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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

जिला औषधि निरीक्षक ने छापा मार कर भारी मात्रा में नशीली दवाईयां बरामद की

डबवाली- जिला औषधि निरीक्षक रजनीश धानीवाल ने आज मुखबरी के आधार पर पंजाब हरियाणा सीमा पर स्थित दो मेडिकल स्टोरों पर छापा मार कर भारी मात्रा में नशीली दवाईयां बरामद की है। छापे के बाद औषधि निरीक्षक ने नशीली दवाईयां मिलने के बाद अक्श मेडिकल स्टोर को सील कर दिया है। जबकि राजेश मेडिकल स्टोर से भारी मात्रा में नशीली दवाईयां मिलने पर प्रदेश के वरिष्ठ औषधि नियंत्रण अधिकारी को इसकी जानकारी देते हुए मेडिकल स्टोर का लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश की है। जिला औषधि निरीक्षक के साथ इस बार सीआईए प्रभारी हवा सिंह तथा गोल बाजार चौकी के प्रभारी कृष्ण लाल मौजूद थे
औषधि निरीक्षक रजनीश धानीवाल ने बताया कि हरियाणा पंजाब की सीमा पर नशीली दवाईयां बिकने की सूचना मिलने पर उन्होंने आज पुलिस अधिकारियों की टीम के साथ रेलवे फाटक के पास स्थित अक्श मेडिकल स्टोर और राजेश मेडिकल स्टोर पर छापा मारा। छापे की दौरान छानबीन करने पर दोनों मेडिकल स्टोर से भारी मात्रा में नशीली दवाईयां मिली है जिनमें कुछ प्रतिबंधित भी है। उन्होंने बताया कि राजेश मेडिकल की दुकान के पीछे रेक्सोडेक्स सिरप की भारी मात्रा में प्रयोग की जा चुकी खाली शीशियां मिली। दोनों मेडिकल हाल संचालक बरामद की गई दवाईयों का क्रय विक्रय का विवरण मौके पर उपलब्ध नहीं करवा सके। उन्होंने चेतावनी दी है कि नशीली दवाईयों के कारोबार में लगे लोगों को बक्शा नहीं जायेगा।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

स्वाइन फ्लू के रोगी राहुल की डॉ. रीटा गुप्ता ने की जांच

डबवाली- विगत दिनों निकटवर्ती पंजाब क्षेत्र मंडी किलियांवाली में स्वाइन फ्लू का रोगी पाये जाने से हड़कंप मच गया था तथा शहर में स्वाइन फ्लू का रोगी होने की आशंका से शहरवासी भयभीत थे। स्थानीय सिविल हस्पताल में आए उक्त स्वाइन फ्लू रोगी को उपचार के लिए पीजीआई रोहतक रेफर किया गया था। पीजीआई रोहतक में उपचाराधीन राहुल के रक्त के कई नमूने जांच के लिए गए हैं तथा उसकी हालत में आए सुधार के मद्देनज़र उसे डिस्चार्ज कर दिया गया है। आज अपने घर पहुंचने पर उसे अलग कक्ष में रखा गया। राहुल के घर आ जाने की सूचना उपरान्त आज पंजाब स्वास्थ्य विभाग की टीम लंबी सिविल अस्पताल की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रीटा गुप्ता के नेतृत्व में राहुल के घर पहुंची तथा उसकी जांच की। डॉ. रीटा गुप्ता ने अभिभावकों से कहा कि जब भी वह राहुल के कक्ष में जाऐं अपने मुंह पर मास्क लगाकर ही जाऐं तथा खाने - पीने से पहले तथा बाद में हाथों को साबुन से अच्छी तरह साफ कर लें। खांसी आने पर अथवा छींकने से पहले मुंह को साफ रूमाल से अच्छी तरह से ढक लें तथा किसी भी तरह के फ्लू होने पर स्वयं दवाई लेने की बजाय विशेषज्ञ डाक्टर से ही संपर्क कर दवाई लें। उन्होंने कहा कि रोगी के सीधे संपर्क में न आए तथा उससे हाथ मिलाने से भी परहेज करना चाहिए।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

डबवाली में स्वाईन फ्लू का रोगी पाये जाने से हड़कंप,शहरवासी भयभीत

डबवाली-डबवाली में स्वाईन फ्लू का रोगी पाये जाने से हड़कंप मच गया है तथा शहर में स्वाईन फ्लू का रोगी मिलने से शहरवासी भयभीत है। स्वाईन फ्लू रोगी को उपचार के लिए पीजीआई रोहतक में रेफर किया गया है। सिविल अस्पताल प्रशासन ने ऐहतियाद के तौर पर रोगी के सात परिजनों को स्वाईन फ्लू प्रतिरोधक दवाई खाने को दे दी है। रोगी की पहचान राहुल पुत्र राजेंद्र कुमार निवासी किलियांवाली के रूप में हुई है। राहुल राजस्थान के कोटा शहर में आईटीआई की कोचिंग लेने के लिए गया हुआ था और वहां पर एक भवन में अपने कुछ साथियों के साथ बतौर पीजी रहता था। पिछले कुछ दिनों में उसे तथा उसके सहपाठियों को खांसी बुखार और शरीर में अकडऩ की शिकायत चल रही थी। राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग ने जांच के लिए बीमार बच्चों के रक्त के नमूने दो दिन पहले लिए थे। इसी बीच बच्चे की बिगड़ती हालत को देखते हुए उसके परिजन उपचार के लिए यहां ले आये। आज प्रात: राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग ने राहुल के परिजनों को दूरभाष पर उसे स्वाईन फ्लू होने की पुष्टी की। उन्होंने बताया कि राहुल के कुछ अन्य साथियों में भी एन1, एच1 का टेस्ट पोस्टिव पाया गया है। स्वाईन फ्लू होने की जानकारी मिलते ही राहुल के परिजनों में उसके स्वास्थ्य की चिंता गहरा गई और उसे उपचार के लिए डबवाली के सिविल अस्पताल में लाया गया। जहां चिकित्सकों ने उसे बेहतर उपचार के लिए पीजीआई रोहतक रेफर कर दिया है। उच्चाधिकारियों को सूचित किया - सिविल अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एमके भादू ने बताया कि स्वाईन फ्लू का रोगी पाये जाने के बाद आला अधिकारियों को इसकी सूचना देने के साथ ही रोगी को उपचार के लिए रोहतक मेडिकल कालेज में रेफर किया गया है। उन्होंने बताया कि ऐहतियाद के तौर पर रोगी के सात परिजनों माता, पिता, भाई, बहन और दादा दादी को स्वाईन फ्लू प्रतिरोधक टेमीफ्लू की गोलियां दे दी गई है। पंजाब का स्वास्थ्य विभाग भी हुआ सक्रिय-मंडी किलियांवाली में स्वाईन फ्लू का रोगी मिलने के बाद पंजाब का स्वास्थ्य विभाग भी सक्रिय हो गया है। लंबी सिविल अस्पताल की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रीटा गुप्ता ने बताया कि रोगी की पुष्टी होने के बाद विभाग के आला अधिकारियों को इसकी सूचना देने के अलावा चिकित्सकों की एक टीम गठित कर दी गई है। जो रोगी के परिजनों के अलावा उनके पड़ोसियों की भी जांच करेगी और जनता को एन1, एच1 से बचाव व उसके लक्षणों के बारे में जागरूक करेगी। लक्षण - स्वाईन फ्लू एक संक्रामक बीमारी है। यह रोगी के सम्पर्क में आने के बाद तेजी से फैलती है। इसके लक्षणों में रोगी को तेज बुखार हो जाता है गला खराब होने के साथ सांस लेने में तकलीफ होने लगती है और रक्त में प्लेटलेट्स की कमी होने के अलावा रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है। सिर दुखना और थकावट के अलावा सर्दी महसूस होने लगती है। इसमें तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है। सावधानियां - खाने पीने से हाथों को साबुन से अच्छी तरह साफ कर ले। खांसने-छींकने से पहले मुंह को साफ कपड़े से अच्छी तरह से ढक ले तथा किसी भी तरह के फ्लू होने पर स्वयं दवाई लेने की बजाय विशेषज्ञ डाक्टर से संपर्क करें। रोगी सीधे संपर्क में न आए तथा उन्हें हाथ मिलाने से परहेज करना चाहिए।

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

जिला औषधि नियन्त्रण अधिकारी ने एक मैडीकल की दुकान पर छापामारी कर भारी मात्रा में नशीली दवाईयां बरामद की

डबवाली-जिला औषधि नियन्त्रण अधिकारी ने मुखबरी के आधार पर आज अपनी पूरी टीम के साथ स्थानीय गोल चौंक के समीप स्थित एक मैडीकल की दुकान पर छापामारी कर भारी मात्रा में नशीली दवाईयां बरामद की। जिसमें भिन्न-भिन्न कम्पनियों द्वारा निॢमत 18 प्रकार की नशीली दवाऐं शामिल हैं। प्राप्त जानकारी अनुसार स्थानीय गोल चौंक के समीप स्थित नील मेडीकोज पर आज जिला औषधि नियन्त्रण अधिकारी रजनीश धानीवाल ने छापामारी कर मोमोलिट, फिनोलिट, माईक्रोलिट, क्लोरोडायसापॉम, लोराजीपॉम, रोक्स-एफ, प्रॉक्सीवान, हाईप्लोरैक्स सहित अन्य दवाईयां भारी मात्रा में बरामद की हैं। जिला नियन्त्रण अधिकारी रजनीश धानीवाल ने बताया कि यह मैडीकोज शॉप इससे पूर्व दीपक मैडीकोज के नाम से थी। पिछले वर्ष इस मैडीकल शॉप पर छापामरी के दौरान भारी मात्रा में नशीली दवाईयां बरामद होने पर इसका लाईसैंस रद्द कर दिया गया था। लेकिन अब इसने नील मैडीकोज के नाम से लाईसैंस लेकर मैडीकोज चला रहा था और धड़ल्ले से नशे का व्यापार कर रहा था। सूचना मिलने पर मैडीकल ऐसोसिऐशन के जिला प्रधान दर्शन सोनी उक्त मैडीकल पर पहुंचे। उन्होंने बताया कि इस मैडीकल के संचालक दीपक कुमार को नशे की दवाईयां बेचने पर कई बार चेतावनी दी गई थी। मैडीकल ऐसोसिऐशन नशा बेचने वाले दुकानदारों का साथ नहीं देगी। इस दौरान जिला औषधि नियन्त्रण रजनीश धानीवाल ने नशे के लिए प्रयोग होने वाली सभी दवाईयों के सैम्पल लिए हैं तथा मैडीकल शॉप पर प्रोप्राईटर नीशु बाला व फार्मासिस्ट नीरज कुमार पुत्र देस राज के न होने पर दुकान बन्द करवा दी है।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

