डबवाली(डबवाली न्यूज़)राष्ट्रीय मंडल खेलों की क्वींस बेटन का हरियाणा में बदहाल सड़कें और बुरी तरह से चरमरा चुकी सिवरेज़ व्यवस्था के कारण सड़कों पर सड़ांध मार रहे पानी तथा भयानक मच्छरों से स्वागत होगा। 71 देशों की यात्रा कर 25 जून को बाघा बार्डर से भारत में प्रवेश करने के उपरांत 26 सितंबर को डबवाली के चौटाला गांव से हरियाणा में प्रवेश करेगी। जहां पर प्रदेश में गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा के नेतृत्व में क्वींस बेटन का स्वागत किया जायेगा। लेकिन चौटाला गांव से ही जिस रास्ते पर देश व प्रदेश के खिलाड़ी क्वींस बेटन को लेकर दौड़ेंगे उसकी खस्ता हालत यहां की व्यवस्था की पोल खोल देगी। चौटाला गांव से लेकर डबवाली तक यह सड़क खस्ता हालत में है। रिपेयर के नाम पर प्रदेश के लोक निर्माण विभाग भवन व सड़क द्वारा मात्र लिपा पोती ही की गई। बड़े-बड़े गढ्ढों को मिट्टी व ईटें डाल कर भरने का प्रयास किया गया है लेकिन बरसात और भारी वाहनों के आवागमन के आगे विभाग के कपटी प्रयास दम तोड़ गये। विभाग की इस तरह की लिपा पोती प्रदेश के दामन पर दाग बन कर उभरेगी। अभी क्वींस बेटन के यहां पर पहुंचने में दो दिन ही शेष रह गये है ऐसे में भी लोक निर्माण विभाग भवन व सड़क के आला अधिकारी प्रदेश की साख बचाने की बजाये छुट्टियां मनाने में मशगूल हैं। वहीं सड़कों पर जमा बरसाती और उससे उत्पन्न सड़ांध और मच्छर भी बहार से आने वाले वीआईपी अतिथियों का भरपूर स्वागत करेंगे। हलांकि प्रशासन पिछले एक माह से क्वींस बेटन के स्वागत की तैयारियों में जुटा हुआ है। शहर को चाक चौबंद बनाने के लिए शिद्दत से जुटा हुआ है। डबवाली के उपमंडल अधिकारी मुनीष नागपाल ने बताया कि बठिंडा चौक बने लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह का कायाकल्प करने साथ-साथ चौंक की साजसज्जा की जा रही है। डिवाईडर पर लगे बिजली के खम्बों को सिल्वर रंग से रंगने के अलावा डिवाईडरों के साथ जमा मिट्टी को हटा कर उन्हें पीली काली पट्टी से रंगा जा रहा है। खेल परिसर को भी संवारा गया है। उन्होंने बताया कि सड़क की मरम्मत के लिए विभाग को सख्त हिदायतें दी गई हंै। चौटाला गांव से लेकर डबवाली शहर तक का मरम्मत का कार्य जारी है। इस संदर्भ में लोक निर्माण विभाग के कार्यकारी अधिकारी इंद्र सिंह से बात की गई तो उन्होंने बताया कि वे शहर से बाहर है।
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गुरुवार, 23 सितंबर 2010
गुरुवार, 7 जनवरी 2010
सेहत के सरताजों की सेहत का राज
दूसरों की जिंदगी और सेहत की हिफाजत का दारोमदार जिन कंधों पर है, उन्हें इतनी मजबूती कैसे मिलती है कि व्
इतनी बड़ी जिम्मेदारी को बखूबी निभा सकें, यह सवाल सभी के जेहन में कभी-न-कभी कौंधता होगा। लगातार काम के बीच खुद को अपडेट रखने के अलावा दूसरों की जान बचाने का प्रेशर होता है डॉक्टरों पर। ऐसे में वे खुद को फिट कैसे रखते हैं, यह जानना दिलचस्प और फायदेमंद हो सकता है। प्रियंका सिंह ने टॉप डॉक्टरों से बात करके जाना उनकी फिटनेस का फंडा :
डॉ. नरेश त्रेहन,
चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, मेडांटा, द मेडिसिटी
उम्र : 63 साल, वजन : 72 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6:15 से 6:30 बजे तक उठने के साथ दिन शुरू होता है, जो रात 11:30 बजे बिस्तर पर जाने पर खत्म होता है। हफ्ते में पांच दिन सुबह 45 मिनट एक्सर्साइज और तीन दिन 45 मिनट योग करता हूं। लोदी गार्डन में घूमने चला जाता हूं या फिर घर में ही ट्रैडमिल पर चलता हूं। वॉक हमेशा तेज करता हूं। हल्के वेट भी उठाता हूं। वॉक, वर्कआउट और योग, इन तीनों का कॉम्बिनेशन बॉडी को पूरी तरह फिट रखता है। सुबह 8:30 बजे तक हॉस्पिटल पहुंच जाता हूं और आमतौर पर वहां से रात 8:30-9:00 बजे निकलना होता है। शाम को घर लौटते हुए कार में ही 15-20 मिनट मेडिटेशन (विपश्यना) भी करता हूं। इससे दिन भर की दिमागी थकान गायब हो जाती है।
डाइट: सुबह नाश्ते में एक अंडे का सफेद हिस्सा या अंकुरित दालें और पांच-छह बादाम, एक अखरोट और एक कप चाय लेता हूं। दिन में 11 बजे सलाद और लंच में एक रोटी, हरी सब्जी और दही खाता हूं। शाम को 5-6 बजे एक कप चाय या कॉफी के साथ एक बिस्कुट और रात में 8:30 तक डिनर लेता हूं, जिसमें एक चपाती, सलाद या चिकन होता है। खाने में ज्यादा-से-ज्यादा फल और हरी सब्जियां शामिल करने की कोशिश होती है। बाहर के खाने से परहेज करता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन कभी-कभी सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: सूफी संगीत सुनकर और किताबें पढ़कर मन को रिलैक्स करता हूं।
जीवन का मंत्र: ऐसी जिंदगी जिएं, जिसमें गैरकानूनी और गलत कामों के लिए कोई जगह न हो। नेगेटिव होने से बचें। ऐसा होने से दूसरों से भी ज्यादा नुकसान खुद उस शख्स का होता है। संतोष रखना सबसे जरूरी है, क्योंकि हमें यह देखना चाहिए कि न जाने कितने लोग हमसे बहुत खराब जिंदगी जी रहे हैं।
डॉ. अशोक सेठ
चेयरमैन, कार्डिएक साइंसेज, एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट
उम्र : 54 साल, वजन : 74 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6:30 बजे उठने के बाद एक कप चाय पीता हूं। 45 मिनट ट्रैडमिल (जिसमें साइकलिंग भी शामिल होती है) और 15 मिनट वेट उठाता हूं। हफ्ते में 5-6 दिन एक्सर्साइज जरूर करता हूं। रोजाना पूजा करता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि ईश्वर की कृपा से ही मैं अपने मरीजों के चेहरे पर मुस्कान ला पाता हूं। इसके लिए मैं रोज रात को सोने से पहले भगवान को धन्यवाद देता हूं। सुबह 9:30 बजे हॉस्पिटल पहुंचता हूं और कई बार काम खत्म होते-होते रात में 2 भी बज जाते हैं। औसतन 1-1:30 से पहले सोना मुमकिन नहीं हो पाता।
