात दीवाली पर जब पटाखे छोड़कर वातावरण में ध्वनि और वायु प्रदूषण को बढ़ावा दिया जा रहा था, तब गुजरात के मेहसाणा जिले के एक छोटे से गांव कंसा का आसमान शांत था। वहां पर्यावरण को बचाने के लिए पटाखों का बहिष्कार कर शांत दीवाली मनाई। पटाखों का शोर तो शांत हो गया लेकिन इन गांववासियों के अनूठे कदम की धमक पूरी दुनिया में गूंज उठी। हो सकता है कि देश में कंसा जैसे और कई गांव हों जहां लोग पर्यावरण प्रेमी हो, लेकिन कितने? मान्यता है कि लंका के राजा रावण को युद्ध में हराकर भगवान राम के वापस लौटने पर अयोध्यावासियों ने घी के दीप जलाकर अपनी प्रसन्नता का इजहार किया। तभी से यह परंपरा महापर्व की तरह भारतवर्ष सहित कई देशों में मनाई जा रही है। दीवाली मनाने का तौर-तरीका बदलता रहा और पता नहीं कब पटाखे छोड़ने का चलन शुरू हो गया। जबकि किसी भी ग्रंथ में पटाखे चलाने की बात नहीं लिखी गई है। इसके बावजूद दीवाली पर देश में 20 से 30 अरब के पटाखे धुंआ कर दिए गए। न्यूनतम 20 अरब रुपये भी पटाखों पर खर्च हुए होंगे तो यह इतनी बड़ी रकम है कि इसके सार्थक प्रयोग से सौ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या सौ प्राइमरी पाठशालाएं या दस लाख इंडिया मार्का हैंडपंप लगाए जा सकते थे। जिससे देश की एक बड़ी आबादी को लाभ मिलता। धुएं और शोर में यह रकम उस देश में बर्बाद की जा रही है जहां अब भी एक बड़ा तबका भूखे पेट सोने को मजबूर है। 20 करोड़ से ज्यादा लोग आज भी रोजाना पचास रुपये से कम पर आजीविका चला रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद साक्षरता शत-प्रतिशत नहीं हो पा रही है। बच्चों को शुरूआती कक्षाओं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ जाती है। आम बीमारियों से हर साल लाखों बच्चे मारे जाते हैं। ऐसे में 20 अरब यानी 2000 करोड़ के पटाखे धुंआ कर देना कहीं से भी जायज लगता है। बीस अरब की रकम छोटी मोटी रकम नहीं होती। अगर बीस करोड़ की लागत से ब्लाकवार एक-एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनवाया जाए तो इस रकम से 100 ब्लाकों की जनता अपनी बीमारियों का इलाज करा सकेगी। इस धनराशि से 100 प्राइमरी स्कूल बनवाए जा सकते हैं। अगर प्रति स्कूल के औसत से 500 बच्चे भी अपना भविष्य निर्माण करते तो हमारे मानव संसाधन में हर साल पचास हजार की बढ़ोतरी होती। यही नहीं, देश के कई इलाके ऐसे हैं जहां पीने के पानी के लिए हर दिन लोगों को जिद्दोजहद करनी पड़ती है। इस रकम से दस लाख इंडिया मार्का हैंडपंप लगाए जा सकते हैं जिससे कम से कम इतने ही गांव के लोग अपना गला तर कर सकते हैं। पटाखे छोड़ना पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह है। आज दुनिया का सबसे बड़ा एजेंडा जलवायु परिवर्तन से निपटना है। इस संकट के परिणाम दिखने शुरू हो गए हैं। दिनों दिन इनकी भयावहता बढ़ती जाएगी। लेकिन इस महापर्व के दिन पटाखे फोड़कर हवा और ध्वनि प्रदूषण पैदा करने से कहीं से भी नहीं लगता कि हम अपने उज्ज्वल और स्वच्छ भविष्य के प्रति संजीदा है। हम अपने अपने वाली पीढि़यों के साथ नाइंसाफी तो नहीं कर रहे हैं? क्या भविष्य के लिए यही अनुकरणीय आदर्श स्थापित किया जा रहा है?

ग्रामीणों ने बर्बादी में ढूंढ़ा खुशहाली का रास्ता


उन्होंने अपनी बर्बादी के बाद खुद को संभाला..कारण को समझा..फिर बर्बादी के उस कारण में अपनी खुशहाली का रास्ता ढूंढ़ निकाला। उन्होंने इस बार वह गल्ती नहीं दोहराई जो हर बार उनकी खुशियों को राख के ढेर में बदलने का काम करती थी। उन्होंने एक ऐसी रीत चलाई जो न केवल उनके वर्तमान को बचा गई बल्कि उनके भविष्य को भी संवारने की नींव रख गई। साथ ही हम सबके लिए भी सबक बन गई। जिला कांगड़ा के छोटा भंगाल में हर साल खासकर दीवाली पर एक किसी न किसी परिवार को खुशियां आग की भेंट चढ़ जाती थी। यहां के लोगों ने इस बर्बादी से सबक लिया और मूल कारण को समझा। आग लगने का मुख्य कारण थे पटाखे। लकड़ी से बने यहां के घरों के लिए एक चिंगारी भी बारूद का काम कर जाती है। इस कारण पर मंथन करते हुए छोटा भंगाल के लोगों ने इसे पर्यावरण के लिए भी खतरनाक पाया। इस दीवाली उन्होंने सबक लेते हुए पटाखे चलाने से तौबा कर ली। हर साल किसी न किसी परिवार की खुशियों पर वज्रपात करने वाली दीवाली छोटा भंगाल में इस बार वैदिक रीति-रिवाज से ही मनाई गई। दीवाली की रात घरों की दहलीज पर जहां घी के दीपक जले वहीं फूलमालाओं से घरों को साज-सज्जा की गई। पर्यावरण संरक्षण की कसम उठाते हुए गांववासियों ने इस बार दीवाली पर अपने घरों में पटाखे नहीं फोड़े। लोगों ने पटाखे फोड़ने के बजाए मीठे पकवान बनाए और कुल देवता सहित मां लक्ष्मी की पूजा कर दीवाली मनाई। छोटा भंगाल के लोगों ने इस दीवाली पर्यावरण संरक्षण की कसम खाई। वह इसमें पूरे प्रदेश की खुशहाली देखते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि इस पहल को हम सब मिलकर आगे बढ़ाएं। पर्यावरण के प्रति अपनी समझ का परिचय देते हुए यहां के लोगों ने दुनिया को संदेश भी दिया है कि अगर हम अब भी नहीं चेते तो सब खत्म हो जाएगा। इस पहल के पीछे स्वच्छता अभियान के समन्वयक व समाज सेवक रामशरण चौहान का बड़ा हाथ बताया जा रहा है। बरोट क्षेत्र के रामशरण ने पर्यावरण संरक्षण का बीड़ा बहुत पहले से उठा रखा है, जिसके परिणाम अब सामने आने लगे हैं।