चर्मरोग जांच शिविर में 280 रोगियों की हुई जांच

डबवाली-स्थानीय लायंस कल्ब सुप्रीम के तत्वाधान में तनसुख दास बिहारी लाल धर्मशाला में एक दिवसीय चर्मरोग जांच शिविर आयोजित किया गया। प्रात: साढ़े 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक चले इस शिविर में चर्मरोग विशेषज्ञ डॉ. सीमा गुप्ता ने 280 रोगियों की जांच की तथा उन्हें दवाई दी। यह जानकारी देते हुए कल्ब प्रवक्ता ने बताया कि उक्त शिविर में महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय, राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय तथा आर्य विद्या मन्दिर हाई स्कूल के विद्याॢथयों का भी चैकअप किया गया। उन्होंने बताया कि इस अवसर पर श्रीमति गिरधारी लाल गुप्ता, श्रीमति ज्योति बागला, श्रीमति आशा गर्ग, एमएल ग्रोवर, भूपिन्द्र पाहूजा, सुधा कामरा, बीएस अरोड़ा, पुनीत गर्ग, संजय कटारिया, राकेश वधवा, गुरदीप कामरा, सिम्पा जैन, अनु कटारिया, किरण अरोड़ा, सुमन कामरा, राज कुमार मिढा, सुरिन्द्र चावला, राजेन्द्र छाबड़ा आदि मौजूद थे। शिविर के दौरान पवन कुमार ने दवाईयों के वितरण में पूरा सहयोग किया।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

एन्टीवॉयरल, डेंगू, मलेरिया व स्वायन फ्लू रोधक वण्डर डोज का दो दिवसीय शिविर 11 व12 अगस्त को

डबवाली-जिला सिरसा के क्षेत्र में आई प्राकृतिक आपदा बाढ़ से पैदा हुई विकट परिस्थितियों के चलते बीमारियों के फैलने का अन्देशा बढ़ गया है तथा चौमासा ऋतु के आरम्भ होते ही शुरू होने वाली बरसात के कारण मनुष्य के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होने के कारण रोगों का हमला तेज हो जाता है। इन बीमारियों से बचाव के लिए दो दिवसीय नि:शुल्क शिविर 11 अगस्त बुधवार तथा 12 अगस्त वीरवार को प्रात: 11 बजे से सायं 5 बजे तक स्थानीय बठिण्डा रोड़ स्थित पाल होम्यो होस्पिटल व रिसर्च सैंटर पर लगाया जाऐगा। जिसमें एन्टीवॉयरल, डेंगू, मलेरिया व स्वायन फ्लू रोधक वण्डर डोज पिलाई जाऐगी। यह जानकारी देते हुए रिसर्च सैंटर के संचालक डॉ. श्रीमति राजिन्द्र कौर व डॉ. सुखपाल सिंह ने बताया कि इस चम्त्कारिक दवा को जर्मन को-हैबीटेशन मैथेड द्वारा तैयार किया जाता है। जो मानव संसाधन एवं स्वास्थ्य मन्त्रालय भारत सरकार द्वारा खोज व प्रसार के लिए प्रमाणित है तथा पिछले तीन वर्षों के दौरान लगभग 25 हजार लोगों पर इस दवा का परीक्षण किया जा चुका है। जिसके काफी अच्छे परिणाम सामने आए हैं।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

स्कूल के मुख्य द्वार पर सीवरेज का गन्दा पानी जमा,राहगीरों को भारी धिककत

डबवाली -पिछले दो सप्ताह से स्थानीय बाल मन्दिर मॉडल सीनियर सैकेण्डरी स्कूल के मुख्य द्वार पर सीवरेज का गन्दा पानी जमा है तथा स्कूल आने वाले छात्र-छात्राओं के साथ-साथ स्कूल स्टॉफ तथा वहां से गुजरने वाले राहगीरों को भारी धिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। स्कूल प्रबन्ध समिति के सचिव अरूण जिन्दल ने बताया कि स्कूल प्रिंसीपल एसएम देवगण द्वारा जन स्वास्थ्य विभाग पंजाब तथा हरियाणा को इस समस्या के बारे मौखिक तथा लिखित तौर पर कई बार अवगत करवाया जा चुका है परन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात ही रहा। उन्होंने बताया कि इसके अलावा उपायुक्त महोदय मुक्तसर, उपायुक्त महोदस सिरसा तथा स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को भी लिखा है। ताकि समस्या का समाधान हो सके। उन्होंने बताया कि अब आलम यह है कि सीवरेज चॉक होने के चलते गन्दा पानी ओवरफ्लो होकर साथ लगते वाटर वक्र्स की डिग्गियों में जा रहा है। जहां से शहर के तमाम घरों में पेयजल की सप्लाई होती है तथा को जमा हुए काफी दिन हो चुके हैं तथा अब जमा पानी में मच्छर भी पनपने लगे हैं। जिससे विद्याथयों में बीमारी फैलने का खत्तरा बढ़ गया। श्री जिन्दल ने सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों से मांग की है कि जल्द से जल्द पानी की निकासी करवाऐं ताकि फैलने वाली भयंकर बीमारियों से बचा जा सके।

21 जुलाई को नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर

डबवाली-स्थानीय चौटाला रोड़ स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा द्वारा स्थानीय तनसुख दास बिहारी लाल धर्मशाला में आगामी 21 जुलाई को प्रात: 9 से 11 बजे तक नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर लगाया जा रहा है। जिसमें जरूरतमंदों को स्थानीय बैंक शाखा की ओर से जांच के पश्चात दवाईयां नि:शुल्क वितरित की जाऐंगी। यह जानकारी देते हुए शाखा प्रबन्धक बीएस सरपाल ने बताया कि उक्त जांच शिविर में बैंक के मेडीकल अधिकारी डॉ. प्रेम ग्रोवर आयुर्वेदाचार्य रोगियों की जांच करेंगे। इस अवसर पर वैद्य रामकुमार भी उनके साथ रहेंगे तथा बैंक स्टॉफ का पूरा योगदान रहेगा।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

आँखों के आप्रेशन, दांतों के निरीक्षण, ब्लड शूूगर एवं ई.सी.जी. जांच का नि:शुल्क कैम्प आयोजित

सिरसा12 जुलाई- गत दिवस मानव सेवा को समर्पित सिरसा की प्रमुख समाज सेवी संस्था श्री हनुमंत फाउंडेशन द्वारा नेहरू पार्क स्थित श्री हनुमंत चैरिटेबल हस्तपाल द्वारा आर.के.पी. नेहरू पार्क स्कूल में 136वां नेत्र जांच व आप्रेशन, दांतों के निरीक्षण, ब्लड शूगर एवं ई.सी.जी. जांच का नि:शुल्क शिविर आयोजित किया गया। इस सम्बन्ध में फाउडेशन के महासचिव डॉ. आर.के. गुप्ता ने बताया कि इस शिविर का शुभारम्भ मंत्रोच्चारण विधि से श्री हनुमान जी की ज्योति प्रज्जवलित करके किया गया। श्री हनुमंत फाउंडेशन सिरसा की एकमात्र ऐसी संस्था है जो नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवाएं देने मे अग्रणी भूमिका निभा रही है तथा प्रचार में कम एवं समाज सेवा में ज्यादा विश्वास रखती है।
इस शिविर में नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीन अरोड़ा, डॉ. सीमा पूनियां व उनके स्टाफ द्वारा 300 मरीजों के नेत्र जांच व दंत चिकित्सक डॉ. पुनीत रूस्तगी, बी.डी.एस. द्वारा दांतों की जांच की गई व सामान्य रोगियों की जांच डॉ. आर.के. गुप्ता द्वारा की गई। शिविर के दौरान आप्रेशन हेतु 16 रोगियों का चयन किया गया जिनके आप्रेशन दूरबीन विधि द्वारा डॉ. प्रवीन आई हस्पताल एवं डॉ. सीमा पूनियां द्वारा नि:शुल्क किए जाएंगे। शिविर में आने वाले सभी रोगियों को 5 दिन की दवाईयां भी नि:शुल्क दी गई।
इस शिविर के सफल आयोजन में के.एल. सहगल, सुधीर अरोड़ा, ओमप्रकाश, डॉ. आर.के. गुप्ता, सुरेश सतनालीवाला, केवल कृष्ण कमल, नंद किशोर चुघ, राकेश कुमार, वेदप्रकाश गाबा व फाउंडेशन के कर्मचारियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। फाउंडेशन द्वारा आगामी 137 वां दिनाक 8 अगस्त को लगाया जाएगा।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