डाइट: नाश्ता हल्का ही लेता हूं। लंच टाइम फिक्स नहीं है क्योंकि वक्त मिल ही नहीं पाता। दिन में कभी भी अंकुरित चना या दाल ले लेता हूं। डिनर इत्मिनान से लेता हूं, लेकिन यह सादा ही होता है। दो चपाती व दाल खाता हूं। कभी-कभार नॉन-वेज खाता हूं। बहुत मन होता है तो रेस्तरां में जाकर अच्छा खाना भी खा लेता हूं लेकिन तब एक्सर्साइज से फालतू कैलरी जलाना नहीं भूलता। स्मोकिंग से दूर रहता हूं, पर कभी-कभार सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: संगीत सीखता हूं और साल में दो बार स्कूबा डाइविंग पर जाता हूं। कोई भी ऐसा काम जो आपके प्रफेशन से अलग होता है, वह मन को रिलैक्स करता है।
जिंदगी का मंत्र: अपने काम के प्रति समर्पण और फोकस जरूरी है। परिवार का सपोर्ट और भगवान में विश्वास आपको जिंदगी जीने का सही तरीका सिखाता है। वही काम करें, जिससे आपको प्यार हो और जिसे आप एंजॉय करें। इससे आप दिमागी और शारीरिक तौर पर फिट रहेंगे।
डॉ. प्रदीप चौबे
जॉइंट एमडी, मैक्स हेल्थकेयर
उम्र : 57 उम्र, वजन : 81 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 7 बजे उठने के बाद आधा घंटा ट्रैडमिल पर चलता हूं। वक्त मिलता है तो हेल्थ क्लब भी चला जाता हूं। हालांकि कभी-कभी ज्यादा ऑपरेशन होते हैं तो एक्सर्साइज छूट भी जाती है। ऑपरेशन के दौरान ही मेरा प्रैक्टिकल मेडिटेशन हो जाता है क्योंकि जितना कंसंट्रेशन उस दौरान करना होता है, उतना कभी और नहीं होता। सुबह 9 से रात 9 बजे तक हॉस्पिटल में होता हूं। पूजा करता हूं लेकिन इसके लिए मूर्ति के सामने बैठना जरूरी नहीं है। जब भी, जहां भी वक्त मिला, भगवान को याद कर लेता हूं। रात में 12 बजे से पहले सोना नहीं हो पाता।
डाइट: नाश्ते में एक गिलास जूस और फल लेता हूं। हॉस्पिटल में लंच का वक्त नहीं मिलता, लेकिन हर दो घंटे बाद कुछ-न-कुछ खा लेता हूं, जैसे कि सैंडविच, फल, स्प्राउट्स, लो कैलरी बिस्कुट आदि। दिन में पांच-सात बादाम भी लेता हूं। काम के दबाव की वजह से डिनर ही मेरा मुख्य खाना होता है, जिसमें मैं सब्जी, रोटी, दाल, चावल आदि लेता हूं। दही में स्ट्रॉबेरी या कोई और फल डालकर खाना पसंद करता हूं। स्मोकिंग नहीं करता, कभी-कभार अल्कोहल ले लेता हूं।
रिलैक्सेशन: एग्जिबिशन जाकर आर्ट वर्क देखने और उनका कलेक्शन करने से मेरा मन खुश हो जाता है। स्प्रिचुअलिटी से संबंधित अच्छी किताबें भी पढ़ता हूं।
जिंदगी का मंत्र: मेरा मानना है कि अपने प्रफेशन के अलावा दूसरे क्षेत्रों के लोगों से मिले-जुलें। अगर मैं दिन भर की थकान के बाद शाम को किसी डॉक्टर से मिलूंगा तो मेडिसिन की ही बात होगी, इसलिए काम खत्म करते ही नॉन-प्रफेशनल दुनिया में आना पसंद करता हूं। दिमागी शांति के लिए यह जरूरी है।
डॉ. अनूप मिश्रा
हेड ऑफ डायबीटीज एंड मेटाबॉलिम डिपार्टमेंट, फोर्टिस हॉस्पिटल
उम्र : 51 साल, वजन : 73-76 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 5:30 बजे मेरा दिन शुरू होता है। काम के दिनों में 45 मिनट रेग्युलर एक्सर्साइज करता हूं, जबकि संडे और बाकी छुट्टी के दिन एक घंटा पसीना बहाता हूं। रोजाना ट्रैडमिल पर 350-400 कैलरी जरूर जलाता हूं। साथ में 10-12 मिनट हल्के वेट भी उठाता हूं। अगर रात में जल्दी घर आ गया तो फिर से 20-25 मिनट वॉक और जॉगिंग करता हूं। पिछले 15 सालों से मेरा बीएमआई बढ़ा नहीं है। योग के बजाय एरोबिक्स को ज्यादा फायदेमंद मानता हूं। रोजाना पूजा और मेडिटेशन करता हूं।
डाइटः हल्का नाश्ता लेता हूं, जैसे कि दलिया, फल आदि। संडे को लंच अक्सर बाहर करता हूं, लेकिन जिस दिन भी बाहर खाता हूं, एक्सर्साइज ज्यादा करता हूं। लंच में दो चपाती व पनीर प्रेफर करता हूं। सलाद खूब खाता हूं। शाम 6 बजे एक कप कॉफी और रात करीब 9 बजे डिनर में 2-3 चपाती व सब्जी-दाल लेता हूं। स्मोक नहीं करता, कभी-कभी सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: एक वक्त था, जब प्ले खूब करता था। अब हिंदी व इंग्लिश के नॉवेल और रिसर्च पेपर लिखना मन को सुकून देता है।
जिंदगी का मंत्र: अनुशासन बहुत जरूरी है। मैं कितना भी थका होऊं, एक्सर्साइज जरूर करता हूं। सिडनी के ऑपरा हाउस से लेकर पैरिस के आइफिल टावर तक को मैंने जॉगिंग करते हुए ही देखा। यह दुनिया को देखने का मेरा तरीका है। अपने काम को एंजॉय करना भी बेहद जरूरी है। वही काम करें, जो पसंद हो।
डॉ. पी. के. दवे
चेयरमैन, गवर्निंग बॉडी, रॉकलैंड हॉस्पिटल
उम्र : 70 साल, वजन : 62 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 5 बजे उठता हूं। इसके बाद वॉक करता हूं। सर्दियों में बाहर नहीं जा पाता तो घर पर ही वॉक कर लेता हूं। योग भी करता हूं। प्राणायाम और डीप ब्रिदिंग मन को शांत करते हैं। सुबह 8:30 बजे हॉस्पिटल पहुंच जाता हूं। लिफ्ट के बजाय सीढयों से चढ़ना पसंद करता हूं। रात 8 बजे तक काम चलता रहता है। रात में 10-10:30 बजे तक सो जाता हूं। लेकिन लगता है कि काश, मैं बैडमिंटन और टेनिस खेलने के लिए कुछ और वक्त निकाल पाता।
डाइट: नाश्ते में परांठा, ऑमलेट, टोस्ट या दलिया... कुछ भी ले लेता हूं। साथ में कॉफी लेता हूं। लंच हॉस्पिटल में लेता हूं, जिसमें दाल-सब्जी, चपाती व चावल, दही होता है। बाहर का खाना मुझे सूट नहीं करता, इसलिए उससे बचता हूं। नॉन-वेज में कभी-कभी फिश खाता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन ड्रिंक कभी-कभी ले लेता हूं। कम और संतुलित खाना खाने के अलावा खूब पानी पीता हूं।