नानकशाही कैलेंडर पर फिर शुरू हुआ बवाल


सिख धर्म में कई विवादों को जन्म देने वाला नानकशाही कैलेंडर पर फिर बवाल होने लगा है। श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार नानकशाही कैलेंडर को रद करने की तैयारी में जुट गए हैं। दिवाली पर जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह ने अन्य कुछ सिंह साहिबान के साथ नानकशाही कैलेंडर को रद करने का निर्णय लगभग ले लिया था, लेकिन तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार बलवंत सिंह नंदगढ़ के विरोध के कारण कैलेंडर रद होने से बाल-बाल बच गया। नानकशाही कैलेंडर को रद करने के लिए अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ने पांच सिंह साहिबान की आपातकालीन बैठक दीपावली के दिन आमंत्रित की। बैठक का कोई भी एजेंडा सिंह साहिबान को नहीं भेजा गया। मगर 17 अक्टूबर सुबह नानकशाही कैलेंडर के मुद्दे पर आमराय बनाने के लिए श्री दरबार साहिब के सूचना केंद्र कार्यालय में ज्ञानी गुरबचन सिंह की अध्यक्षता में पांच सिंह साहिबान की बैठक हुई। बैठक में एसजीपीसी के अध्यक्ष जत्थेदार अवतार सिंह मक्कड़ भी शामिल हुए। मक्कड़ ने नानकशाही कैलेंडर का विरोध कर रहे विभिन्न संप्रदायों, संत पुरुषों, सिख धर्म के प्रचार के साथ जुड़े हुए डेरों व दो तख्त साहिबान का उल्लेख करते हुए कैलेंडर को रद करने की सिफारिश की। कैलेंडर रद करने का प्रस्ताव जैसे ही ज्ञानी गुरबचन सिंह ने रखा, तत्काल उसका विरोध बलवंत सिंह नंदगढ़ ने किया। ज्ञानी गुरबचन सिंह का साथ देने में पटना साहिब व हुजूर साहिब के जत्थेदार भी थे। मगर नंदगढ़ अपनी बात पर अड़े रहे। चूंकि ज्ञानी गुरबचन सिंह ने अकाल तख्त साहिब से कौम को संदेश देना था। इसलिए बैठक स्थगित कर दी गई। कौम के नाम संदेश देने के बाद सूचना केंद्र कार्यालय में फिर बैठक शुरू हुई, लेकिन कैलेंडर के मुद्दे पर नंदगढ़ ने अपना कड़ा रुख अपनाए रखा। रविवार सुबह फिर पांच सिंह साहिबान कैलेंडर पर विचार विमर्श करने के लिए बैठे, लेकिन नंदगढ़ के विरोध के बाद श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ने प्रेस के नाम एक वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि समूह खालसा पंथ की एकता के लिए, कुछ पंथक संगठनों व संप्रदाय द्वारा नानकशाही कैलेंडर में संशोधित करने के सुझाव दिए हैं। यह सुझाव एसजीपीसी को भेज दिए गए हैं। एसजीपीसी इन सुझावों पर विद्वानों, पंथक संगठनों व कैलेंडर विशेषज्ञों के साथ बातचीत करने के बाद एक रिपोर्ट श्री अकाल तख्त साहिब को सौंप देगी। उसके बाद संशोधित नानकशाही कैलेंडर दशम पिता गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व पर जारी किया जाएगा। नानकशाही कैलेंडर 14 अपै्रल 2003 को एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष जत्थेदार किरपाल सिंह बंडूगर व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने तख्त श्री दमदमा साहिब से लागू किया था। इससे पूर्व कैलेंडर को लेकर अकाल तख्त साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी पूरन सिंह व एसजीपीसी की पूर्व अध्यक्ष बीबी जागीर कौर के विरुद्ध राजनीतिक व धार्मिक घमासान छिड़ा था।

श्रद्धा का सैलाब


मथुरा में गोवर्धन पूजा के अवसर पर रविवार को भगवान श्री कृष्ण के लिए दूध व दही ले जातीं विदेशी महिलाएं। पूरेब्रज क्षेत्र में गोवर्धन पूजा महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस महोत्सव में भाग लेने के लिए देसी-विदेशी सैलानियां का सैलाब उमड़ पड़ा।

अनपढ़ भी पढ़ सकेंगे किताब


किताब पढ़ने का अनुभव अब वे लोग भी कर सकेंगे, जो अब तक पढ़ना-लिखना सीख नहीं सके। हाथ में किताब थामे, पन्नों पर बने चित्र देखते हुए, हर पन्ने के लिए अलग से बनाई गई एक आडियो क्लिप को सुनना.. यह अनुभव किताब को पढ़ने से कमतर नहीं होगा। स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विभिन्न संगठनों ने क्लीनिकल ट्रायल में भाग लेने वालों के लिए एक ऐसी ही किताब तैयार की है। 16 पन्नों की यह बोलती किताब भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) और कुछ दूसरे संगठनों की मदद से तैयार की है। आम किताब से थोड़ी अलग दिखने वाली इस किताब में दाईं ओर एक पैनल बना हुआ है। हर पन्ने पर बड़े-बड़े चित्र हैं और पैनल पर हर पन्ने के चित्र बने हुए हैं। जो पन्ना आप सुनना चाहते हैं, पैनल पर उस पन्ने के ऊपर दबाएं। इस किताब में हिंदी और अंग्रेजी दो भाषाओं का विकल्प उपलब्ध है। बोलती किताब के सिलसिले की शुरुआत की गई है क्लीनिकल ट्रायल में भाग लेने वाले मरीजों से। आईसीएमआर के महानिदेशक वीएम कटोच कहते हैं, हिंदुस्तान में पिछले कुछ वर्षो के दौरान नई दवाओं के परीक्षण का उद्योग काफी तेजी से बढ़ा है। लेकिन कई बार आरोप लगता रहता है कि ये कंपनियां परीक्षण में गरीब और अनपढ़ मरीजों को शामिल कर लेती हैं और उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी जाती। यह किताब ऐसे मरीजों के लिए बेहद मददगार साबित होगी। किताब परीक्षण के विभिन्न पहलुओं पर बहुत सरल भाषा में बात करती है। किताब को माला नाम की एक पात्र पढ़ती है। और दस मिनट से भी कम समय में पूरी किताब सुन कर पढ़ी जा सकती है।