सिविल अस्पताल में फैली अव्यवस्था को लेकर ग्रामीण भडके

डबवाली-चौटाला गांव में एक ही परिवार के 6 जनों की मौत की लोमहर्षक घटना के बाद वहां के सिविल अस्पताल में फैली अव्यवस्था को लेकर ग्रामीण भड़क गये। उन्होंने अस्पताल में से चिकित्सकों को बाहर निकाल कर अस्पताल के गेट को बंद कर दिया और वहां पर धरना लगा कर बैठ गये। चार घंटे बाद मौके पर पहुंचे डबवाली के तहसीलदार राजेंद्र कुमार और डिप्टी सीएमओं डा. गौर शंकर सोमानी ने लोगों की शिकायतें सुनने के बाद उचित कार्यवाही किये जाने का आश्वासन दे कर लोगों को शांत किया और अस्पताल खुलवाया। पूर्व विधायक डा. सीता राम ने आरोप लगाया कि चौटाला गांव का सिविल अस्पताल रैफर अस्पताल बन गया है। यहां पर फैली अव्यवस्था के कारण अस्पताल कम और कबूतर खाना ज्यादा बन गया है। ग्रामीणों को छोटे से छोटे उपचार के लिए डबवाली या संगरिया के निजी चिकित्सकों के पास जाना पड़ता है। कुछ कर्मचारी अस्पताल में हाजरी लगा कर घरों को लौट जाते है। आपात सेवाओं का भी बूरा हाल है। उन्होंने बताया कि जब हादसे के शिकार इस परिवार को सिविल अस्पताल में लाया गया तो एक स्टाफ नर्स ही मौजूद थी बाद में बुलाये जाने पर चिकित्सक ओम प्रकाश ने आ कर इनका उपचार आरंभ किया इसके बाद एक अन्य चिकित्सक कुलविंद्र कौर वहां पर पहुंची। गांव के पीला राशन कार्ड धारक लाल चंद ने सिविल अस्पताल में तैनात चिकित्सक कुलविंद्र कौर पर उसका उपचार न करने का आरोप लगाया। डिप्टी सीएमओं डॉ. गौरी शंकर तथा तहसीलदार राजेंद्र सिंह ने जब सिविल अस्पताल का निरीक्षण किया तो अस्पताल की लैब में रखे गये फ्रिज में सैंपल और अन्य साजो सामान की बजाय खाना रखा गया मिला है और यही हाल अन्य परिसरों में था। बेड टूटे हुए और दागदार बेडशीट और भवन के अंदर ही जमा र्इंटों और रेत के ढेर वहां की कारगुजारियों की पोल खोल रहे थे। का. प्रहलाद राय भारू खेड़ा और भाला राम भारू खेड़ा ने आरोप लगाया कि सरकारी अस्पताल के कर्मचारियों की कार्यप्रणाली जनता के लिए जानलेवा सिद्ध हो रही है। उन्होंने कहा कि अधिकारी वर्ग भी पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा है जिससे जनता त्रासद है। उप जिला चिकित्सा अधिकारी डा.गौरी शंकर ने पूरे मामले की जांच करवाये जाने का आश्वासन देते हुए ड्यूटी पर तैनात चिकित्सकों का चार्ट अस्पताल के नोटिस बोर्ड पर लगाने और अस्पताल परिसर में उपलब्ध दवाईयों का मात्रा का विवरण भी उपलब्ध करवाने के आदेश दिये। उन्होंने कहा कि कार्य में कौताही किसी भी कीमत पर सहन नहीं होगी। वहीं पूर्व विधायक ने तहसीलदार राजेंद्र कुमार से पीडि़त परिवार की आर्थिक सहायता दी जाने की गुजारिश की। बाद में तहसीलदार राजेंद्र कुमार पीडि़त परिवार के घर पर गये और उनके परिजनों को ढांढस बंधवाते हुए हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया।

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

जनता की जेब काट पेट भर रहीं दवा कंपनियां

नई दिल्ली, दवा कंपनियां सरकारी मूल्य नियंत्रण प्रणाली को ठेंगा दिखाकर हर साल ग्राहकों से लगभग दो सौ करोड़ रुपये झटक रही हैं और पकड़े जाने के बावजूद रकम लौटाने में आनाकानी कर रही हैं। यानी, एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी। यह स्थिति तब है जबकि लगभग 94 फीसदी दवाओं की कीमत पर सरकार का कोई काबू नहीं है। अगर सभी जरूरी दवाओं की कीमत पर नियंत्रण हो जाए तो कंपनियों की मुनाफाखोरी का आंकड़ा कई गुना बढ़ जाएगा। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के अध्यक्ष एसएम झारवाल से खास बातचीत में बताते हैं कि विभिन्न दवा कंपनियों को 1998 के बाद से ग्राहकों से दो हजार करोड़ रुपये (यानी, हर साल लगभग दो सौ करोड़ रुपये) की अधिक-वसूली का दोषी पाया गया है। इसके मद्देनजर उन्हें ज्यादा वसूली गई रकम सरकारी खजाने में जमा करने को कहा गया है, लेकिन कंपनियों ने अब तक सिर्फ 180 करोड़ रुपये जमा किए हैं। लगभग 1965 करोड़ रुपये अभी उनसे वसूला जाना बाकी है। सरकार के लिए यह काम आसान नहीं है। गौरतलब है कि साल 1979 में मूल्य नियंत्रण सूची में 342 दवाएं शामिल थीं, लेकिन इसमें अब 74 दवाएं ही शामिल हैं। इसमें 29 दवाएं अब चलन में ही नहीं। यानी यह सूची सिर्फ 45 दवाओं की ही रह गई है। हैरानी की बात तो यह है कि मौजूदा नियमों में जीवनरक्षक दवाओं को परिभाषित ही नहीं किया गया है। यानी जिस दवा के न मिलने से मरीज की जान चली जाती हो, उस पर भी मुनाफाखोरी की कोई सीमा नहीं। इसी तरह जितनी नई दवाएं बाजार में आती हैं, उनकी कीमत पर भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। इस स्थिति को देखते हुए 10 मार्च 2003 को सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को आदेश दे चुका है कि जीवनरक्षक दवाएं जल्द मूल्य नियंत्रण की परिधि में लाई जाएं। इसके बावजूद अब तक ऐसा नहीं हो सका है।

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

सेहत के सरताजों की सेहत का राज

दूसरों की जिंदगी और सेहत की हिफाजत का दारोमदार जिन कंधों पर है, उन्हें इतनी मजबूती कैसे मिलती है कि व्
इतनी बड़ी जिम्मेदारी को बखूबी निभा सकें, यह सवाल सभी के जेहन में कभी-न-कभी कौंधता होगा। लगातार काम के बीच खुद को अपडेट रखने के अलावा दूसरों की जान बचाने का प्रेशर होता है डॉक्टरों पर। ऐसे में वे खुद को फिट कैसे रखते हैं, यह जानना दिलचस्प और फायदेमंद हो सकता है। प्रियंका सिंह ने टॉप डॉक्टरों से बात करके जाना उनकी फिटनेस का फंडा :

डॉ. नरेश त्रेहन,
चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, मेडांटा, द मेडिसिटी
उम्र : 63 साल, वजन : 72 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6:15 से 6:30 बजे तक उठने के साथ दिन शुरू होता है, जो रात 11:30 बजे बिस्तर पर जाने पर खत्म होता है। हफ्ते में पांच दिन सुबह 45 मिनट एक्सर्साइज और तीन दिन 45 मिनट योग करता हूं। लोदी गार्डन में घूमने चला जाता हूं या फिर घर में ही ट्रैडमिल पर चलता हूं। वॉक हमेशा तेज करता हूं। हल्के वेट भी उठाता हूं। वॉक, वर्कआउट और योग, इन तीनों का कॉम्बिनेशन बॉडी को पूरी तरह फिट रखता है। सुबह 8:30 बजे तक हॉस्पिटल पहुंच जाता हूं और आमतौर पर वहां से रात 8:30-9:00 बजे निकलना होता है। शाम को घर लौटते हुए कार में ही 15-20 मिनट मेडिटेशन (विपश्यना) भी करता हूं। इससे दिन भर की दिमागी थकान गायब हो जाती है।

डाइट: सुबह नाश्ते में एक अंडे का सफेद हिस्सा या अंकुरित दालें और पांच-छह बादाम, एक अखरोट और एक कप चाय लेता हूं। दिन में 11 बजे सलाद और लंच में एक रोटी, हरी सब्जी और दही खाता हूं। शाम को 5-6 बजे एक कप चाय या कॉफी के साथ एक बिस्कुट और रात में 8:30 तक डिनर लेता हूं, जिसमें एक चपाती, सलाद या चिकन होता है। खाने में ज्यादा-से-ज्यादा फल और हरी सब्जियां शामिल करने की कोशिश होती है। बाहर के खाने से परहेज करता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन कभी-कभी सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।

रिलैक्सेशन: सूफी संगीत सुनकर और किताबें पढ़कर मन को रिलैक्स करता हूं।

जीवन का मंत्र: ऐसी जिंदगी जिएं, जिसमें गैरकानूनी और गलत कामों के लिए कोई जगह न हो। नेगेटिव होने से बचें। ऐसा होने से दूसरों से भी ज्यादा नुकसान खुद उस शख्स का होता है। संतोष रखना सबसे जरूरी है, क्योंकि हमें यह देखना चाहिए कि न जाने कितने लोग हमसे बहुत खराब जिंदगी जी रहे हैं।


डॉ. अशोक सेठ
चेयरमैन, कार्डिएक साइंसेज, एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट
उम्र : 54 साल, वजन : 74 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6:30 बजे उठने के बाद एक कप चाय पीता हूं। 45 मिनट ट्रैडमिल (जिसमें साइकलिंग भी शामिल होती है) और 15 मिनट वेट उठाता हूं। हफ्ते में 5-6 दिन एक्सर्साइज जरूर करता हूं। रोजाना पूजा करता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि ईश्वर की कृपा से ही मैं अपने मरीजों के चेहरे पर मुस्कान ला पाता हूं। इसके लिए मैं रोज रात को सोने से पहले भगवान को धन्यवाद देता हूं। सुबह 9:30 बजे हॉस्पिटल पहुंचता हूं और कई बार काम खत्म होते-होते रात में 2 भी बज जाते हैं। औसतन 1-1:30 से पहले सोना मुमकिन नहीं हो पाता।

डाइट: नाश्ता हल्का ही लेता हूं। लंच टाइम फिक्स नहीं है क्योंकि वक्त मिल ही नहीं पाता। दिन में कभी भी अंकुरित चना या दाल ले लेता हूं। डिनर इत्मिनान से लेता हूं, लेकिन यह सादा ही होता है। दो चपाती व दाल खाता हूं। कभी-कभार नॉन-वेज खाता हूं। बहुत मन होता है तो रेस्तरां में जाकर अच्छा खाना भी खा लेता हूं लेकिन तब एक्सर्साइज से फालतू कैलरी जलाना नहीं भूलता। स्मोकिंग से दूर रहता हूं, पर कभी-कभार सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।

रिलैक्सेशन: संगीत सीखता हूं और साल में दो बार स्कूबा डाइविंग पर जाता हूं। कोई भी ऐसा काम जो आपके प्रफेशन से अलग होता है, वह मन को रिलैक्स करता है।

जिंदगी का मंत्र: अपने काम के प्रति समर्पण और फोकस जरूरी है। परिवार का सपोर्ट और भगवान में विश्वास आपको जिंदगी जीने का सही तरीका सिखाता है। वही काम करें, जिससे आपको प्यार हो और जिसे आप एंजॉय करें। इससे आप दिमागी और शारीरिक तौर पर फिट रहेंगे।