रिलैक्सेशन: फोटॉग्रफी मन को रिलैक्स करती है। साथ ही, रीडर्स डाइजेस्ट व दूसरी किताबें पढ़कर व इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक सुनकर भी मन हल्का होता है।
जिंदगी का मंत्र: काम में हमेशा प्रफेशनल रहें। मेरा मानना है कि गरीबों से बात करना ईश्वर से बात करने के बराबर ही है। सभी के लिए एक जैसा होना चाहिए इंसान को। हर किसी की, हम वक्त और हमेशा मदद को तैयार रहना चाहिए। किसी से ज्यादा उम्मीदें नहीं लगानी चाहिए। इससे दिमागी सुकून बना रहता है।
शिखा शर्मा
हेल्थ एक्सपर्ट
उम्र : 40 साल, वजन : 55 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 7 बजे उठने के बाद 10 मिनट मेडिटेशन जरूर करती हूं। योग भी करती हूं लेकिन यह कई बार रेग्युलर नहीं हो पाता। हां, रोजाना आधे घंटे वॉक जरूर करती हूं। सुबह करीब 10:30 बजे काम शुरू करती हूं। कभी-कभी एक्यूप्रेशर थेरपी लेती हूं तो स्पा में स्टोन मसाज कराती हूं। ऐसा रिलैक्स होने के साथ-साथ इन कलाओं को समझने और जानने की गरज से भी करती हूं। अच्छी नींद भी मुझे फिट रखती है। वैसे, मैं दौड़ना चाहती हूं, हाफ मैराथन में हिस्सा लेना चाहती हूं लेकिन मलाल है कि मैं ऐसा कर नहीं पाती क्योंकि इसके लिए ट्रेनिंग आदि की जरूरत पड़ती है।
डाइट: नाश्ते में गाजर और टमाटर का जूस लेती हूं। 10 बजे के करीब एक-दो टोस्ट लेती हूं। साथ में फल भी लेती हूं। लंच में सूप और सैंडविच या सब्जी-रोटी लेती हूं। डिनर भी सादा ही होता है, जिसमें सूप, चावल या रोटी होती है। सर्दियों में हमेशा गर्म पानी और गर्मियों में गुनगुना पानी पीती हूं। अदरक या सौंफ का पानी भी नियमित तौर पर लेती हूं। मसालेदार और बाहर का खाना कम ही खाती हूं।
रिलैक्सेशन: जब भी तनाव में होती हूं, खासतौर पर स्प्रिचुअल किताबें पढ़ती हूं। इससे जिंदगी को नए नजरिये से देखने-जानने का भी मौका मिलता है।
जिंदगी का मंत्र: टेंशन से दूर रहती हूं। मैं काम को ही पूजा मानती हूं और वही मुझे तरोताजा भी करता है। मेरा मानना है कि अच्छा काम करना ही पूजा के समान है। ईश्वर से कोई शिकायत नहीं क्योंकि जितना चाहा, जिंदगी ने उससे ज्यादा ही दिया।
डॉ. ए. के. झिंगन
चेयरमैन, दिल्ली डायबीटीज रिसर्च सेंटर
उम्र : 60 साल, वजन : 75 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6 से 6:3 बजे उठकर 45-50 मिनट की वॉक पर जाता हूं। इतनी देर में 5-6 किलोमीटर चलता हूं। वॉक के दौरान गहरी सांस (डीप ब्रिदिंग) लेता हूं। लौटकर 10 मिनट वेट उठाता हूं। इससे अपर बॉडी मसल्स शेप में रहती हैं। रोजाना 15-20 मिनट पूजा करता हूं, ताकि ईश्वर को धन्यवाद दे सकूं। घर से आधा किमी दूर स्थित अपने क्लिनिक तक पैदल ही जाता हूं। 9 बजे तक क्लिनिक पहुंच जाता हूं। रात में 11:30 बजे तक सो जाता हूं। मुझे लगता है कि अगर मैं योग क्लास जॉइन कर पाता तो मेरी सेहत के लिए और अच्छा होता।
डाइट: नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स, एक गिलास कॉफी और 5-6 बादाम खाता हूं। 11:30 बजे एक कप चाय और लंच में दो चपाती, दही व सब्जी लेता हूं। कभी-कभी नॉनवेज भी खा लेता हूं। शाम 5 बजे फल खाता हूं और 7-8 बजे एक कप चाय लेता हूं। 9 बजे डिनर करता हूं, जो सादा ही होता है। स्मोकिंग से दूर रहता हूं और अल्कोहल भी साल में एक-दो बार से ज्यादा नहीं लेता। बाहर का खाना बहुत कम खाता हूं।
रिलैक्सेशन: जब भी वक्त मिलता है, मैं पार्क में जाना पसंद करता हूं। संडे को काम को कोई बोझ नहीं रखता। इससे भी तरोताजा रहने में मदद मिलती है।
जिंदगी का मंत्र: एक साथ बहुत सारी चीजों में शामिल न हों। इससे मन की शांति छिन जाती है। जो भी काम करें, उसी पर फोकस करें। बहुत ज्यादा की चाहत न हो, तो शांति बनी रहती है। मरीजों का फीडबैक पाकर दिल खुश हो जाता है। काम को एंजॉय करना भी खुश रहने के लिए जरूरी है।
डॉ. महिपाल सचदेव
चेयरमैन, सेंटर फॉर साइट
उम्र : 52 साल, वजन : 69 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6 बजे उठने के बाद आधा घंटा साइकलिंग करता हूं। उसमें कभी कोई रुकावट नहीं आती। पहले जॉगिंग भी करता था। कभी लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करता। हर सर्जरी से पहले दो मिनट मेडिटेशन करता हूं। रात में 11 बजे सोता हूं। जॉगिंग अब भी करना चाहता हूं, पर वक्त नहीं मिलता। बैडमिंटन और टेनिस भी खेलना चाहता हूं। ऐसा करना सेहत के लिए अच्छा होता।
डाइट: नाश्ते में दो ब्रेड व जूस लेता हूं। काम की वजह से लंच का टाइम फिक्स नहीं है। हफ्ते में एक-दो बार नॉन-वेज खाता हूं। पंजाबी खाना पसंद लेकिन ज्यादा तला-भुना नहीं खाता। फिर भी महीने में पांच-सात बार बाहर का खाना हो ही जाता है। एक्सर्साइज करके फालतू कैलरी घटाता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन सोशल डिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: मैनेजमेंट और करंट सब्जेक्टों पर किताबें पढ़ने के अलावा टीवी पर न्यूज देखने से दिन भर की थकान गायब हो जाती है।
जिंदगी का मंत्र: मैं रोजाना गुरुद्वारा जाता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि ईश्वर और नियति किसी भी इंसान का भाग्य तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ईश्वर में विश्वास ही है कि किसी भी केस को देखने से पहले दो मिनट गुरु नानक का नाम जरूर लेता हूं। जिंदगी में एक मकसद तय करके उसी दिशा में बढ़ते जाने से सफलता मिलती है। काम से प्रेम करना भी जरूरी है। फिजिकल फिटनेस के लिए अपने शरीर को वक्त जरूर दें।