तसलीमा की कोलकाता वापसी पर ममता भी मौन



पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा सरकार द्वारा मशहूर बांग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन को प्रदेश बदर किए जाने का मामला भले ही राष्ट्रीय स्तर पर खूब उठा मगर उसकी गूंज दब कर रह गई है। यहां तक कि प्रदेश में बदलाव का नारा देने वाली ममता बनर्जी भी वोटों की राजनीति के चलते इस बारे में कुछ भी बोलने से कतरा रही हैं। हाल ही में तसलीमा ने केंद्रीय रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो को अपनी घर वापसी के बावत पत्र लिखा लेकिन इस पर मंत्री मौन हो गईं। हिन्दी के प्रख्यात कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने कभी कहा था- अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने होंगे, तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब, लेकिन आज इन पंक्तियों पर धूल जम गई है। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने पर लेखनी बंद कर दी जाती है वह भी लोकतांत्रिक देश में। ऐसे लेखकों को पसंदीदा शहर से दूर अन्य शहर और देश में रहने के लिए जगह तलाशनी पड़ रही है। बांग्लादेश की निर्वासित एवं विवादित लेखिका तसलीमा नसरीन की भी जिंदगी भी कुछ ऐसे ही राहों से फिलहाल गुजर रही है। तसलीमा लगभग दो वर्षो से शहर का मुंह नहीं देख पाई हैं। अल्पसंख्यक वर्ग से जुड़े कुछ नेताओं के दबाव में आकर राज्य सरकार भी तसलीमा को शहर में पनाह देने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। लेखिका ने बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य व रेलमंत्री एवं तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को पत्र भेजा लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। वजह साफ है कि वोट बैंक की राजनीति में अभिव्यक्ति दरबदर हो रही है। यह भी स्पष्ट हो गया है कि तसलीमा की लेखनी के ममता व कद्रदान नहीं हैं। वैसे दोनों की साहित्य में बेहद रुचि है। ममता पंद्रह से अधिक पुस्तकें लिख चुकी हैं और बुद्धदेव द्वारा लिखित नाटक दु:समय चर्चित रहा है। लेखक होकर भी दोनों तसलीमा की कोलकाता वापसी के पक्ष में नहीं हैं। डेढ़ दशक पहले तसलीमा विवादित उपन्यास लज्जा से सुर्खियों में आईं। वह कई बार कह चुकी हैं कि कोलकाता में उनकी लेखनी और जान बसती है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका महाश्र्वेता देवी कहती हैं कि तसलीमा के साथ लगातार अन्याय हो रहा है। पीडि़त महिलाओं के लिए अपनी लेखनी में आवाज उठाने वाली तसलीमा आज खुद पीडि़ता बन गई हैं। बुद्धिजीवियों का कहना है कि तसलीमा की कोलकाता वापसी के लिए प्रयासरत है पर दोनों प्रमुख पार्टियां कान बंद किए हुए हैं।

वायुसीमा में अमेरिकी विमान की फिर सेंध


नई दिल्ली(डॉ सुखपाल)-अमेरिकी कमांडो के साथ एक विमान बिना अनुमति भारतीय वायुसीमा में घुसा। फिर मामूली जांच के बाद उसे रवाना करने की मंजूरी मिल गई। हालांकि यह सोमवार को कूच करेगा। पिछले चार महीनों के दौरान भारत की वायुसीमा में सेंधमारी की यह चौथी घटना है। वायुसीमा में सेंधमारी की हालिया तीन में से दो घटनाओं में खलनायक अमेरिकी वायुसेना रही। रविवार को वायुसीमा उल्लंघन करने वाले अमेरिकी विमान को मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया गया। उत्तरी अमेरिकन एयरलाइंस का बोइंग 767 विमान संयुक्त अरब अमीरात के फुजीरिया से बैंकाक के उतापाओ हवाई अड्डे जा रहा था। विमान में सवार 205 यात्रियों में कई अमेरिकी नौसैनिक भी थे। विमान को प्राथमिक जांच-पड़ताल के बाद गंभीर न मानते हुए छोड़ दिया। वायुसीमा के उल्लंघन को लेकर इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि जब से अफगानिस्तान और इराक सहित मध्यपूर्व के देशों में अमेरिकी सैन्य बल बढ़ा है तब से भारतीय वायुसीमा के उल्लंघन के मामले भी बढ़े हैं। साथ ही हमें नब्बे के दशक में वायुसीमा का उल्लंघन कर भारतीय सरजमीं पर हथियार गिराने के पुरुलिया कांड को भी नहीं भूलना चाहिए। सुरक्षा को लेकर देश की सतर्कता और तैयारी के तमाम दावों के बीच पिछले चार महीने में सीमा उल्लंघन की घटनाएं बढ़ी हैं। इसी वर्ष जून में अमेरिकी एएन-32 कार्गो विमान ने वायुसीमा का उल्लंघन किया था। उसमें भी अमेरिकी सैनिक मौजूद थे। बताया गया कि सैनिक अफगानिस्तान जा रहे थे। उस विमान को भी मुंबई में उतरने को बाध्य किया गया था। सितंबर की घटना ज्यादा गंभीर थी। उस समय हथियारों से लदे सउदी अरब के एक सैन्य विमान ने चीन जाते हुए भारतीय वायुसीमा में प्रवेश किया था। भारत को यह जानकारी नहीं दी गई थी कि उसमें हथियार हैं। पूछताछ के बाद सउदी अधिकारियों ने खेद जताकर छुटटी पा ली। रविवार की घटना में भी भारतीय एजेंसियों को यह जानकारी नहीं दी गई थी कि उनके विमान में नौसेनिक कमांडो यात्रा कर रहे हैं। मुंबई की घटना के बाद समुद्री चौकसी का दावा भी ढीला साबित हुआ। करीब एक पखवाड़े पहले तूतीकोरिन के पास एक विदेशी जहाज पकड़ा गया था। इस पर सिंगापुर का झंडा लगा था। सुरक्षा एजेंसियों की आंख से चूकता हुआ वह जहाज कोडईकनाल के संवेदनशील न्यूक्लियर संयंत्र के दस किलोमीटर दायरे में पहुंच गया था। यह तो संयोग ही था कि मछुआरों ने उसे देख लिया और जहाज में कोई आपत्तिजनक वस्तु भी नहीं थी। साफ है कि चाहे सिंगापुर जहाज के न्यूक्लियर प्लांट के निकट पहुंचने का मामला हो या अमेरिकी सैन्य विमान के वायुसीमा में सेंध लगाने का, दोनों हमारे सुरक्षा दावों पर सवालिया निशान तो लगाते ही हैं।