डॉ. प्रदीप चौबे
जॉइंट एमडी, मैक्स हेल्थकेयर
उम्र : 57 उम्र, वजन : 81 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 7 बजे उठने के बाद आधा घंटा ट्रैडमिल पर चलता हूं। वक्त मिलता है तो हेल्थ क्लब भी चला जाता हूं। हालांकि कभी-कभी ज्यादा ऑपरेशन होते हैं तो एक्सर्साइज छूट भी जाती है। ऑपरेशन के दौरान ही मेरा प्रैक्टिकल मेडिटेशन हो जाता है क्योंकि जितना कंसंट्रेशन उस दौरान करना होता है, उतना कभी और नहीं होता। सुबह 9 से रात 9 बजे तक हॉस्पिटल में होता हूं। पूजा करता हूं लेकिन इसके लिए मूर्ति के सामने बैठना जरूरी नहीं है। जब भी, जहां भी वक्त मिला, भगवान को याद कर लेता हूं। रात में 12 बजे से पहले सोना नहीं हो पाता।

डाइट: नाश्ते में एक गिलास जूस और फल लेता हूं। हॉस्पिटल में लंच का वक्त नहीं मिलता, लेकिन हर दो घंटे बाद कुछ-न-कुछ खा लेता हूं, जैसे कि सैंडविच, फल, स्प्राउट्स, लो कैलरी बिस्कुट आदि। दिन में पांच-सात बादाम भी लेता हूं। काम के दबाव की वजह से डिनर ही मेरा मुख्य खाना होता है, जिसमें मैं सब्जी, रोटी, दाल, चावल आदि लेता हूं। दही में स्ट्रॉबेरी या कोई और फल डालकर खाना पसंद करता हूं। स्मोकिंग नहीं करता, कभी-कभार अल्कोहल ले लेता हूं।

रिलैक्सेशन: एग्जिबिशन जाकर आर्ट वर्क देखने और उनका कलेक्शन करने से मेरा मन खुश हो जाता है। स्प्रिचुअलिटी से संबंधित अच्छी किताबें भी पढ़ता हूं।

जिंदगी का मंत्र: मेरा मानना है कि अपने प्रफेशन के अलावा दूसरे क्षेत्रों के लोगों से मिले-जुलें। अगर मैं दिन भर की थकान के बाद शाम को किसी डॉक्टर से मिलूंगा तो मेडिसिन की ही बात होगी, इसलिए काम खत्म करते ही नॉन-प्रफेशनल दुनिया में आना पसंद करता हूं। दिमागी शांति के लिए यह जरूरी है।

डॉ. अनूप मिश्रा
हेड ऑफ डायबीटीज एंड मेटाबॉलिम डिपार्टमेंट, फोर्टिस हॉस्पिटल
उम्र : 51 साल, वजन : 73-76 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 5:30 बजे मेरा दिन शुरू होता है। काम के दिनों में 45 मिनट रेग्युलर एक्सर्साइज करता हूं, जबकि संडे और बाकी छुट्टी के दिन एक घंटा पसीना बहाता हूं। रोजाना ट्रैडमिल पर 350-400 कैलरी जरूर जलाता हूं। साथ में 10-12 मिनट हल्के वेट भी उठाता हूं। अगर रात में जल्दी घर आ गया तो फिर से 20-25 मिनट वॉक और जॉगिंग करता हूं। पिछले 15 सालों से मेरा बीएमआई बढ़ा नहीं है। योग के बजाय एरोबिक्स को ज्यादा फायदेमंद मानता हूं। रोजाना पूजा और मेडिटेशन करता हूं।

डाइटः हल्का नाश्ता लेता हूं, जैसे कि दलिया, फल आदि। संडे को लंच अक्सर बाहर करता हूं, लेकिन जिस दिन भी बाहर खाता हूं, एक्सर्साइज ज्यादा करता हूं। लंच में दो चपाती व पनीर प्रेफर करता हूं। सलाद खूब खाता हूं। शाम 6 बजे एक कप कॉफी और रात करीब 9 बजे डिनर में 2-3 चपाती व सब्जी-दाल लेता हूं। स्मोक नहीं करता, कभी-कभी सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।

रिलैक्सेशन: एक वक्त था, जब प्ले खूब करता था। अब हिंदी व इंग्लिश के नॉवेल और रिसर्च पेपर लिखना मन को सुकून देता है।

जिंदगी का मंत्र: अनुशासन बहुत जरूरी है। मैं कितना भी थका होऊं, एक्सर्साइज जरूर करता हूं। सिडनी के ऑपरा हाउस से लेकर पैरिस के आइफिल टावर तक को मैंने जॉगिंग करते हुए ही देखा। यह दुनिया को देखने का मेरा तरीका है। अपने काम को एंजॉय करना भी बेहद जरूरी है। वही काम करें, जो पसंद हो।

डॉ. पी. के. दवे
चेयरमैन, गवर्निंग बॉडी, रॉकलैंड हॉस्पिटल
उम्र : 70 साल, वजन : 62 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 5 बजे उठता हूं। इसके बाद वॉक करता हूं। सर्दियों में बाहर नहीं जा पाता तो घर पर ही वॉक कर लेता हूं। योग भी करता हूं। प्राणायाम और डीप ब्रिदिंग मन को शांत करते हैं। सुबह 8:30 बजे हॉस्पिटल पहुंच जाता हूं। लिफ्ट के बजाय सीढयों से चढ़ना पसंद करता हूं। रात 8 बजे तक काम चलता रहता है। रात में 10-10:30 बजे तक सो जाता हूं। लेकिन लगता है कि काश, मैं बैडमिंटन और टेनिस खेलने के लिए कुछ और वक्त निकाल पाता।

डाइट: नाश्ते में परांठा, ऑमलेट, टोस्ट या दलिया... कुछ भी ले लेता हूं। साथ में कॉफी लेता हूं। लंच हॉस्पिटल में लेता हूं, जिसमें दाल-सब्जी, चपाती व चावल, दही होता है। बाहर का खाना मुझे सूट नहीं करता, इसलिए उससे बचता हूं। नॉन-वेज में कभी-कभी फिश खाता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन ड्रिंक कभी-कभी ले लेता हूं। कम और संतुलित खाना खाने के अलावा खूब पानी पीता हूं।

रिलैक्सेशन: फोटॉग्रफी मन को रिलैक्स करती है। साथ ही, रीडर्स डाइजेस्ट व दूसरी किताबें पढ़कर व इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक सुनकर भी मन हल्का होता है।

जिंदगी का मंत्र: काम में हमेशा प्रफेशनल रहें। मेरा मानना है कि गरीबों से बात करना ईश्वर से बात करने के बराबर ही है। सभी के लिए एक जैसा होना चाहिए इंसान को। हर किसी की, हम वक्त और हमेशा मदद को तैयार रहना चाहिए। किसी से ज्यादा उम्मीदें नहीं लगानी चाहिए। इससे दिमागी सुकून बना रहता है।

शिखा शर्मा
हेल्थ एक्सपर्ट
उम्र : 40 साल, वजन : 55 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 7 बजे उठने के बाद 10 मिनट मेडिटेशन जरूर करती हूं। योग भी करती हूं लेकिन यह कई बार रेग्युलर नहीं हो पाता। हां, रोजाना आधे घंटे वॉक जरूर करती हूं। सुबह करीब 10:30 बजे काम शुरू करती हूं। कभी-कभी एक्यूप्रेशर थेरपी लेती हूं तो स्पा में स्टोन मसाज कराती हूं। ऐसा रिलैक्स होने के साथ-साथ इन कलाओं को समझने और जानने की गरज से भी करती हूं। अच्छी नींद भी मुझे फिट रखती है। वैसे, मैं दौड़ना चाहती हूं, हाफ मैराथन में हिस्सा लेना चाहती हूं लेकिन मलाल है कि मैं ऐसा कर नहीं पाती क्योंकि इसके लिए ट्रेनिंग आदि की जरूरत पड़ती है।

डाइट: नाश्ते में गाजर और टमाटर का जूस लेती हूं। 10 बजे के करीब एक-दो टोस्ट लेती हूं। साथ में फल भी लेती हूं। लंच में सूप और सैंडविच या सब्जी-रोटी लेती हूं। डिनर भी सादा ही होता है, जिसमें सूप, चावल या रोटी होती है। सर्दियों में हमेशा गर्म पानी और गर्मियों में गुनगुना पानी पीती हूं। अदरक या सौंफ का पानी भी नियमित तौर पर लेती हूं। मसालेदार और बाहर का खाना कम ही खाती हूं।

रिलैक्सेशन: जब भी तनाव में होती हूं, खासतौर पर स्प्रिचुअल किताबें पढ़ती हूं। इससे जिंदगी को नए नजरिये से देखने-जानने का भी मौका मिलता है।

जिंदगी का मंत्र: टेंशन से दूर रहती हूं। मैं काम को ही पूजा मानती हूं और वही मुझे तरोताजा भी करता है। मेरा मानना है कि अच्छा काम करना ही पूजा के समान है। ईश्वर से कोई शिकायत नहीं क्योंकि जितना चाहा, जिंदगी ने उससे ज्यादा ही दिया।

डॉ. ए. के. झिंगन
चेयरमैन, दिल्ली डायबीटीज रिसर्च सेंटर
उम्र : 60 साल, वजन : 75 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6 से 6:3 बजे उठकर 45-50 मिनट की वॉक पर जाता हूं। इतनी देर में 5-6 किलोमीटर चलता हूं। वॉक के दौरान गहरी सांस (डीप ब्रिदिंग) लेता हूं। लौटकर 10 मिनट वेट उठाता हूं। इससे अपर बॉडी मसल्स शेप में रहती हैं। रोजाना 15-20 मिनट पूजा करता हूं, ताकि ईश्वर को धन्यवाद दे सकूं। घर से आधा किमी दूर स्थित अपने क्लिनिक तक पैदल ही जाता हूं। 9 बजे तक क्लिनिक पहुंच जाता हूं। रात में 11:30 बजे तक सो जाता हूं। मुझे लगता है कि अगर मैं योग क्लास जॉइन कर पाता तो मेरी सेहत के लिए और अच्छा होता।