डॉ. के. के. अग्रवाल
प्रेजिडेंट, हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया
उम्र : 51 साल, वजन : 68 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 4 बजे से मेरा दिन शुरू होता है। रात में अगर 3 बजे भी सोऊं तो भी मैं इसी वक्त उठता हूं। सुबह 15-20 मिनट तेज वॉक करता हूं या फिर ट्रैडमिल पर चलता हूं। इसके बाद करीब 15 मिनट के लिए मेडिटेशन व प्राणायाम करता हूं। कभी लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करता। रात में 10 बजे तक सोने की कोशिश होती है, लेकिन कई बार काम ज्यादा होने से ऐसा नहीं हो पाता। वक्त की कमी के चलते लंबी वॉक पर नहीं जा पाना सालता है।
डाइट: सुबह नाश्ते में एक कप दूध और भीगे हुए 15-20 बादाम लेता हूं या फिर फ्रूट्स खा लेता हूं। दोपहर में 1-2 बजे दाल-सब्जी या फल खाता हूं। दोपहर में रोटी नहीं खाता। शाम 5 बजे फल खाता हूं और रात 8 बजे पूरा खाना खाता हूं। इसमें 2-3 रोटी, सब्जी दही आदि होती है। चावल नहीं खाता। मैं चाय, सॉफ्ट ड्रिंक, स्मोकिंग, ड्रिंकिंग और नॉनवेज से दूर रहता हूं।
रिलैक्सेशन: पढ़ना और लिखना मेरे मन को शांत रखता है। रोजाना 15 मिनट मूवी भी देखता हूं। इससे रिलैक्स महसूस होता है।
जिंदगी का मंत्र: जिस काम को करें, उसमें अपना तन-मन लगा लें। डेडिकेशन ही कामयाबी का राज है।
डॉ. नरेश त्रेहन,
चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, मेडांटा, द मेडिसिटी
उम्र : 63 साल, वजन : 72 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6:15 से 6:30 बजे तक उठने के साथ दिन शुरू होता है, जो रात 11:30 बजे बिस्तर पर जाने पर खत्म होता है। हफ्ते में पांच दिन सुबह 45 मिनट एक्सर्साइज और तीन दिन 45 मिनट योग करता हूं। लोदी गार्डन में घूमने चला जाता हूं या फिर घर में ही ट्रैडमिल पर चलता हूं। वॉक हमेशा तेज करता हूं। हल्के वेट भी उठाता हूं। वॉक, वर्कआउट और योग, इन तीनों का कॉम्बिनेशन बॉडी को पूरी तरह फिट रखता है। सुबह 8:30 बजे तक हॉस्पिटल पहुंच जाता हूं और आमतौर पर वहां से रात 8:30-9:00 बजे निकलना होता है। शाम को घर लौटते हुए कार में ही 15-20 मिनट मेडिटेशन (विपश्यना) भी करता हूं। इससे दिन भर की दिमागी थकान गायब हो जाती है।
डाइट: सुबह नाश्ते में एक अंडे का सफेद हिस्सा या अंकुरित दालें और पांच-छह बादाम, एक अखरोट और एक कप चाय लेता हूं। दिन में 11 बजे सलाद और लंच में एक रोटी, हरी सब्जी और दही खाता हूं। शाम को 5-6 बजे एक कप चाय या कॉफी के साथ एक बिस्कुट और रात में 8:30 तक डिनर लेता हूं, जिसमें एक चपाती, सलाद या चिकन होता है। खाने में ज्यादा-से-ज्यादा फल और हरी सब्जियां शामिल करने की कोशिश होती है। बाहर के खाने से परहेज करता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन कभी-कभी सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: सूफी संगीत सुनकर और किताबें पढ़कर मन को रिलैक्स करता हूं।
जीवन का मंत्र: ऐसी जिंदगी जिएं, जिसमें गैरकानूनी और गलत कामों के लिए कोई जगह न हो। नेगेटिव होने से बचें। ऐसा होने से दूसरों से भी ज्यादा नुकसान खुद उस शख्स का होता है। संतोष रखना सबसे जरूरी है, क्योंकि हमें यह देखना चाहिए कि न जाने कितने लोग हमसे बहुत खराब जिंदगी जी रहे हैं।
डॉ. अशोक सेठ
चेयरमैन, कार्डिएक साइंसेज, एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट
उम्र : 54 साल, वजन : 74 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6:30 बजे उठने के बाद एक कप चाय पीता हूं। 45 मिनट ट्रैडमिल (जिसमें साइकलिंग भी शामिल होती है) और 15 मिनट वेट उठाता हूं। हफ्ते में 5-6 दिन एक्सर्साइज जरूर करता हूं। रोजाना पूजा करता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि ईश्वर की कृपा से ही मैं अपने मरीजों के चेहरे पर मुस्कान ला पाता हूं। इसके लिए मैं रोज रात को सोने से पहले भगवान को धन्यवाद देता हूं। सुबह 9:30 बजे हॉस्पिटल पहुंचता हूं और कई बार काम खत्म होते-होते रात में 2 भी बज जाते हैं। औसतन 1-1:30 से पहले सोना मुमकिन नहीं हो पाता।
डाइट: नाश्ता हल्का ही लेता हूं। लंच टाइम फिक्स नहीं है क्योंकि वक्त मिल ही नहीं पाता। दिन में कभी भी अंकुरित चना या दाल ले लेता हूं। डिनर इत्मिनान से लेता हूं, लेकिन यह सादा ही होता है। दो चपाती व दाल खाता हूं। कभी-कभार नॉन-वेज खाता हूं। बहुत मन होता है तो रेस्तरां में जाकर अच्छा खाना भी खा लेता हूं लेकिन तब एक्सर्साइज से फालतू कैलरी जलाना नहीं भूलता। स्मोकिंग से दूर रहता हूं, पर कभी-कभार सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: संगीत सीखता हूं और साल में दो बार स्कूबा डाइविंग पर जाता हूं। कोई भी ऐसा काम जो आपके प्रफेशन से अलग होता है, वह मन को रिलैक्स करता है।
जिंदगी का मंत्र: अपने काम के प्रति समर्पण और फोकस जरूरी है। परिवार का सपोर्ट और भगवान में विश्वास आपको जिंदगी जीने का सही तरीका सिखाता है। वही काम करें, जिससे आपको प्यार हो और जिसे आप एंजॉय करें। इससे आप दिमागी और शारीरिक तौर पर फिट रहेंगे।
डॉ. प्रदीप चौबे
जॉइंट एमडी, मैक्स हेल्थकेयर