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

अपनों की हवस का शिकार


पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने के लिए दोषियों के नाम भी सार्वजनिक नहीं किए जा सकते.--
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इंग्लैंड के कार्डिफ़ शहर में भारतीय मूल की एक महिला का लंबे अरसे से यौन शोषण करने के मामले में उनके ही कई सगे संबंधियों को लंबी क़ैद की सज़ा सुनाई गई है.

परिजनों के साथ ही शारीरिक संबंध बनाने को मजबूर हुई महिला गर्भवती हो गई और उसने अपनी माँ को इसकी जानकारी दी.

लेकिन माँ से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने पर उसने आत्महत्या की कोशिश की.

ये मामला तब प्रकाश में आया जब अदालत में कार्रवाई शुरू हुई और दोनों पक्षों के बीच बहस हुई.

अदालत ने पीड़ित महिला के सौतेले पिता को 15 साल, चाचा को 20 साल और उसके जीजा को 12 साल की क़ैद की सज़ा सुनाई और कहा कि इन लोगों ने इस महिला को एक 'वेश्या' की तरह इस्तेमाल किया.

जज ने सज़ा पूरी करने के बाद पीड़िता के संबंधियों को वापस भारत भेजने के आदेश दिए हैं.

अदालत को बताया गया था कि इस महिला का यौन शोषण बचपन से ही पहले उसके चाचा ने, और फिर उसके सौतेले पिता और जीजा ने किया.

दोस्त ने दी हिम्मत
पीड़ित महिला का कहना है कि अगर उसके पुरुष मित्र ने उसका साथ नहीं दिया होता तो उससे जुड़ा ये सच कभी उजागर नहीं होता.
महिला ने कहा है, "मेरे दोस्त ने मुझे हिम्मत दी कि मै इन लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत करूँ जो वर्षों से मेरा यौन शोषण करते आए हैं."

महिला ने कहा," मेरे लिए बाहर निकलना मुश्किल था. अब भी मैं अपने घर से ठीक तरह से निकल नहीं सकती क्योंकि मुझे लगता है कि लोग मेरे बारे में बातें कर रहे होंगे."

महिला का कहना था कि जब उसने अपनी माँ को बताया कि उसे सात महीने का गर्भ है और इसका ज़िम्मेदार घर का ही एक व्यक्ति है तो उसकी माँ ने उसका यकीन नहीं किया और डॉक्टर के पास जांच कराए जाने के बाद उसकी पिटाई की.

महिला के चाचा ने अदालत में ये माना है कि वो ही उस बच्चे का पिता है जो इस महिला के गर्भ में पल रहा था.

वकील ने बताया है कि इस महिला ने पिछले साल पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि पांच साल की उम्र से ही इसके परिवार के ही सदस्य उसका यौन शोषण कर रहे हैं.

घर वापसी के लिए जेल की यात्रा


जावेद रोज़गार की तलाश में सउदी अरब अमीरात गए थे लेकिन उनके पास वैध वर्क परमिट नहीं था-
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जेल शब्द अपने आप में डर का एहसास कराता है लेकिन जब सवाल पापी पेट का हो तो जेल जाने में बुराई क्या है. ये कहना है लखनऊ के चिकन कारीगर जावेद मक़सूद अहमद का जो जेद्दा (सऊदी अरब अमीरात) से भारत मुफ़्त में आने के लिए जानबूझ कर जेल गए.

रोज़गार की तलाश में भारत के बहुत से लोग खाड़ी देशों की ओर रुख़ करते हैं. वीज़ा संबंधी कड़े नियमों के कारण रोज़गार के लिए वीज़ा मिलना इतना आसान नहीं होता है. ऐसे में लोग वहाँ उमरा वीज़ा लेकर जाते हैं. यानी हज के समय के अतिरिक्त मक्का-मदीना की यात्रा के लिए लोग सऊदी अरब जाते हैं जिसकी अवधि 45 दिनों की होती है. उसके बाद वे लोग वहीं रह कर छोटे मोटे रोज़गार करने लग जाते हैं.

चूँकि इनके पास कोई वैध 'वर्क परमिट' नहीं होता है ऐसे में उनके पकड़े जाने का ख़तरा बना रहता है.

सऊदी अरब अमीरात के कानूनों के मुताबिक ऐसे पकड़े गए किसी भी व्यक्ति को उसके देश वापस भेज दिया जाता है. पकडे जाने और अपने देश भेजे जाने के बीच का समय उसे जेल में बिताना पड़ता है.

उल्लेखनीय है कि अवैध रूप से रह रहे ऐसे लोगों को उनके देश भेजने का खर्चा सऊदी अरब अमीरात की सरकार उठाती है. यह एक ऐसा लालच है जो लोगों को जेल जाने के लिए प्रेरित करता है क्योंकि लौटने की यात्रा मुफ़्त हो जाती है भले ही कुछ दिन जेल में बिताने पड़ते हैं.

जावेद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वे अपने दोस्तों के साथ टूरिस्ट वीज़ा पर सऊदी अरब गए थे. लगभग सत्रह महीने रहने के बाद उन्होंने अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया जिससे उनकी भारत यात्रा मुफ़्त में हो सके. इसके पीछे वे तर्क देते हैं कि उन्होंने सऊदीअरब की जेलों की काफी तारीफ़ सुनी थी, खासकर खाने की और दूसरा मुफ्त में घर वापसी.