डाइट: नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स, एक गिलास कॉफी और 5-6 बादाम खाता हूं। 11:30 बजे एक कप चाय और लंच में दो चपाती, दही व सब्जी लेता हूं। कभी-कभी नॉनवेज भी खा लेता हूं। शाम 5 बजे फल खाता हूं और 7-8 बजे एक कप चाय लेता हूं। 9 बजे डिनर करता हूं, जो सादा ही होता है। स्मोकिंग से दूर रहता हूं और अल्कोहल भी साल में एक-दो बार से ज्यादा नहीं लेता। बाहर का खाना बहुत कम खाता हूं।

रिलैक्सेशन: जब भी वक्त मिलता है, मैं पार्क में जाना पसंद करता हूं। संडे को काम को कोई बोझ नहीं रखता। इससे भी तरोताजा रहने में मदद मिलती है।

जिंदगी का मंत्र: एक साथ बहुत सारी चीजों में शामिल न हों। इससे मन की शांति छिन जाती है। जो भी काम करें, उसी पर फोकस करें। बहुत ज्यादा की चाहत न हो, तो शांति बनी रहती है। मरीजों का फीडबैक पाकर दिल खुश हो जाता है। काम को एंजॉय करना भी खुश रहने के लिए जरूरी है।

डॉ. महिपाल सचदेव
चेयरमैन, सेंटर फॉर साइट
उम्र : 52 साल, वजन : 69 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6 बजे उठने के बाद आधा घंटा साइकलिंग करता हूं। उसमें कभी कोई रुकावट नहीं आती। पहले जॉगिंग भी करता था। कभी लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करता। हर सर्जरी से पहले दो मिनट मेडिटेशन करता हूं। रात में 11 बजे सोता हूं। जॉगिंग अब भी करना चाहता हूं, पर वक्त नहीं मिलता। बैडमिंटन और टेनिस भी खेलना चाहता हूं। ऐसा करना सेहत के लिए अच्छा होता।

डाइट: नाश्ते में दो ब्रेड व जूस लेता हूं। काम की वजह से लंच का टाइम फिक्स नहीं है। हफ्ते में एक-दो बार नॉन-वेज खाता हूं। पंजाबी खाना पसंद लेकिन ज्यादा तला-भुना नहीं खाता। फिर भी महीने में पांच-सात बार बाहर का खाना हो ही जाता है। एक्सर्साइज करके फालतू कैलरी घटाता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन सोशल डिंकिंग करता हूं।

रिलैक्सेशन: मैनेजमेंट और करंट सब्जेक्टों पर किताबें पढ़ने के अलावा टीवी पर न्यूज देखने से दिन भर की थकान गायब हो जाती है।

जिंदगी का मंत्र: मैं रोजाना गुरुद्वारा जाता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि ईश्वर और नियति किसी भी इंसान का भाग्य तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ईश्वर में विश्वास ही है कि किसी भी केस को देखने से पहले दो मिनट गुरु नानक का नाम जरूर लेता हूं। जिंदगी में एक मकसद तय करके उसी दिशा में बढ़ते जाने से सफलता मिलती है। काम से प्रेम करना भी जरूरी है। फिजिकल फिटनेस के लिए अपने शरीर को वक्त जरूर दें।

डॉ. के. के. अग्रवाल
प्रेजिडेंट, हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया
उम्र : 51 साल, वजन : 68 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 4 बजे से मेरा दिन शुरू होता है। रात में अगर 3 बजे भी सोऊं तो भी मैं इसी वक्त उठता हूं। सुबह 15-20 मिनट तेज वॉक करता हूं या फिर ट्रैडमिल पर चलता हूं। इसके बाद करीब 15 मिनट के लिए मेडिटेशन व प्राणायाम करता हूं। कभी लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करता। रात में 10 बजे तक सोने की कोशिश होती है, लेकिन कई बार काम ज्यादा होने से ऐसा नहीं हो पाता। वक्त की कमी के चलते लंबी वॉक पर नहीं जा पाना सालता है।

डाइट: सुबह नाश्ते में एक कप दूध और भीगे हुए 15-20 बादाम लेता हूं या फिर फ्रूट्स खा लेता हूं। दोपहर में 1-2 बजे दाल-सब्जी या फल खाता हूं। दोपहर में रोटी नहीं खाता। शाम 5 बजे फल खाता हूं और रात 8 बजे पूरा खाना खाता हूं। इसमें 2-3 रोटी, सब्जी दही आदि होती है। चावल नहीं खाता। मैं चाय, सॉफ्ट ड्रिंक, स्मोकिंग, ड्रिंकिंग और नॉनवेज से दूर रहता हूं।

रिलैक्सेशन: पढ़ना और लिखना मेरे मन को शांत रखता है। रोजाना 15 मिनट मूवी भी देखता हूं। इससे रिलैक्स महसूस होता है।

जिंदगी का मंत्र: जिस काम को करें, उसमें अपना तन-मन लगा लें। डेडिकेशन ही कामयाबी का राज है।

रविवार, 3 जनवरी 2010

प्यार एक बीमारी है, इलाज है सेक्स

लंदनः सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यही सच है। डॉक्टरों ने मान लिया है कि प्यार एक बीमारी
है और इसका इलाज सेक्स है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल की डॉ. लेसेल डॉसन ने एक रिसर्च के आधार पर यह नतीजा निकाला है। उनका कहना है कि प्यार नामक यह बीमारी तब ज़्यादा महसूस होती है जब लोगों को अपना प्यार ज़ाहिर करने का मौका नहीं मिलता। इसकी वजह से गुस्सा, फ्रस्ट्रेशन और यहां तक कि मानसिक रोग भी हो सकते हैं।

डॉ. डॉसन के मुताबिक एक अमीर आदमी को एक नौकर से प्यार हो गया, लेकिन उन्हें यह प्यार ज़ाहिर करने की इजाज़त नहीं थी, तो लव सिकनेस साफ नज़र आई। डॉ. डॉसन के नतीजे एक किताब में छपे हैं, जिसका नाम है - लव सिकनेस ऐंड जेंडर इन अर्ली मॉडर्न इंग्लिश लिटरेचर।

डॉ. डॉसन ने कहा कि सेक्स के ज़रिए प्यार करने वालों के शरीर से नुकसानदायक तत्व बाहर निकल जाते हैं। यही नुकसानदायक तत्व बीमारियों की वजह बनते हैं।

सुरीले गीत से सेक्स के लिए साथी ढूंढते हैं मच्छर

लंदन।। अपनी भिनभिनाहट से मच्छर भले ही आपकी नींद में खलल डालते हों, लेकिन एक नई स्टडी के मुताबिक अपने इस गायकी के जौहर से वे दरअसल सेक्स करने के लिए एक सही साथी की तलाश कर रहे होते हैं।
बायॉलजी में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक मेडवे स्थित ग्रीनवीच यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने पाया कि हवा में अपने पंख फड़फड़ा कर मच्छर यह सुर निकालते हैं। ग्रुप की अगुआई करने वाले गेबरीला गिब्सन ने बताया, 'स्टडी में इस बात का पता चला है कि मच्छर सही प्रजातियों के साथी को आकर्षित करने के लिए ध्वनि पर निर्भर होते हैं।'
ससेक्स यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स गिब्सन और रसेल ने बताया कि एनोफीलीज गैम्बियेन मच्छरों में बहुत अधिक जेनेटिक विविधता होती है। दो मच्छर यदि एक ही लिंग के होते हैं तो दोनों का सुर नहीं मिल पाता है।

महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं?

महिलाएं पुरुषों के साथ सेक्स सिर्फ इसलिए करती हैं ताकि उनकी शादीशुदा जिंदगी में शांति बनी रहे , या वह बिना वजह के सिरदर्द से बचना चाहती हैं। महिलाओं की लिस्ट में रोमैंस और पेशन की जगह काफी पीछे है। महिलाओं पर हुई एक स्टडी पर बाज़ार में आई किताब तो कुछ ऐसा ही हती है।
टेक्सस यूनिवर्सिटी में साइकॉलजी के प्रोफेसर्स सिंडी मेस्टन और डेविड बस की लिखी किताब - वाय वुमेन हेव सेक्स ( महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं ? ) में करीब 200 कारणों को हाईलाइट किया गया है। इस किताब के लिए रिसर्च के दौरान एक महिला ने तो यहां तक स्वीकार किया कि वह सेक्स सिर्फ इसलिए करती हैं ताकि उसके पति अपने स्पर्म बाहर निकाल सके।
रिसर्च के दौरान देखा गया कि ज्यादातर पुरुषों को महिलाएं सेक्सुअली अट्रैक्टिव लगती हैं , जबिक महिलाओं को पुरुषों में ऐसी कोई बात नज़र नहीं आती। रिसर्च के दौरान प्रोफेसर मेस्टन ने 1000 महिलाओं का इंटरव्यू किया , जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के साथ सोने के सैकड़ों कारण बताए।
महिला ने कहा - वह सेक्स इसलिए करती है ताकि उसे आध्यात्मिक अहसास हो सके। उसने दावा किया कि यह ( सेक्स ) ईश्वर को करीब से महसूस करने का जरिया है। लेकिन ज्यादातर महिलाओं ने सेक्स का जो विवरण दिया वह इससे कहीं ज्यादा दुनियावी था। 84 फीसदी महिलाओं ने माना कि वह सेक्स इसलिए करती हैं ताकि उनकी जिंदगी में शांति बनी रहे या उनकी घर - संसार की जरूरतें पूरी होती रहें।
महिला ने बताया - वह सेक्स इसलिए करती है ताकि बोरियत दूर कर सके क्योंकि सेक्स करना लड़ने से कहीं आसान है। जबकि कुछ दूसरी महिलाओं के लिए यह माइग्रेन और सिरदर्द दूर भगाने का उपचार है।
रिसर्च में कुछ महिलाओं ने ऐसी बातें भी कहीं जिन्हें सुनकर अजीब लग सकता है। एक महिला ने कहा कि मैं कई पुरुषों के साथ सिर्फ इसलिए सोई क्योंकि मुझे उन पर दया आ रही थी। वहीं , कुछ महिलाएं अपने स्वार्थ के लिए सेक्स का इस्तेमाल करती हैं जैसे रुपये - पैसों के लिए , और दूसरी कीमतों चीजों को हासिल करने के लिए वगैरह।
करीब 10 महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्होंने गिफ्ट्स लेने के कारण सेक्स किया। कुछ ने कहा - मैंने किसी पुरुष के साथ इसलिए संबंध बनाए क्योंकि उसने मेरे लिए एक शानदार डिनर का आयोजन किया या उसने मुझ पर काफी रुपये खर्च किए।
यूनिवर्सिटी स्टूडंट्स पर किए गए इस सर्वे में 10 में से 6 ने माना कि वह आमतौर पर ऐसे पुरुष के साथ सो चुकी हैं जो उनका बॉयफ्रेंड नहीं हैं। कुछ ने कहा - वह सेक्स इसलिए करती हैं ताकि अपनी सेक्सुअल परफॉर्मंस को इंप्रूव कर सकें। यही बताते हुए एक स्टूडंट ने कहा - मैंने अपने बॉयफ्रेंड के साथ इसलिए सेक्स किया ताकि मैं अपने सेक्सुअल स्किल्स को और बेहतर बना सकूं।
रिसर्च में यह भी पता चला कि महिलाएं ऐसे पुरुषों पर ज्यादा आकर्षित होती हैं जो लंबे हों , जिनकी आवाज़ रौबदार हो और जिनके शरीर से मदहोश कर देने वाली महक आती हो।

नो इंटरनेट सेक्स फॉर इंडियंस!