उम्र : 57 उम्र, वजन : 81 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 7 बजे उठने के बाद आधा घंटा ट्रैडमिल पर चलता हूं। वक्त मिलता है तो हेल्थ क्लब भी चला जाता हूं। हालांकि कभी-कभी ज्यादा ऑपरेशन होते हैं तो एक्सर्साइज छूट भी जाती है। ऑपरेशन के दौरान ही मेरा प्रैक्टिकल मेडिटेशन हो जाता है क्योंकि जितना कंसंट्रेशन उस दौरान करना होता है, उतना कभी और नहीं होता। सुबह 9 से रात 9 बजे तक हॉस्पिटल में होता हूं। पूजा करता हूं लेकिन इसके लिए मूर्ति के सामने बैठना जरूरी नहीं है। जब भी, जहां भी वक्त मिला, भगवान को याद कर लेता हूं। रात में 12 बजे से पहले सोना नहीं हो पाता।
डाइट: नाश्ते में एक गिलास जूस और फल लेता हूं। हॉस्पिटल में लंच का वक्त नहीं मिलता, लेकिन हर दो घंटे बाद कुछ-न-कुछ खा लेता हूं, जैसे कि सैंडविच, फल, स्प्राउट्स, लो कैलरी बिस्कुट आदि। दिन में पांच-सात बादाम भी लेता हूं। काम के दबाव की वजह से डिनर ही मेरा मुख्य खाना होता है, जिसमें मैं सब्जी, रोटी, दाल, चावल आदि लेता हूं। दही में स्ट्रॉबेरी या कोई और फल डालकर खाना पसंद करता हूं। स्मोकिंग नहीं करता, कभी-कभार अल्कोहल ले लेता हूं।
रिलैक्सेशन: एग्जिबिशन जाकर आर्ट वर्क देखने और उनका कलेक्शन करने से मेरा मन खुश हो जाता है। स्प्रिचुअलिटी से संबंधित अच्छी किताबें भी पढ़ता हूं।
जिंदगी का मंत्र: मेरा मानना है कि अपने प्रफेशन के अलावा दूसरे क्षेत्रों के लोगों से मिले-जुलें। अगर मैं दिन भर की थकान के बाद शाम को किसी डॉक्टर से मिलूंगा तो मेडिसिन की ही बात होगी, इसलिए काम खत्म करते ही नॉन-प्रफेशनल दुनिया में आना पसंद करता हूं। दिमागी शांति के लिए यह जरूरी है।
डॉ. अनूप मिश्रा
हेड ऑफ डायबीटीज एंड मेटाबॉलिम डिपार्टमेंट, फोर्टिस हॉस्पिटल
उम्र : 51 साल, वजन : 73-76 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 5:30 बजे मेरा दिन शुरू होता है। काम के दिनों में 45 मिनट रेग्युलर एक्सर्साइज करता हूं, जबकि संडे और बाकी छुट्टी के दिन एक घंटा पसीना बहाता हूं। रोजाना ट्रैडमिल पर 350-400 कैलरी जरूर जलाता हूं। साथ में 10-12 मिनट हल्के वेट भी उठाता हूं। अगर रात में जल्दी घर आ गया तो फिर से 20-25 मिनट वॉक और जॉगिंग करता हूं। पिछले 15 सालों से मेरा बीएमआई बढ़ा नहीं है। योग के बजाय एरोबिक्स को ज्यादा फायदेमंद मानता हूं। रोजाना पूजा और मेडिटेशन करता हूं।
डाइटः हल्का नाश्ता लेता हूं, जैसे कि दलिया, फल आदि। संडे को लंच अक्सर बाहर करता हूं, लेकिन जिस दिन भी बाहर खाता हूं, एक्सर्साइज ज्यादा करता हूं। लंच में दो चपाती व पनीर प्रेफर करता हूं। सलाद खूब खाता हूं। शाम 6 बजे एक कप कॉफी और रात करीब 9 बजे डिनर में 2-3 चपाती व सब्जी-दाल लेता हूं। स्मोक नहीं करता, कभी-कभी सोशल ड्रिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: एक वक्त था, जब प्ले खूब करता था। अब हिंदी व इंग्लिश के नॉवेल और रिसर्च पेपर लिखना मन को सुकून देता है।
जिंदगी का मंत्र: अनुशासन बहुत जरूरी है। मैं कितना भी थका होऊं, एक्सर्साइज जरूर करता हूं। सिडनी के ऑपरा हाउस से लेकर पैरिस के आइफिल टावर तक को मैंने जॉगिंग करते हुए ही देखा। यह दुनिया को देखने का मेरा तरीका है। अपने काम को एंजॉय करना भी बेहद जरूरी है। वही काम करें, जो पसंद हो।
डॉ. पी. के. दवे
चेयरमैन, गवर्निंग बॉडी, रॉकलैंड हॉस्पिटल
उम्र : 70 साल, वजन : 62 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 5 बजे उठता हूं। इसके बाद वॉक करता हूं। सर्दियों में बाहर नहीं जा पाता तो घर पर ही वॉक कर लेता हूं। योग भी करता हूं। प्राणायाम और डीप ब्रिदिंग मन को शांत करते हैं। सुबह 8:30 बजे हॉस्पिटल पहुंच जाता हूं। लिफ्ट के बजाय सीढयों से चढ़ना पसंद करता हूं। रात 8 बजे तक काम चलता रहता है। रात में 10-10:30 बजे तक सो जाता हूं। लेकिन लगता है कि काश, मैं बैडमिंटन और टेनिस खेलने के लिए कुछ और वक्त निकाल पाता।
डाइट: नाश्ते में परांठा, ऑमलेट, टोस्ट या दलिया... कुछ भी ले लेता हूं। साथ में कॉफी लेता हूं। लंच हॉस्पिटल में लेता हूं, जिसमें दाल-सब्जी, चपाती व चावल, दही होता है। बाहर का खाना मुझे सूट नहीं करता, इसलिए उससे बचता हूं। नॉन-वेज में कभी-कभी फिश खाता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन ड्रिंक कभी-कभी ले लेता हूं। कम और संतुलित खाना खाने के अलावा खूब पानी पीता हूं।
रिलैक्सेशन: फोटॉग्रफी मन को रिलैक्स करती है। साथ ही, रीडर्स डाइजेस्ट व दूसरी किताबें पढ़कर व इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक सुनकर भी मन हल्का होता है।
जिंदगी का मंत्र: काम में हमेशा प्रफेशनल रहें। मेरा मानना है कि गरीबों से बात करना ईश्वर से बात करने के बराबर ही है। सभी के लिए एक जैसा होना चाहिए इंसान को। हर किसी की, हम वक्त और हमेशा मदद को तैयार रहना चाहिए। किसी से ज्यादा उम्मीदें नहीं लगानी चाहिए। इससे दिमागी सुकून बना रहता है।
शिखा शर्मा
हेल्थ एक्सपर्ट
उम्र : 40 साल, वजन : 55 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 7 बजे उठने के बाद 10 मिनट मेडिटेशन जरूर करती हूं। योग भी करती हूं लेकिन यह कई बार रेग्युलर नहीं हो पाता। हां, रोजाना आधे घंटे वॉक जरूर करती हूं। सुबह करीब 10:30 बजे काम शुरू करती हूं। कभी-कभी एक्यूप्रेशर थेरपी लेती हूं तो स्पा में स्टोन मसाज कराती हूं। ऐसा रिलैक्स होने के साथ-साथ इन कलाओं को समझने और जानने की गरज से भी करती हूं। अच्छी नींद भी मुझे फिट रखती है। वैसे, मैं दौड़ना चाहती हूं, हाफ मैराथन में हिस्सा लेना चाहती हूं लेकिन मलाल है कि मैं ऐसा कर नहीं पाती क्योंकि इसके लिए ट्रेनिंग आदि की जरूरत पड़ती है।