हवालात के दिन

जावेद ने भारत लौटने के लिए जेद्दा के नीम गाबा चौराहा पर अपने दोस्तों के साथ खाना खाया तभी पुलिस को देख कर भागने का नाटक किया. पुलिस ने उनको हिरासत में ले लिया. उनके टूरिस्ट वीज़ा की अवधि समाप्त हो चुकी थी इसलिए उन्हें जेल भेज दिया गया.

जावेद जेल पूरी तैयारी से गए थे. उन्हें पता था कि जेल में तलाशी के वक़्त कैदियों से पैसे छीन लिए जाते थे इसलिए उन्होंने अपने सारे डॉलर मोड़कर अपने रूमाल के किनारों में सिल लिए थे. तलाशी के वक्त उसी रूमाल से अपनी नाक पोंछते रहे जिससे किसी का ध्यान उस रूमाल की तरफ नहीं गया. बाद में इसी पैसों से उन्होंने जेल में कारोबार भी किया. वे जेल के कैदियों को सिगरेट और सिर दर्द की गोलियां बेचते थे. वे जेल के सफाई कर्मियों से थोक में सिगरेट और सिर दर्द की गोलियां मंगवा लिया करते थे.
जावेद और उनके साथी जिस जेल में थे वहां सारे क़ैदी अवैध रूप से रह रहे अप्रवासी ही थे, जिसमें ज्यादातर श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत से थे. वे कहते हैं कि इसलिए वहां का माहौल उतना ख़तरनाक नहीं था. सुबह आठ बजे नाश्ता, दो बजे दोपहर का खाना और रात नौ बजे फिर खाना मिलता था.

जावेद कहते हैं, "इतना पौष्टिक और समय से खाना तो घर पर भी नहीं मिल सकता."

उनके साथ 165 लोगों का दल एक कमरे में रहता था. वे कहते हैं कि जेल के नियम तोड़ने पर बहुत बुरी तरह पिटाई हुआ करती थी.

हालाँकि तेरह दिन की जेल यात्रा को जावेद आज भूलने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अपने एक साथी क़ैदी की पिटाई और उसका चीखना आज भी उन्हें परेशान करता है.

इनका दिवाला, उनकी दीवाली !


इस बार बिहार में लालू ब्रांड पटाख़ों की काफ़ी बिक्री हुई है
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बिहार में धनतेरस और दीपावली के मौक़े पर बाज़ार में बहार आ गई. कार, टीवी, फ़्रिज, गहने, पटाख़े और मिठाइयों की रिकार्ड-तोड़ बिक्री हुई.

यह सब देख-सुन कर कुछ लोग बेहद चिढ़ गए हैं. वो कहते हैं, "बिहार के गांवों में विकास-योजनाओं का दिवाला निकाल देने वाले भ्रष्टाचारियों की दीवाली है ये."

कारोबारियों से जुड़ी एजेंसियों द्वारा मोटे तौर पर किए गए आंकलन के मुताबिक़ अकेले पटना शहर में पचीस करोड़ रूपए के पटाखे और दो करोड़ रूपए की मिठाइयां बिक जाने की पुष्टि हुई है.

कुछ स्थानीय कारोबारियों के ज़रिए बाज़ार में उतारे गए उन पटाखों की ख़ूब बिक्री हुई है, जिन के डब्बों या रैपरों पर लालू प्रसाद, राबड़ी देवी, नीतीश कुमार और राम विलास पासवान के चित्र छपे हुए हैं.

इस सिलसिले में लालू प्रसाद ने चुटकी ली है कि "लालू ब्रांड पटाखा-बम के आगे नीतीश ब्रांड फुलझड़ी की भला क्या औक़ात हो सकती है?"

राम विलास छाप चक्करघिन्नी पर व्यंग्य करते हुए यहाँ लोग कहते हैं कि 'ये छुर्छुरी वाली घिरनी पासवान जी की राजनीति से बड़ा मेल खाती है'

इनके अलावा लादेन और कसाब के नाम और तस्वीर छाप वाले पटाख़ा-बम भी यहाँ ख़ूब चर्चा में हैं.

आर्थिक मंदी या सूखे के संकट से बिलकुल बेपरवाह ख़रीदारों की भीड़ देख कर बाज़ार की बांछें खिली हुई हैं.

गांवों में भले ही महंगाई ने ग़रीब किसानों का दिवाला निकाल दिया हो, शहरों में तो धन-पशुओं की दीवाली उफान पर दिख रही है.

हर्ष-उल्लास से मनी दीवाली


इस बार दीवाली में बाज़ार में रौनक देखी जा रही है



पूरी दुनिया में प्रकाश पर्व दीवाली हर्ष और उल्लास के साथ मनाई गई.

लोगों ने नए कपड़े पहने, पटाखे फोड़े, मिठाइयाँ बाँटीं और समृद्धि के लिए प्रार्थनाएँ की गईं.

चरमपंथी हमलों के ख़तरों को देखते हुए सुख, समृद्धि और शांति का प्रतीक माने जाने वाले इस त्यौहार के लिए भारत में सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए थे.

इस अवसर पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने लोगों के बीच शांति और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दिया.

उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी देशवासियों को दीवाली की शुभकामनाएँ दीं.

विदेशों में दीवाली
अपने घर और देश से दूर रह रहे लाखों भारतीयों ने शनिवार को धूम-धाम से दीवाली मनाई.

लोगों ने अपने घरों को सजाया और मित्रों के साथ मिलकर तरह-तरह से दीवाली मनाई. दुनिया भर में कई जगह भारतीय छुट्टी पर रहे.

अमरीका में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दो दिन पहले ही दीवाली मना ली थी, बाद में भारतीय दूतावास ने दीवाली पर कई आयोजन किए.

लंदन में प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने भी अपने सरकारी निवास, 10, डाउनिंग स्ट्रीट में दीवाली मनाई. बराक ओबामा की तरह उन्होंने भी वैदिक मंत्रोचार के साथ विश्व शांति के लिए प्रार्थना की.

नेपाल में भारत की तरह ही ज़ोरशोर से दीवाली मनाई गई, तो श्रीलंका में राष्ट्रपति ने तमिलों को बेहतर भविष्य का आश्वासन देते हुए उम्मीद जताई कि तमिल जल्द ही शरणार्थी शिविरों से अपने घरों को वापस लौट सकेंगे.

संयुक्त अरब अमीरात और मलेशिया में भी दीवाली उत्साह से मनाए जाने की ख़बरें हैं.