कई इंटरनेट कंपनियों ने फिल्टर लगा दिए हैं, ताकि भारतीय दर्शक सेक्स सामग्री न देख सकें। इनमें याहू, फ्ल
िकर और माइक्रोसॉफ्ट प्रमुख हैं।

'गार्जियन' ने एक सर्वे में यह पता किया है। सर्वे के बाद पता लगा कि याहू सर्च इंजन और फ्लिकर फोटो शेयरिंग साइट (जिसका मालिक याहू ही है) ने दिसंबर में अपनी साइटें बदल दीं ताकि भारतीय उपभोक्ता 'सेफ सर्च फसिलटी' को स्विच ऑफ न कर सकें। वैसे, यह फिल्टर सिंगापुर, हांगकांग और कोरिया के लिए भी लागू किया गया है।

माइक्रोसॉफ्ट ने भी भारतीय दर्शकों के लिए सेक्स सामग्री वाले अपने बिंग सर्च इंजन पर बैन लगा दिया है। भारतीय दर्शक यदि सेक्स सामग्री के लिए कोशिश करते हैं तो उन्हें नोटिस मिल जाता है कि आपके देश में एडल्ट सामग्री उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।

इंटरनेट पर सेक्स सामग्री पर प्रतिबंध संभवत: भारत के वर्ष 2000 में पारित सूचना अधिनियम के मद्देनजर लगाया गया है। पिछली अक्टूबर में इस कानून का दायरा बढ़ा दिया गया और इसमें इंटरनेट सर्च इंजन, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर और साइबर कैफे को भी शामिल कर लिया गया।

नए कानून के अनुसार, यदि इस कानून का उल्लंघन कर सेक्स सामग्री पेश की गई तो 3 साल की जेल हो सकती है और 5 लाख रुपए जुर्माना देना पड़ सकता है।

वैसे, भारत का बेहद लोकप्रिय कार्टून पोर्नस्टार 'सविता भाभी' एक नए वेब अड्रेस पर वापस आ गई है। पिछले साल जून में भारत सरकार ने सविता भाभी पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि रोजाना 2 लाख भारतीय इस साइट को देखते थे।

पुरानी जीन्स सेक्स से ज्यादा सुकून देती है: सर्वे

लंदन।। क्या आपको मालूम है कि महिलाओं को सेक्स से ज्यादा क्या भाता है? एक नई स्टडी के मुताबिक एक चौथाई
महिलाओं ने माना कि जब वह पुरानी जीन्स पहनती हैं और वह पूरी तरह से फिट हो जाए तो सेक्स से ज्यादा सुकून मिलता है।

इस सर्वे में शामिल की गई 35 फीसदी महिलाओं ने माना कि वह इस उम्मीद के साथ अपनी किसी पसंदीदा पुरानी जीन्स को निशानी के रूप में सहेज कर रखती हैं कि वह दोबारा इसे पहनेंगी। इस सर्वे में लगभग 2,200 महिलाओं की राय ली गई है।

'डेली मेल' में छपी खबर के मुताबिक इन महिलाओं ने यह पूछे जाने पर कि पुरानी जीन्स को दोबारा पहनने पर कैसा महसूस होता है, इस पर इनमें से 29.1 फीसदी ने इसे सेक्स से बेहतर बताया। स्टडी में यह भी पाया गया कि एक तिहाई महिलाएं अपनी पुरानी जीन्स जॉर्ज क्लूनी या ब्रैड पिट से ज्यादा पसंद करती है।

लाइफ में सेक्स का तड़का!

अगर आप सोचते हैं कि सेक्स सिर्फ मजे के लिए होता है, तो हम आपको बताना चाहेंगे कि आप थोड़े गलत हैं। दरअस
ल, मजे के अलावा सेक्स सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है और अगर आप रोज इसका आनंद लेते हैं, तो फिर क्या कहने! इससे न सिर्फ आपको अच्छी नींद आती है, बल्कि स्ट्रेस दूर हो जाता है और कैलरी भी बर्न होती है। इसके अलावा और भी तमाम वजहें हैं, जो हेल्दी सेक्स को जिंदगी के लिए जरूरी बनाता है।

हार्ट रहेगा हैपी
हाल ही में आई एक स्टडी के मुताबिक, जो लोग हफ्ते में दो बार से ज्यादा सेक्स करते हैं, उनको महीने में एक बार सेक्स करने वालों के मुकाबले हार्ट अटैक का खतरा बेहद कम रहता है।

टेंशन होगी हवा
आप परेशान हैं और इसलिए सेक्स से कतरा रहे हैं? नहीं, ऐसा मत कीजिए। सेक्स तो आपके लिए दवा का काम करेगा। यह साबित हो चुका है कि सेक्स दर्द और स्ट्रेस को दूर करने में मदद मिलती है। दरअसल, जब आप आर्गेज्म के करीब होते हैं, तो ऑक्सिटोसिन हॉमोर्न पांच गुना ज्यादा रिलीज होता है और आप बेहतर फील करने लगते हैं।

अगर आप काम या फैमिली प्रॉब्लम की वजह से स्ट्रेस में रहते हैं, तो इसे बेड रूम से दूर रखिए। एक स्टडी के मुताबिक जो लोग रेग्युलर बेड रूम एक्टिविटीज में ऐक्टिव रहते हैं, वे औरों के मुकाबले ज्यादा खुश रहते हैं।

इम्यून होंगे आप
रोजाना संबंध बनाने से बॉडी की इम्यूनिटी बढ़ती है। इससे आपकी बॉडी को कॉमन कोल्ड और बुखार जैसी बीमारियों का मजबूती से सामना करने में मदद मिलती है। तो स्वाइन फ्लू के बारे में आप क्या सोचते हैं?

हेल्दी लाइफ
ऑर्गेज्म के दौरान एक खास हॉर्मोन रिलीज होता है, जो आपकी इम्यूनिटी पावर को बढ़ाता है और टिश्यूज की मरम्मत कर स्किन को हेल्दी रखता है। अगर आपने हफ्ते में दो बार ऑर्गेज्म हासिल कर लिया, तो समझिए आप उस आदमी के मुकाबले ज्यादा जीएंगे, जो कई हफ्तों में एक बार सेक्स करता है।

सेक्स के दौरान टेस्टस्टेरॉन का स्त्राव बढ़ जाता है। पुरुषों में इस हॉर्मोन की ज्यादा मात्रा उन्हें बेड पर बेहतर परफॉर्म करने में मदद करती है। फिर इससे हड्डियां व मसल्स मजबूत होती हैं, हार्ट हेल्दी रहता है और कॉलेस्ट्रॉल भी कंट्रोल में रहता है। इसी तरह सेक्स महिलाओं में स्त्राव होने वाला एस्ट्रोजन हार्ट डिजीज से बचाव करता है।

स्लीपिंग पिल्स!
सेक्स के समय हार्ट रेट बढ़ जाती है। इससे बॉडी के सभी ऑर्गन्स और एक-एक सेल्स तक फ्रेश ब्लड पहुंचता है। इसके बाद जब ब्लड अपनी जगह वापस जाता है, तो शरीर को थकान-सी महसूस होती है। अगर आप ध्यान देंगे, तो पाएंगे कि आप चाहे लाख टेंशन में रहें, लेकिन इसके बाद आपको सुकून भरी नींद आती है। जाहिर है, अगर आपको अच्छी नहीं आ रही और आप इस वजह से परेशान हैं, तो सेक्स को एंजॉय कर सकते हैं। रात को अच्छी नींद आएगी, तो आप ज्यादा स्वस्थ रहेंगे।

कैलरी बर्न में सहायक
अगर आप रोजाना जिम जाकर और दूसरे उपायों से अपना वेट कंट्रोल करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं, तो आपके लिए एक और उपाय है। तमाम स्टडीज से यह साबित हो चुका है कि रोजाना सेक्स करने से आपको अपनी वेस्ट लाइन कम करने में मदद मिलती है। अगर आप प्यार को आधा घंटा देते हैं, तो 80 कैलरी बर्न करते हैं। है ना फायदेमंद!