डाइट: नाश्ते में गाजर और टमाटर का जूस लेती हूं। 10 बजे के करीब एक-दो टोस्ट लेती हूं। साथ में फल भी लेती हूं। लंच में सूप और सैंडविच या सब्जी-रोटी लेती हूं। डिनर भी सादा ही होता है, जिसमें सूप, चावल या रोटी होती है। सर्दियों में हमेशा गर्म पानी और गर्मियों में गुनगुना पानी पीती हूं। अदरक या सौंफ का पानी भी नियमित तौर पर लेती हूं। मसालेदार और बाहर का खाना कम ही खाती हूं।
रिलैक्सेशन: जब भी तनाव में होती हूं, खासतौर पर स्प्रिचुअल किताबें पढ़ती हूं। इससे जिंदगी को नए नजरिये से देखने-जानने का भी मौका मिलता है।
जिंदगी का मंत्र: टेंशन से दूर रहती हूं। मैं काम को ही पूजा मानती हूं और वही मुझे तरोताजा भी करता है। मेरा मानना है कि अच्छा काम करना ही पूजा के समान है। ईश्वर से कोई शिकायत नहीं क्योंकि जितना चाहा, जिंदगी ने उससे ज्यादा ही दिया।
डॉ. ए. के. झिंगन
चेयरमैन, दिल्ली डायबीटीज रिसर्च सेंटर
उम्र : 60 साल, वजन : 75 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6 से 6:3 बजे उठकर 45-50 मिनट की वॉक पर जाता हूं। इतनी देर में 5-6 किलोमीटर चलता हूं। वॉक के दौरान गहरी सांस (डीप ब्रिदिंग) लेता हूं। लौटकर 10 मिनट वेट उठाता हूं। इससे अपर बॉडी मसल्स शेप में रहती हैं। रोजाना 15-20 मिनट पूजा करता हूं, ताकि ईश्वर को धन्यवाद दे सकूं। घर से आधा किमी दूर स्थित अपने क्लिनिक तक पैदल ही जाता हूं। 9 बजे तक क्लिनिक पहुंच जाता हूं। रात में 11:30 बजे तक सो जाता हूं। मुझे लगता है कि अगर मैं योग क्लास जॉइन कर पाता तो मेरी सेहत के लिए और अच्छा होता।
डाइट: नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स, एक गिलास कॉफी और 5-6 बादाम खाता हूं। 11:30 बजे एक कप चाय और लंच में दो चपाती, दही व सब्जी लेता हूं। कभी-कभी नॉनवेज भी खा लेता हूं। शाम 5 बजे फल खाता हूं और 7-8 बजे एक कप चाय लेता हूं। 9 बजे डिनर करता हूं, जो सादा ही होता है। स्मोकिंग से दूर रहता हूं और अल्कोहल भी साल में एक-दो बार से ज्यादा नहीं लेता। बाहर का खाना बहुत कम खाता हूं।
रिलैक्सेशन: जब भी वक्त मिलता है, मैं पार्क में जाना पसंद करता हूं। संडे को काम को कोई बोझ नहीं रखता। इससे भी तरोताजा रहने में मदद मिलती है।
जिंदगी का मंत्र: एक साथ बहुत सारी चीजों में शामिल न हों। इससे मन की शांति छिन जाती है। जो भी काम करें, उसी पर फोकस करें। बहुत ज्यादा की चाहत न हो, तो शांति बनी रहती है। मरीजों का फीडबैक पाकर दिल खुश हो जाता है। काम को एंजॉय करना भी खुश रहने के लिए जरूरी है।
डॉ. महिपाल सचदेव
चेयरमैन, सेंटर फॉर साइट
उम्र : 52 साल, वजन : 69 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 6 बजे उठने के बाद आधा घंटा साइकलिंग करता हूं। उसमें कभी कोई रुकावट नहीं आती। पहले जॉगिंग भी करता था। कभी लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करता। हर सर्जरी से पहले दो मिनट मेडिटेशन करता हूं। रात में 11 बजे सोता हूं। जॉगिंग अब भी करना चाहता हूं, पर वक्त नहीं मिलता। बैडमिंटन और टेनिस भी खेलना चाहता हूं। ऐसा करना सेहत के लिए अच्छा होता।
डाइट: नाश्ते में दो ब्रेड व जूस लेता हूं। काम की वजह से लंच का टाइम फिक्स नहीं है। हफ्ते में एक-दो बार नॉन-वेज खाता हूं। पंजाबी खाना पसंद लेकिन ज्यादा तला-भुना नहीं खाता। फिर भी महीने में पांच-सात बार बाहर का खाना हो ही जाता है। एक्सर्साइज करके फालतू कैलरी घटाता हूं। स्मोकिंग नहीं करता लेकिन सोशल डिंकिंग करता हूं।
रिलैक्सेशन: मैनेजमेंट और करंट सब्जेक्टों पर किताबें पढ़ने के अलावा टीवी पर न्यूज देखने से दिन भर की थकान गायब हो जाती है।
जिंदगी का मंत्र: मैं रोजाना गुरुद्वारा जाता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि ईश्वर और नियति किसी भी इंसान का भाग्य तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ईश्वर में विश्वास ही है कि किसी भी केस को देखने से पहले दो मिनट गुरु नानक का नाम जरूर लेता हूं। जिंदगी में एक मकसद तय करके उसी दिशा में बढ़ते जाने से सफलता मिलती है। काम से प्रेम करना भी जरूरी है। फिजिकल फिटनेस के लिए अपने शरीर को वक्त जरूर दें।
डॉ. के. के. अग्रवाल
प्रेजिडेंट, हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया
उम्र : 51 साल, वजन : 68 किलो
एक्सर्साइज: सुबह 4 बजे से मेरा दिन शुरू होता है। रात में अगर 3 बजे भी सोऊं तो भी मैं इसी वक्त उठता हूं। सुबह 15-20 मिनट तेज वॉक करता हूं या फिर ट्रैडमिल पर चलता हूं। इसके बाद करीब 15 मिनट के लिए मेडिटेशन व प्राणायाम करता हूं। कभी लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करता। रात में 10 बजे तक सोने की कोशिश होती है, लेकिन कई बार काम ज्यादा होने से ऐसा नहीं हो पाता। वक्त की कमी के चलते लंबी वॉक पर नहीं जा पाना सालता है।
डाइट: सुबह नाश्ते में एक कप दूध और भीगे हुए 15-20 बादाम लेता हूं या फिर फ्रूट्स खा लेता हूं। दोपहर में 1-2 बजे दाल-सब्जी या फल खाता हूं। दोपहर में रोटी नहीं खाता। शाम 5 बजे फल खाता हूं और रात 8 बजे पूरा खाना खाता हूं। इसमें 2-3 रोटी, सब्जी दही आदि होती है। चावल नहीं खाता। मैं चाय, सॉफ्ट ड्रिंक, स्मोकिंग, ड्रिंकिंग और नॉनवेज से दूर रहता हूं।
रिलैक्सेशन: पढ़ना और लिखना मेरे मन को शांत रखता है। रोजाना 15 मिनट मूवी भी देखता हूं। इससे रिलैक्स महसूस होता है।
जिंदगी का मंत्र: जिस काम को करें, उसमें अपना तन-मन लगा लें। डेडिकेशन ही कामयाबी का राज है।
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सोमवार, 28 दिसंबर 2009
शेरा पूछे, कोटला! हाउज दैट!!!