जगमग दीवाली और शुभकामनाएँ
भारत में शुक्रवार की शाम पटाखों की एक फ़ैक्ट्री में आग लग जाने से 32 लोगों की मौत हो गई. लेकिन शेष भारत में दीवाली के शांतिपूर्ण माहौल के बीच उत्साह से मनाए जाने की ख़बरें हैं.

लोगों ने अपने घरों को लाइटों और दीयों से सजाया और पटाख़े फोड़े.

हर वर्ष की तरह लोगों ने एक दूसरे के घर मिठाइयाँ भी पहुँचाईं.

परंपरा के अनुसार अभी दीवाली दो दिन और चलती रहेगी.

दिल्ली सहित देश के सभी शहरों में सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए थे.

इस बीच राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति ने लोगों को शुभकामनाएँ दीं.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने संदेश में कहा कि दीवाली लोगों के बीच दोस्ती और भाईचारे को मजबूत करने का पर्व है.

जहाँ पिछले वर्ष दीवाली में दुनिया भर में आर्थिक मंदी की वजह से बाज़ार में सुस्ती छाई थी वहीं इस वर्ष बाज़ार में चहल-पहल रही.

For candidates, no Diwali celebrations until Oct 22


Chandigarh, October 18(Dr SUKHPAL)-For the 1,221 candidates in fray for 90 seats of the Haryana Vidhan Sabha, Diwali celebrations are on hold till October 22 when the counting takes place.

Though only one in 14 of these candidates will make it to the 12th Vidhan Sabha of the state, yet all will be fingers crossed till the final count.

How many sitting legislators will make it to the next House and will the number of successful women candidates cross the unlucky number of 13 are some of the questions that await answers.

Elections to the 12th Vidhan Sabha have been unique for more reasons than one. Not only they were these held six months in advance, but also recorded the highest-ever voting percentage of 72.71 in 42 years.Another interesting aspect has been the voting pattern.

For example three of the state’s showcase cities, Gurgaon, Faridabad and Panchkula, went the Mumbai way, recording a low turnout. Mumbai saw a poor turnout despite the fact that Mumbaikers have been venting their anger after the 26/11 terrorist attack.

While 14 of the assembly segments polled more than 80 per cent votes, these three constituencies did not touch the 60 per cent mark and were the lowest in the list.

This is all the more intriguing since these are the three constituencies that have witnessed either maximum investment or the highest expenditure in infrastructure development.Thirtysix assembly segments witnessed a polling of 75 per cent or more. Only six constituencies polled less than 60 per cent, the other three being Kharkauda (57.17), Ballabgarh (59.63) and Badkhal (55.73).

Another unique feature of the 12th Vidhan Sabha elections is that it saw five major parties, national and regional, contesting on their own without alliances.

The only alliance, a minor one, was between the SAD and the INLD.

The BJP, the BSP and the HJC, the Congress and the INLD virtually contested every seat. Also, the SAD made its debut in electoral politics in Haryana by contesting Ambala City and Kallanwali seats under its own election symbol.

And when the results are declared on October 22, one of the Lals that dominated the state political scenario ever since it came into being in 1962, would be there in the House.

Last of the Lals - Bhajan Lal - is now a member of the Lok Sabha. His wife, Jasma Devi and son, Kuldip Bishnoi, have their political fortunes locked in the EVMs of the Nalwa and Adampur constituencies.

His other son, Chand Mohammad, alias Chander Mohan, could not contest with the Congress denying him the ticket.The other two Lals, Devi Lal and Bansi Lal, are no more but their progenies are in the race to make it to the 12th Vidhan Sabha.

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

HAPPY DIWALI



हैप्पी दीवाली


शिमला में प्रकाश पर्व की पूर्व संध्या पर आतिशबाजी से आसमान में दीवाली लिखने की कोशिश।

हर नागरिक के फिंगर प्रिंट लेगी सरकार


2011 की जनगणना के लिए जब सरकारी कर्मचारी आपके दरवाजे आएंगे तो वे आपसे सभी अंगुलियों के निशान (फिंगर प्रिंट) देने को कह सकते हैं। यही नहीं, आपकी आंख का स्कैन (इलेक्ट्रानिक चित्र) भी किया जा सकता है। दरअसल, इसका इस्तेमाल देश के हर नागरिक को खास नंबर देने की महत्वाकांक्षी सरकारी योजना में किया जाएगा। यूनिक आईडेंटीफिकेशन नंबर (यूआईडी) योजना के तहत पहला नंबर अगले एक से डेढ़ साल के अंदर जारी होने की उम्मीद है। इसे सबसे पहले महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के लाभार्थियों को दिया जाएगा। लेकिन, यूनिक आईडेंटीफिकेशन अथारिटी आफ इंडिया (यूआईडीएआई) के प्रमुख नंदन नीलेकणि ने स्पष्ट किया है कि 16 अंकों वाला यह नंबर हर व्यक्ति को अलग पहचान तो देगा लेकिन इससे किसी को कोई अधिकार नहीं मिलेंगे, मसलन नागरिकता सरीखे। नीलेकणि ने उन आशंकाओं को खारिज कर दिया कि यूआईडी के जरिए अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी भारत की नागरिकता हासिल कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यूआईडी किसी को कोई अधिकार नहीं देगा। नीलेकणि ने कहा, गृह मंत्रालय के साथ हमने एक करार किया है। इसके तहत वर्ष 2011 की जनगणना में बायोमीट्रिक तरीके भी इस्तेमाल किए जाएंगे। जनगणना के दौरान हर व्यक्ति की सभी अंगुलियों के निशान भी लिए जाएंगे। आंख के स्कैन का विकल्प भी खुला है। नीलेकणि ने कहा, इस योजना के लिए कई हजार करोड़ रुपये की जरूरत होगी। लेकिन, रकम कहां से आएगी यह अभी तक तय नहीं हुआ है। उन्होंने उन खबरों का खंडन किया कि इस प्रोजेक्ट पर करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। यूआईडी का मुख्य मकसद गरीब और हाशिए पर चले गए लोगों तक सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ पहुंचाना है। पहचान के अभाव में ऐसे लोग सरकारी कार्यक्रमों का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं।