डॉक्टर साहब, सस्ती और कम दवा लिखें

नई दिल्ली, अब इस सच्चाई को सरकार ने कबूल कर लिया है कि सरकारी डॉक्टर भी लोगों को बेवजह महंगी दवा लिख रहे हैं। कई मामलों में तो ये बिना जरूरत के एक की जगह चार दवाएं लिख देते हैं। नतीजा ये है कि आम जनता की न सिर्फ जेब कट रही है, बल्कि सेहत का भी नुकसान हो रहा है। देश भर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से ले कर अस्पतालों तक में काम कर रहे डॉक्टरों के बारे में यह सच्चाई सामने आई है खुद केंद्र सरकार की ओर से की गई समीक्षा में। देश भर में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा के ढांचे को मजबूत करने के इरादे से चलाए जा रहे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की तीसरी साझा समीक्षा (कॉमन रिव्यू मिशन) के दौरान राज्यों के प्रयासों की खासी तारीफ की गई है। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की साझेदारी में की गई इस समीक्षा में कई बड़ी खामियां भी सामने आई हैं। इस साझा समीक्षा ने पाया गया है कि महंगी और गैर-जरूरी दवा लिखने के मामले में सरकारी डॉक्टर भी प्राइवेट डॉक्टरों की राह पर चल रहे हैं। ज्यादातर जगहों पर देखने को मिला कि डॉक्टर सस्ती जेनेरिक दवा की जगह महंगे ब्रांड वाली दवाएं लिख रहे हैं। इतना ही नहीं, महंगी दवा लिखने के साथ ही ये अक्सर अतार्किक रूप से ज्यादा दवाएं भी लिख देते हैं। समीक्षा में कहा गया है कि कम से कम सरकारी ढांचे में काम करने वाले डॉक्टरों को तो अनिवार्य-दवा की अवधारणा को समझना चाहिए और इसी आधार पर काम करना चाहिए। डॉक्टरों में अगर यह समझ पैदा की जाए तो न सिर्फ आम लोगों का खर्च कम होगा, बल्कि पूरी व्यवस्था पर बोझ भी घटेगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि हालांकि अधिकांश राज्य सरकारों ने इस मामले में पहले से ही दिशा-निर्देश तय किए हुए हैं, लेकिन इस तथ्य के सामने आने के बाद उम्मीद की जा सकती है कि इस पहलू पर और ध्यान दिया जाएगा। हालांकि यह रिपोर्ट बताती है कि देश भर में, खास कर गरीब मरीजों को दवा उपलब्ध करवाने को ले कर ज्यादातर राज्य सरकारें काफी संजीदा हुई हैं। कुछ राज्य सस्ती जेनरिक दवाओं पर जोर दे रहे हैं तो कुछ राज्यों ने अपने अस्पताल और चिकित्सा केंद्रों के अहाते में सस्ते दर पर दवा बेचने का इंतजाम किया है। इसके बावजूद इनमें से ज्यादातर जगहों पर मुफ्त दवा उपलब्ध नहीं हो पा रही। इस वजह से डॉक्टरों को बाहर की दवा लिखने से भी नहीं रोका जा सकता।

रविवार, 6 दिसंबर 2009

जब इलाज बढ़ाए बीमारी तो...





डॉक्टरों के पास मरीज अपने दामन में उम्मीद नाम का शब्द लेकर जाता है। नॉर्मल जिंदगी जीने की आस लेकर कि स
फेद एप्रेन पहने डॉक्टर फरिश्तों की तरह उसकी सेहत ठीक कर देगा। डॉक्टर अपनी तरफ से कोशिश भी करते हैं, मगर कई बार डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से इलाज ही बड़ी बीमारी का सबब भी बन जाता है। ऐसे में बिगड़े मर्ज के साथ मरीज ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है। अगर इलाज ही बीमारी की वजह बन जाए तो क्या करें, बता रही हैं नीतू सिंह :

अध्यापक नगर, नांगलोई के रहने वाले विनोद कुमार की नाक की एक साइड में साल 2003 में सूजन आ गई। विनोद दिल्ली जल बोर्ड में काम करते थे, इसलिए केशवपुरम स्थित बोर्ड की डिस्पेंसरी में दिखाने गए। डॉक्टर ने जांच के बाद उन्हें एम्स रेफर कर दिया। विनोद अगले दिन एम्स की ओपीडी में पहुंचे। वहां तैनात डॉक्टर ने उन्हें तुरंत भर्ती कर लिया और कहा कि नाक की सर्जरी करनी होगी। विनोद का आरोप है कि डॉक्टरों ने नाक के बदले गलती से सिर और मुंह का ऑपरेशन कर दिया, जिसके चलते कुछ दिन बाद ही उनकी एक आंख भी खराब हो गई। जब इस बारे में डॉक्टरों से पूछा गया तो वे गलती मानने के बजाय उन्हें ही डांटने लगे। कुछ दिनों बाद विनोद को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया। विनोद के मुताबिक, इस सर्जरी के चक्कर में उनका आधा चेहरा खराब हो गया। उधर, दिल्ली जल बोर्ड एक आंख खराब होने के बाद भी उन्हें अपंग मानने को तैयार नहीं। अब तक विनोद प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, हेल्थ मिनिस्टर, सबके ऑफिस में गुहार लगा चुके हैं, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। तो क्या इलाज के फेर मंे और बीमार हुए लोगों को कोई ठौर नहीं? ठौर है, मगर वहां तक पहुंचने और इंसाफ पाने के लिए चाहिए सही जानकारी। आज के अंक में हमने इसी पहलू से जुड़ी समस्याओं और जानकारियों पर बात की है।

आम दिक्कतें
1. अस्पताल में भर्ती मरीज के रिश्तेदार अगर उसकी केस फाइल या उसकी फोटोकॉपी अपनी संतुष्टि के लिए किसी और डॉक्टर को दिखाना चाहें, तो हॉस्पिटल वाले करते हैं ऐतराज।
2. किसी बाहरी डॉक्टर को हॉस्पिटल में बुलाकर सेकंड ओपिनियन लेना चाहें तो डॉक्टर और हॉस्पिटलों को होता है ऐतराज।
3. मरीज से मिलने आए किसी डॉक्टर रिश्तेदार को भी नहीं दिखा सकते हैं मरीज की फाइल।
4. अगर डॉक्टर को केस अपनी पकड़ से बाहर लगता है, तो वह तुरंत किसी और हॉस्पिटल में ले जाने को बोल देता हैं, लेकिन यदि मरीज के अटेंडेंट इलाज से संतुष्ट न होने की हालत में उसे किसी और हॉस्पिटल में ले जाना चाहें, उनसे यह लिखवाया जाता है कि वे अपने रिस्क पर और डॉक्टर के मना करने के बावजूद मरीज को ले जा रहे हैं।
5. मरीज या उसके रिश्तेदार के पूछने पर इलाज के बारे में नहीं दी जाती है पूरी जानकारी।

क्या कहती है हॉस्पिटल की रूल बुक

गंगाराम हॉस्पिटल के अध्यक्ष डॉ. बी. के. राव
1. हॉस्पिटल में भर्ती किसी भी भर्ती मरीज के इलाज से संबंधित फाइल की फोटोकॉपी को उनके परिजन ले जा सकते हैं। इसके लिए वह ट्रीटिंग डॉक्टर, रेकॉर्ड सेक्शन या हॉस्पिटल प्रशासन से सीधे बात कर सकते हैं। भर्ती के टाइम ही नहीं, मरीज के डिस्चार्ज होने के बाद भी अगर कोई उनकी फाइल की कॉपी लेना चाहता है तो रेकॉर्ड सेक्शन से बात करके तुरंत इशू करा सकता है।
2. अगर मरीज या उसके रिश्तेदार लाइन ऑफ ट्रीटमेंट के बारे में डिटेल्स जानना चाहते हैं तो डॉक्टर बिल्कुल मना नहीं कर सकते। यह मरीज या उनके रिश्तेदारों का अधिकार है कि वे सबकुछ जानें।
3. अगर भर्ती मरीज का कोई डॉक्टर रिश्तेदार या जानकार उससे मिलने के लिए आता है और उसकी फाइल देखना या उस पर डॉक्टर से डिस्कस करना चाहता है तो हम कभी इनकार नहीं करते हैं।
4. अगर भर्ती मरीज के रिश्तेदार अपनी संतुष्टि और सेकंड ओपिनियन के लिए बाहर से किसी डॉक्टर को बुलाना चाहते हैं तो उन्हें सिर्फ अपने ट्रीटिंग डॉक्टर को कॉन्फिडेंस में लेना होता है। हमारे यहां तो कई बार लोग दूसरी पैथी के एक्सपर्ट या प्रीस्ट आदि को भी ले आना चाहते हैं और इस स्थिति में भी हमारे डॉक्टर ऐतराज नहीं करते हैं। मगर जहां तक इलाज की बात है तो जब तक मरीज हमारे यहां भतीर् रहता है तब तक उसकी सहमति के हिसाब से ही इलाज होता है।
5. अगर कोई डॉक्टर की सहमति के बिना मरीज को डिस्चार्ज कराकर ले जाना चाहता है तो ऐसे केस में अगेंस्ट मेडिकल एडवाइस के पेपर पर साइन कराना जरूरी होता है, क्योंकि ऐसा नहीं करने से मरीज के साथ अगर अनहोनी हो गई तो उसकी जिम्मेदारी डॉक्टर और हॉस्पिटल पर आ सकती है।

एम्स के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. डी. के. शर्मा

1. किसी भी भर्ती मरीज के इलाज से संबंधित फाइल की फोटोकॉपी को उसके परिजन ट्रीटिंग डॉक्टर की सहमति से ले जा सकते हैं।
2. अगर मरीज या उसके रिश्तेदार उसके लाइन ऑफ ट्रीटमेंट के बारे में डीटेल में जानना चाहते हैं तो डॉक्टर मना नहीं करते हैं। यह अलग बात है कि हमारे यहां मरीजों का बहुत ज्यादा दबाव होने के चलते ओपीडी में डॉक्टर ज्यादा टाइम नहीं दे पाते हैं, बावजूद इसके मरीज और उसके रिश्तेदारों को संतुष्ट करने की पूरी कोशिश की जाती है।
3. अगर भर्ती मरीज का कोई डॉक्टर रिश्तेदार या जानकार उससे मिलने के लिए आता है और उसकी फाइल देखना चाहता है तो ट्रीट्रिंग डॉक्टर से बात कर सकता है।
4. भर्ती मरीज के रिश्तेदार अपनी संतुष्टि के लिए सेकंड ओपिनियन लेना चाहते हैं तो उन्हें इंस्टिट्यूट की ही दूसरी यूनिट के डॉक्टरों से सलाह लेने का सुझाव दिया जाता है, लेकिन अगर कोई बाहर से डॉक्टर को बुलाना चाहता है तो इसके लिए विशेष पमिर्शन और ट्रीटिंग डॉक्टर की रजामंदी की जरूरत होती है। जैसा कि पी. वी. नरसिंह राव और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इलाज के मामले में किया गया था।

मरीज को है पूरा अधिकार

कोट
- अगर पेशंट सेकंड ओपिनियन के लिए दूसरे डॉक्टर को बुलाते हैं, तो इलाज कर रहा डॉक्टर या हॉस्पिटल अथॉरिटी कोई ऐतराज नहीं कर सकते।