नई दिल्ली, फिरोजशाह कोटला की पिच के कारण दिल्ली शर्मसार हो गई। अनुभव और विश्वास
के बावजूद सिर्फ एक दिन के मैच में ही दिल्ली की छीछालेदर हो गई। ऐसी हालत में कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों पर उठ रही आशंकाएं और भी मजबूत हो जाती हैं। पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल क्रिकेट मैच रद्द होने के बाद काफी चिंतित हैं, लेकिन दिल्ली सरकार के पीडब्ल्यूडी मंत्री राजकुमार चौहान इन आशंकाओं और चिंताओं को निराधार मानते हैं।
चौहान का कहना है कि पिच के कारण दिल्ली का मैच रद्द होना शर्म की बात है, लेकिन इसे कॉमनवेल्थ गेम्स के साथ जोड़ना सही नहीं है। हमारे ज्यादातर स्टेडियमों का ढांचा तैयार हो चुका है। सिर्फ फिनिशिंग का काम बाकी है। खेलों के आयोजन में अभी नौ महीनों से ज्यादा का समय है। स्टेडियम समय से काफी पहले ही तैयार हो जाएंगे।
चौहान के अनुसार, केवल दो प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जिन्हें लेकर चिंता हो सकती है। पहला बारापूला एलिवेटेड रोड और दूसरा, सलीमगढ़ फोर्ट के पैरलल रिंग रोड। बारपूला प्रोजेक्ट मई तक पूरा होना है। किसी अनहोनी के कारण मई तक काम पूरा नहीं हुआ तो भी इसके बाद चार महीने का समय और रहेगा। सलीमगढ़ प्रोजेक्ट जून-जुलाई तक पूरा हो जाएगा। यही स्थिति यूपी लिंक रोड की भी है। उन्होंने दावा किया कि स्ट्रीट लाइट बदलने का काम जनवरी में पूरा हो जाने की उम्मीद है। स्ट्रीट स्केपिंग और ब्यूटीफिकेशन भी शुरू हो चुका है। गाजीपुर और अप्सरा बॉर्डर का कुछ काम रह भी गया, तो कॉमनवेल्थ गेम्स से उसका कोई सीधा संबंध नहीं है। साइनेज का 50 करोड़ रुपये का टेंडर आ चुका है, यानी हर काम पटरी पर है।
दूसरी तरफ, विजय गोयल मानते हैं कि एक दिन के मैच का वर्क लोड ही हम सह नहीं पाए, तो इतने बड़े पैमाने पर होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स को कैसे मैनेज कर पाएंगे। चिंता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि कुछ लोगों ने खेलों को अपनी बपौती बना लिया है। यही स्थिति रही तो दिल्ली निश्चित रूप से शर्मसार होगी। गोयल रविवार को ही खेलगांव देखने गए थे। उनका कहना है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। खेलों के आयोजन की तरफ भी किसी का ध्यान नहीं है। केवल स्टेडियमों के निर्माण से ही खेल सफल नहीं हो सकते। न कम्यूनिकेशन की प्लानिंग है, न मीडिया की, न सिक्युरिटी की और न ही रेफरियों व सिस्टम की। आयोजन समिति सोचती है कि दिल्ली सरकार अपनी जिम्मेदारियां निभाएगी, जबकि दिल्ली सरकार इसे केंद का दायित्व मानती है। गोयल कहते हैं कि दिल्ली का मैच रद्द होना एक चेतावनी है। बशर्ते आयोजन समिति इसे चेतावनी के तौर पर ले।
के बावजूद सिर्फ एक दिन के मैच में ही दिल्ली की छीछालेदर हो गई। ऐसी हालत में कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों पर उठ रही आशंकाएं और भी मजबूत हो जाती हैं। पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल क्रिकेट मैच रद्द होने के बाद काफी चिंतित हैं, लेकिन दिल्ली सरकार के पीडब्ल्यूडी मंत्री राजकुमार चौहान इन आशंकाओं और चिंताओं को निराधार मानते हैं।
चौहान का कहना है कि पिच के कारण दिल्ली का मैच रद्द होना शर्म की बात है, लेकिन इसे कॉमनवेल्थ गेम्स के साथ जोड़ना सही नहीं है। हमारे ज्यादातर स्टेडियमों का ढांचा तैयार हो चुका है। सिर्फ फिनिशिंग का काम बाकी है। खेलों के आयोजन में अभी नौ महीनों से ज्यादा का समय है। स्टेडियम समय से काफी पहले ही तैयार हो जाएंगे।
चौहान के अनुसार, केवल दो प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जिन्हें लेकर चिंता हो सकती है। पहला बारापूला एलिवेटेड रोड और दूसरा, सलीमगढ़ फोर्ट के पैरलल रिंग रोड। बारपूला प्रोजेक्ट मई तक पूरा होना है। किसी अनहोनी के कारण मई तक काम पूरा नहीं हुआ तो भी इसके बाद चार महीने का समय और रहेगा। सलीमगढ़ प्रोजेक्ट जून-जुलाई तक पूरा हो जाएगा। यही स्थिति यूपी लिंक रोड की भी है। उन्होंने दावा किया कि स्ट्रीट लाइट बदलने का काम जनवरी में पूरा हो जाने की उम्मीद है। स्ट्रीट स्केपिंग और ब्यूटीफिकेशन भी शुरू हो चुका है। गाजीपुर और अप्सरा बॉर्डर का कुछ काम रह भी गया, तो कॉमनवेल्थ गेम्स से उसका कोई सीधा संबंध नहीं है। साइनेज का 50 करोड़ रुपये का टेंडर आ चुका है, यानी हर काम पटरी पर है।
दूसरी तरफ, विजय गोयल मानते हैं कि एक दिन के मैच का वर्क लोड ही हम सह नहीं पाए, तो इतने बड़े पैमाने पर होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स को कैसे मैनेज कर पाएंगे। चिंता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि कुछ लोगों ने खेलों को अपनी बपौती बना लिया है। यही स्थिति रही तो दिल्ली निश्चित रूप से शर्मसार होगी। गोयल रविवार को ही खेलगांव देखने गए थे। उनका कहना है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। खेलों के आयोजन की तरफ भी किसी का ध्यान नहीं है। केवल स्टेडियमों के निर्माण से ही खेल सफल नहीं हो सकते। न कम्यूनिकेशन की प्लानिंग है, न मीडिया की, न सिक्युरिटी की और न ही रेफरियों व सिस्टम की। आयोजन समिति सोचती है कि दिल्ली सरकार अपनी जिम्मेदारियां निभाएगी, जबकि दिल्ली सरकार इसे केंद का दायित्व मानती है। गोयल कहते हैं कि दिल्ली का मैच रद्द होना एक चेतावनी है। बशर्ते आयोजन समिति इसे चेतावनी के तौर पर ले।
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रविवार, 29 नवंबर 2009
पेड़ों का सफल ट्रांसप्लांट