बिजली विभाग की मेहरबानी-दीपावली पर गुलजार रहेगा हरियाणा


दीपावली पर हरियाणा का चप्पा-चप्पा पूरी तरह से गुलजार रहने वाला है। बिजली विभाग ने कुछ ऐसी ही व्यवस्था की है। आज पूरे राज्य में थोड़ी देर के लिए भी बिजली कट नहीं लगेगा। बिजली विभाग ने पावर एक्सचेंज दिल्ली और तीन प्रमुख प्राइवेट कंपनियों से बिजली खरीदकर अपने पास स्टोर कर ली है, ताकि हरियाणा के लोगों की दीपावली पूरी तरह से जगमगा सके। उत्तर हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम (सिस्टम आपरेशन) के महाप्रबंधक नवीन जैन ने दावा किया है कि दीपावली के दिन चूंकि राज्य भर में औद्योगिक संस्थान बंद रहेंगे और उनमें उत्पादन नहीं होगा, इसलिए वहां से बचने वाली बिजली भी लोगों में वितरित कर दी जाएगी। उनके अनुसार दीपावली पर उपभोक्ताओं को सुबह के समय 200 मेगावाट, दोपहर के समय 225 मेगावाट और रात के समय 500 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की जरूरत पड़ेगी। इस बिजली का पूरा बंदोबस्त कर लिया गया है। उत्तर हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम को शुक्रवार तक 1567 मेगावाट और दक्षिण हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम को 1631 मेगावाट बिजली का अलाटमेंट हुआ है। इन दोनों निगमों की सप्लाई 1730 और 1956 मेगावाट की रही है। राज्य में बिजली उत्पादन करीब दो हजार मेगावाट है और चार सौ मेगावाट बिजली एनटीपीसी से ली रही है। लोगों की जरूरत को पूरा करने के लिए बाकी बिजली का इंतजाम प्राइवेट संस्थानों से किया गया है। महाप्रबंधक नवीन जैन के अनुसार छोटी दीपावली पर भी करीब 200 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की खपत हुई है, जिसका बंदोबस्त कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि दीपावली पर निर्बाध रूप से विद्युत आपूर्ति के लिए पावर एक्सचेंज दिल्ली, एनटीपीसी, टाटा और जीएमआर कंपनियों से बिजली खरीदी गई है। उन्होंने दावा किया कि दीपावली के त्यौहार पर पूरे राज्य में कहीं कोई कट नहीं लगेगा। इस बारे में सभी अधीक्षण अभियंताओं को निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि दीपावली पर शाम के समय बिजली की अधिक खपत संभव है।

सोच समझकर चलाएं पटाखे, हो सकती है सजा


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : दीपावली के त्यौहार के मद्देनजर राज्य में पटाखे चलाने का समय निर्धारित किया गया है। शाम छह बजे से रात दस बजे के बीच आप और आपके परिवार के सदस्य आतिशबाजी कर सकते हैं। इस समय अवधि के बाद यदि आपने पटाखे चलाए तो शिकायत होने पर पांच साल की सजा और एक लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आतिशबाजी से नुकसान के मद्देनजर यह गाइड लाइन तैयार की है। बोर्ड अधिकारियों का मानना है कि आतिशबाजी से न केवल ब्रांकाइटिस और अस्थमा की बीमारियां फैलेंगी, बल्कि ध्वनि और वायु प्रदूषण भी बढ़ेगा। दीपावली के दिन पूरे राज्य में छह से दस गुणा तक प्रदूषण फैलने की आशंका जाहिर करते हुए बोर्ड अधिकारियों ने कहा है कि आतिशबाजी चलाने में बरती जाने वाली सावधानी से लोगों को ही लाभ मिलेगा। अस्पताल, शिक्षण संस्थान, अदालतें और धर्म स्थानों के करीब सौ मीटर के दायरे में आतिशबाजी चलाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रवक्ता ने बताया कि बेहतर यही होगा कि दीपावली के त्यौहार की खुशियां मिलजुलकर बांटी जाए। यदि लोग आतिशबाजी करना भी चाहते हैं तो रात दस बजे के बाद इससे बचें। दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने आतिशबाजी के दौरान लगने वाली चोटों के मद्देनजर प्रत्येक जिले के सरकारी अस्पताल में बर्न वार्ड स्थापित किए हैं। प्रत्येक बर्न वार्ड में नेत्र विश्ेषज्ञ समेत चिकित्सकों की पूरी टीम उपलब्ध रहेगी। इस बारे में जिला सिविल सर्जनों को व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। उनसे दीपावली के दिन मिठाई की दुकानों की नियमित चेकिंग करने को भी कहा गया है। स्वास्थ्य विभाग को आशंका है कि दीपावली के दिन नकली दूध, खोया, मावा और नकली घी की बिक्री हो सकती है, जो कि लोगों के स्वास्थ्य के लिए घातक है। सिविल सर्जनों को निर्देश दिए गए हैं कि वह टीम बनाकर मिठाई की दुकानों पर छापामारी करें और यदि कोई दुकानदार लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले उत्पाद बेचता पाया जाता है तो उसके विरुद्ध चालान काटकर कड़ी से कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाए। प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा और राज्यपाल जगन्नाथ पहाडि़या ने राज्य के लोगों को दीपावली की शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने लोगों से प्रदूषण रहित दीपावली मनाने का आग्रह किया और कामना जाहिर की है कि यह दीपावली प्रदेश में अमन, शांति, सुख और समृद्धि लेकर आए। इनेलो प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल, हजकां सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कृष्णपाल गुर्जर और बसपा के राष्ट्रीय महासचिव मान सिंह मनहेड़ा ने भी राज्यवासियों को दीपावली की शुभकामनाएं देते हुए यह त्यौहार मिलजुलकर मनाने का आह्वान किया है।