डॉ. गिरीश त्यागी, रजिस्ट्रार, दिल्ली मेडिकल काउंसिल

- इंटरनैशनल कोड ऑफ एथिक्स के मुताबिक हर मरीज या उनके परिजनों को यह जानने का हक है कि मरीज को क्या हुआ है, उसकी जांच में क्या सामने आया है और इलाज के लिए उन्हें कौन-सी दवाइयां दी जा रही हंै। अगर उन्हें कोई कॉम्प्लिकेशन आती है तो उसकी वजह क्या है, यह भी जानने का हक है।

डॉ. अनिल बंसल, मेंबर, दिल्ली मेडिकल काउंसिल
दिल्ली में प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टरों को रेग्युलेट करने वाली संस्था दिल्ली मेडिकल काउंसिल समेत तमाम एजेंसियां मरीजों को इलाज के दौरान लापरवाही बरतने पर अपनी शिकायत दर्ज करवाने का फोरम मुहैया कराती हैं। दिल्ली मेडिकल काउंसिल के रजिस्ट्रार डॉ. गिरीश त्यागी के मुताबिक:

-इलाज के बारे में अपनी संतुष्टि के लिए उसके रिश्तेदार भर्ती मरीज की फाइल दूसरे अस्पताल के डॉक्टर को दिखा सकते हैं।
-पेशंट की संतुष्टि के लिए अगर बाहर से किसी डॉक्टर को कोई बुलाता है तो इस पर हॉस्पिटल या ट्रीटिंग डॉक्टर को ऐतराज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इस बारे में कहीं कोई रोक नहीं है। कई बार तो डॉक्टर खुद यह बोलते हैं कि अगर मरीज की हालत ज्यादा खराब है और रिश्तेदार अपनी संतुष्टि करना चाहते हैं तो बाहर से किसी डॉक्टर को बुलाकर सेकंड ओपिनियन ले लें।
- जहां तक मरीज के किसी डॉक्टर रिश्तेदार के फाइल देखने की बात है तो इसमें छुपकर देखने वाली कोई बात ही नहीं है, वैसे भी सिर्फ फाइल देखकर केस को समझना मुश्किल होता है। ऐसे में ट्रीटमेंट कर रहे डॉक्टर से सीधे केस डिस्कस करना चाहिए और उस ट्रीटिंग डॉक्टर को भी इस डिस्कशन को मरीज या उसके रिश्तेदारों की चिंता के तौर पर देखना चाहिए, अपने काम में दखल के तौर पर नहीं।
-अगर ट्रीटमेंट कर रहे डॉक्टर केस डिस्कस करने या फाइल शेयर करने में आनाकानी करते हैं तो इसे उसकी प्रफेशनल इनसिक्युरिटी ही कहा जा सकता है।
- इलाज का सबका अपना तरीका होता है और हर डॉक्टर अपना बेस्ट देना चाहता है। मुश्किल केस में हॉस्पिटल के दूसरे डॉक्टरों से भी वह डिस्कस करता ही है। जहां तक परिजनों की मजीर् होने पर शिफ्ट कराने की बात है, अगर डॉक्टरों को लगता है कि मरीज को शिफ्ट नहीं किया जाना चाहिए, फिर भी परिजन शिफ्ट के लिए दबाव डालते हैं तो डॉक्टर उनसे लामा फॉर्म (लेफ्ट अगेंस्ट मेडिकल एडवाइस) पर साइन करवाते हैं।

दिल्ली मेडिकल काउंसिल के सदस्य डॉ. अनिल बंसल के मुताबिक:
-इंटरनैशनल कोड ऑफ एथिक्स के मुताबिक हर मरीज या उसके रिश्तेदारों को यह जानने का हक है कि मरीज को क्या हुआ है, उसकी जांच में क्या सामने आया है और इलाज के लिए उन्हें क्या- क्या दिया जा रहा है। अगर उन्हें कोई कॉम्प्लिकेशन आती है तो उसकी वजह क्या है, यह भी जानने का हक है। मगर भारत में सरकारी क्षेत्र में जहां इन्फ्रास्ट्रक्चर और डॉक्टरों की कमी इसके आड़े आती है तो प्राइवेट अस्पतालों में भी ऐसा कल्चर नहीं है। यही वजह है कि मरीज के कुछ पूछने पर ज्यादातर टाइम घुड़की ही मिलती है। आए दिन सरकारी अस्पतालों में होने वाली मारपीट इसी का एक नतीजा है।

कहां करे मरीज शिकायत

स्टेप 1
अगर कोई व्यक्ति अपने या अपने रिश्तेदार के इलाज से संतुष्ट नहीं है या इलाज से कोई नई बीमारी या मृत्यु हो गई है तो वह दिल्ली मेडिकल काउंसिल में अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है। काउंसिल में शिकायत दर्ज कराने के दो तरीके हैं। इलाज से जुड़े सभी कागजों की फोटोकॉपी और शिकायत पत्र को पोस्ट कर दिया जाए या फिर खुद वहां जाकर कंप्लेंट की जाए और संबंधित कागज जमा कराए जाएं।

काउंसिल का पता
दिल्ली मेडिकल काउंसिल, कमरा नंबर : 368, थर्ड फ्लोर, पैथोलजी ब्लॉक, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, बहादुरशाह जफर मार्ग, नई दिल्ली-110002

फोन नंबर : 011-23235177, 23237962

वर्किंग डे : सोमवार से शुक्रवार

वर्किंग ऑवर्स : सुबह 9:30 से दोपहर बाद 4:30 तक

स्टेप 2
- अगर मरीज या उसके रिश्तेदारों को लगता है कि काउंसिल में जाने के बजाय पुलिस के पास जाने से फौरन कार्रवाई होती है, तो यह विकल्प भी अपनाया जा सकता है। जिस एरिया में हॉस्पिटल है, वहां के पुलिस स्टेशन में जाकर कंप्लेंट की जा सकती है। हालांकि पुलिस को भी जांच के दौरान अगर मेडिकल लापरवाही का मामला लगता है, तो केस को दिल्ली मेडिकल काउंसिल के पास ही रेफर किया जाता है।

स्टेप 3
- इलाज के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए मरीज या उसके रिश्तेदार कंस्यूमर फोरम भी जा सकते हैं। शिकायत का नेचर देखने के बाद कंस्यूमर फोरम या तो दिल्ली मेडिकल काउंसिल से संपर्क करती है, या फिर किसी भी सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों की एक टीम बनाकर उसे जांच की जिम्मेदारी सौंपती है।

कंस्यूमर फोरम से जुड़ी जानकारी
पता : दिल्ली स्टेट कंस्यूमर कमिशन, ए ब्लॉक, फर्स्ट फ्लोर, विकास भवन, आईपी इस्टेट, नई दिल्ली-110002
फोन नंबर : 011-23370799, 23370258
फैक्स नंबर : 23370258

कैसे होती है जांच
- दिल्ली मेडिकल काउंसिल (डीएमसी) शिकायत करने वाले व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराए गए सभी डॉक्युमेंट्स की जांच कराती है।
- जरूरत पड़ने पर शिकायतकर्ता और जिस डॉक्टर के खिलाफ शिकायत की गई है, उन दोनों को बुलाकर मामले के सभी पहलुओं को समझा जाता है।
- केस को काउंसिल की इगेक्युटिव कमिटी के सामने रखा जाता है। कमिटी के सभी मेंबर्स केस डिस्कस कर इस पर अपनी राय देते हैं।
- अगर केस बहुत सीरियस है या एक बार में फैसला नहीं हो पाता, तो कमिटी की दूसरी मीटिंग होती है और फिर ऑर्डर पास किया जाता है।
- केस कितने समय में सुनवाई के लेवल पर आ जाएगा, इसके बारे में कोई निश्चित समयसीमा नहीं है। पेंडिंग केसों के हिसाब से नंबर लगता है।
- डीएमसी अपने लेवल पर शिकायत सही पाए जाने पर डॉक्टर को वॉनिर्ंग दे सकती है। डीएमसी डॉक्टर का लाइसेंस भी कैंसल कर सकती है।
- शिकायतकर्ता अगर अपने नुकसान की भरपाई चाहता है, तो डीएमसी की रिपोर्ट के साथ वह कंस्यूमर फोरम जा सकता है।
- डीएमसी ऐसे मामलों के निपटारे के लिए महीने में कम से कम दो बार एग्जिक्यूटिव कमिटी की मीटिंग बुलाती है। जरूरत पड़ने पर महीने में चार या पांच बार भी मीटिंग हो सकती है।
- अगर शिकायतकर्ता डीएमसी के फैसले से संतुष्ट नहीं है तो मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में इस फैसले के खिलाफ अपील की जा सकती है।

मेडिकल काउंसिल का पता :
मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, पॉकेट-14, सेक्टर-8, द्वारका फेज-1, नई दिल्ली- 110077
फोन नंबर : 011-25367033, 25367035, 25367036, 25367037
फैक्स नंबर : 25367024, 25367028

डॉक्टर-मरीज से संबंधित दो अहम फैसले

आपराधिक मामले के अलावा मुआवजा भी
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंडियन मेडिकल असोसिएशन बनाम वी. पी. शांता के मामले में 1995 में दिए गए फैसले के मुताबिक डॉक्टरों पर दो कारणों से मुकदमा चलाया जा सकता है। एक तो लापरवाही बरतने के लिए उन पर आपराधिक मामला बनता है और दूसरा कंस्यूमर फोरम में उनसे मुआवजे की मांग भी की जा सकती है, जबकि इससे पहले डॉक्टरों को सिर्फ असावधानी बरतने के लिए दोषी पाए जाने पर सजा सुनाई जा सकती थी।

लापरवाही के मामले में एक्सपर्ट की राय जरूरी
5 अगस्त 2005 को डॉ. जैकब मैथ्यू मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के मुताबिक किसी आम आदमी को डॉक्टर की लापरवाही के खिलाफ सीधे केस करने का अधिकार नहीं है। मामला तभी दर्ज किया जा सकता है जब किसी सक्षम डॉक्टर (सरकारी क्षेत्र से हो तो बेहतर है) ने इस मामले में अपनी राय दी हो। इस मामले में बचाव पक्ष के वकील की एक दलील यह भी थी कि अगर डॉक्टर पर यह तलवार लटकती रही कि उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है तो वह इलाज करने से घबराने लगेगा।

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