दिवाली ने दूर की मंदी की अमावस


नई दिल्ली : इस बार दिवाली बहुत कुछ बदल रही है। अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल रही है, उपभोक्ता बाजार के हालात बदल रही है, इस बाजार से जुड़ी कंपनियों की सेहत सुधार रही है। सबसे अहम, नई नौकरियों के रास्ते खोल रही है। इससे निवेशकों के सामने निवेश के नए मौके आ रहे हैं। जुलाई 2009 से शुरू हुई दूसरी तिमाही अर्थव्यवस्था के लिए सुधार के संकेत लेकर आई। पिछले साल शुरू हुई मंदी में कमर तुड़वा बैठी कंज्यूमर ड्यूरेबल कंपनियों की सेहत फिर से सुधरने लगी है। उस पर त्योहारों के इस मौसम ने ऐसी मेहरबानी की कि इस क्षेत्र की कंपनियों की बिक्री में त्योहारों के दौरान औसतन 35-40 फीसदी की वृद्धि होने की खबर है। पछले 45 दिनो में सैमसंग की टीवी की बिक्री में 100 फीसदी, फ्लैट टीवी की बिक्री में दो सौ फीसदी, वाशिंग मशीन की बिक्री में 60 फीसदी, फ्रिज की बिक्री में 80 फीसदी की वृद्धि हुई है। एलजी के उत्पादों की बिक्री भी आम महीनों की तुलना में दोगुनी हो गई है। अर्थव्यवस्था में सुधार का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की सबसे बड़ी संगठित रिटेल कंपनी फ्यूचर ने एक दिन में 75 करोड़ रुपये के केवल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की बिक्री की है। मौजूदा हफ्ते के दौरान कंपनी ने 500 करोड़ रुपये के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की बिक्री का लक्ष्य रखा है। आम तौर पर इतनी बिक्री कंपनी एक महीने में करती है। तकरीबन यही हाल ऑटो क्षेत्र का भी है। एक अक्टूबर, 2009 के बाद के पहले 15 दिनों के दौरान ही मारुति और हुंडई ने इतनी कारों की बिक्री की है जो पिछले वर्ष के दौरान पूरे त्योहारी सीजन की बिक्री से ज्यादा है। दोनों कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने जागरण को बताया कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि आने वाले कुछ महीनों तक रिकार्ड बिक्री का यह सिलसिला जारी रहेगा। हालांकि अर्थव्यवस्था में हो रहे सुधार ने आम आदमी के लिए बचत के रास्ते भी सीमित किए हैं। महंगाई की दर बढ़ने के साथ-साथ ब्याज दरों में बढ़ोतरी आशंका भी बढ़ती जा रही है। बैंकों ने डिपॉजिट पर ब्याज दरें घटाने की शुरुआत भी कर दी है। ऐसे में बचत के लिए लोगों के सामने अब दूसरे विकल्पों को अपनाना होगा। पिछले कुछ महीनों से होम लोन देने में आनाकानी कर रहे निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंकों (आईसीआईसीआई और एचडीएफसी) ने भी अपने दिल उदार कर लिए हंै।

चिडि़या उड़ाना-मवेशी हांकना भी रोजगार की गारंटी


नई दिल्ली( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- अगर आप चिडि़या उड़ाना और मवेशी हांकना जानते हैं तो आपको रोजगार की गारंटी मिल सकती है। सरकार इन कामों को भी नरेगा में शामिल करने की तैयारी में है। सरकार का मानना है कि इससे जहां खेतों को चिडि़यों के चुगने से बचाया जा सकता है, वहीं वन्य जीवों की सुरक्षा भी हो सकेगी। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) में कुछ और कार्यो को शामिल किये जाने की मांग को देखते हुए इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। यह जानकारी केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री सीपी. जोशी ने दैनिकजागरण से बातचीत में दी। उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और असम ने इस तरह के प्रस्ताव भेजे हैं। पहाड़ और सघन जंगलों के आसपास की खेती को वन्य जीवों से नुकसान पहुंचता है जबकि कृषि की क्षति रोकने के लिए कुछ जगहों पर जिस तरह के उपाय किये गये हैं, उनसे भी वन्य जीवों की क्षति हो रही है। असम में जंगली हाथियों से खेती को नुकसान पहुंच रहा है, जबकि हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जंगली जानवरों और चिडि़यों से। खेती को बचाने और छोटे-छोटे खेतों में खड़ी फसल की सुरक्षा के लिए मजदूरों की नियुक्ति करनी पड़ती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों से नील गायों की हत्या करने की अनुमति मांगी गई है, पर सांप्रदायिक संवेदनशीलता के मद्देनजर ऐसा करना संभव नहीं हो पा रहा है। इन राज्यों में खेती को बचाने के लिए नरेगा की मदद भी नहीं मांगी गई है।

गांवों के लिए अलग मेडिकल कालेज

नई दिल्ली- केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि गांवों में डाक्टरों की कमी को दूर करने के लिए सरकार जल्दी ही मेडिकल शिक्षा का वैकल्पिक माडल लागू करने वाली है। इससे गांवों से ज्यादा डाक्टर तैयार हो सकेंगे और ये उसी इलाके की सेवा भी कर सकेंगे। आजाद के मुताबिक मौजूदा व्यवस्था के साथ ही एक वैकल्पिक मेडिकल शिक्षा व्यवस्था भी शुरू की जा रही है। इसके तहत दस हजार से कम आबादी वाले गांवों के छात्रों को ही दाखिला दिया जाएगा। इस समानांतर व्यवस्था की वजह से गांव के छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा ज्यादा सुलभ हो जाएगी। मगर इनके लिए शर्त सिर्फ यह रहेगी कि एक नियत समय तक उन्हें गांवों में ही रह कर प्रैक्टिस करनी होगी। मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया (एमसीआई) इसके लिए प्रस्ताव तैयार कर चुका है। जल्दी ही इसे लागू किया जाएगा। आजाद ने कहा कि इस तरह शहरों और गांवों के बीच की खाई पाटी जा सकेगी। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी मेडिकल शिक्षा की क्वालिटी से समझौता नहीं किया जाएगा। सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के लिए निजी क्षेत्र का पूरा सहयोग लेने की कोशिश कर रही है। कंपनियों को मेडिकल कालेज खोलने की इजाजत देने और नए मेडिकल कालेज खोलने के नियमों में दी गई ढिलाई के बाद अब कुछ वर्षो के अंदर ही देश में मेडिकल पेशेवरों की कमी दूर हो जाएगी। आजाद व‌र्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन की आम सभा में बोल रहे थे। इस मौके पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने डाक्टरों से कहा कि मरीज आपकी ओर बेहद उम्मीद से आता है इसलिए उसकी अपेक्षा पर खरा उतरना चाहिए। डाक्टर का सबसे पहला ध्येय मरीज की भलाई होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने देश में चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसी खोज की जानी चाहिए जिससे इलाज सस्ता हो सके। इस लिहाज से वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का भी सहयोग अहम हो सकता है।

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