हिसार- अब सड़क के आड़े आने वाले पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं है। ट्रांसप्लांट तकनीक से उन्हें दूसरे स्थान पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले बिश्नोई समाज के जनक गुरु जंभेश्वर महाराज के नाम से विख्यात गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (गुजविप्रौवि) ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने का करिश्मा कर दिखाया है। इस तकनीक से विश्वविद्यालय के हार्टीकल्चर विभाग ने दो चरणों में खजूर के 38 पेड़ सफलता से ट्रांसप्लांट किए हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण के आड़े आ रहे करीब 25 अन्य पेड़ों को भी ट्रांसप्लांट करने का कार्य जारी है। दरअसल पर्यावरणवादी संत के नाम से जुड़े इस विश्वविद्यालय में आधुनिक पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत गत अप्रैल माह में तब हुई, जब विश्वविद्यालय प्रशासन नेक (नेशनल एक्रिडीशन काउंसिल) की टीम के स्वागत की तैयारियों में जुटा हुआ था। विश्वविद्यालय को फिर से ए ग्रेड दिलाने के लिए हर क्षेत्र में सुधार किया गया लेकिन नए विश्वविद्यालय में

पेड़ों से ज्यादा संख्या पौधों की थी। इसी दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति डा. डीडीएस संधू ने एक खबर पढ़ी की चीन में पेड़ों को ही ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। इस पर उन्होंने विश्वविद्यालय के कार्यकारी अभियंता एवं हार्टीकल्चर विभाग के अध्यक्ष अशोक अहलावत से बात की। इसके बाद अहलावत ने इस पर काम शुारू किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के जंगल में खड़े 25 से 30 वर्ष पुराने खजूर के 18 पेड़ों को ट्रांसप्लांट करवाया। यह कार्य इस वर्ष 5 अप्रैल से शुरू हुआ और लगभग एक सप्ताह में पूरा कर लिया गया। पेड़ों का ट्रांसप्लांट पूरी सफल रहता है या नहीं, यह स्पष्ट होने में करीब छह माह का समय लग जाता है। ट्रांसप्लांट किए गए 18 पेड़ों में 15 हरे-भरे शान से खड़े हैं। इसके बाद सिंतबर माह में खजूर के 20 और पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया गया। यह कार्य 20 सितंबर से शुरू हुआ और करीब 10 दिनों में पूरा कर लिया गया। इस चरण की सफलता के बारे में पूरी तरह जानकारी तो मार्च, 2010 में चल पाएगी लेकिन अभी इनमें से सारे पेड़ सुरक्षित व अच्छी हालत में हैं। इसके बाद जब विश्वविद्यालय के गेट नंबर तीन से प्रशासनिक भवन तक सड़क चौड़ी करने का काम शुरू हुआ तो इस काम के आड़े भी 25 पेड़ आ गए। चूंकि पेड़ों को काटना उचित नहीं होता, इसलिए इन पेड़ों को भी अब ट्रांसप्लांट किया जा रहा है। यह काम अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में शुरू हुआ है और दिसंबर के अंत तक इसके पूरा हो जाने की उम्मीद है। नए विवि में पुराने पेड़ : संधू विवि कुलपति डा. डीडीएस संधू ने बताया कि गुजविप्रौवि प्रदेश का सबसे नए विश्वविद्यालयों में है, लेकिन पुराने पेड़ों के बिना अच्छा लुक नहीं आ सकता। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय का नाम भी पर्यावरण के संरक्षक के नाम पर है, इसलिए यहां पर पेड़ काटना भी ठीक नहीं। इसी जद्दोजहद के दौरान उनकी नजर जब चीन में पेड़ ट्रांसप्लांट की खबर पर पड़ी तो उन्होंने हार्टीकल्चर विभाग से बात की और अशोक अहलावत ने वह काम करके दिखा दिया। इंटरनेट से सीखी तकनीक : अहलावत विश्वविद्यालय के हार्टीकल्चर विभाग के प्रधान एवं कार्यकारी अभियंता अशोक अहलावत ने बताया कि वह अब तक खजूर के 18 पेड़ ट्रांसप्लांट कर चुके हैं तथा अब अशोका, महानीम, नीम व बड़ के पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने का काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि यह सारा कार्य उन्होंने इंटरनेट की मदद से ट्रांसप्लांट की तकनीक पढ़कर किया है।
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माधुरी को दगा दे गई बलुई माटी

इलाहाबाद- ये तो तय है कि ठंडी के बाद गर्मी आयेगी लेकिन माधुरी आयेगी कि नहीं इसमें संशय है। माधुरी गर्मी का वह फल है जिसको लोग बड़े ही चाव से खाना पसंद करते हैं। तरबूज की माधुरी नामक प्रजाति के बारे में जो लोग जानते हैं उनके मुंह में अगर अभी पानी आ गया हो तो बड़ी बात नहीं लेकिन इस फल के बारे में एक विडम्बना जुड़ गयी है। इलाहाबाद, कौशाम्बी और फतेहपुर जिलों में बड़े पैमाने पर पैदा होने वाले इस फसल पर सूखे की मार पड़ गयी है। अबकी तरबूज सोना जैसा हो जाये तो ताज्जुब नहीं। दरअसल तरबूज और खरबूज का उत्पादन नदियों के कछार में होता है। बारिश कम होने की वजह से इस वर्ष गंगा-यमुना में बाढ़ नहीं आयी। इसके कारण पुरानी रेत बह नहीं सकी और बाढ़ के साथ आने वाली उर्वरा बलुई मिट्टी रेत पर नहीं पहुंची। इसी वजह से यहां के तरबूज और खरबूज के उत्पादक किसान सहमे हुए हैं। उनका मानना है कि ऐसी स्थिति में उत्पादन तो प्रभावित होगा ही कहीं लागत भी न डूब जाये। इलाहाबाद, कौशाम्बी, फतेहपुर और मिर्जापुर आदि जिलों में गंगा-यमुना की रेती पर 15 हजार हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रफल में तरबूज और खरबूज की अच्छी पैदावार है। हर साल नवंबर के अंतिम और दिसंबर के पहले सप्ताह से बुवाई शुरू हो जाती है और मार्च तक फल बाजार में पहुंच जाते हैं। दो महीने तक बाजार पर इनका कब्जा रहता है। अपनी मिठास और गुण के कारण यहां के तरबूज और खरबूज दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलुरू, भोपाल आदि शहरों के अलावा विदेशों में धूम मचाते हैं। खाड़ी देशों में तो इनकी खूब मांग रहती है। इलाहाबाद के फाफामऊ, गद्दोपुर, भोरहूं, सुमेरी का पूरा, मातादीन का पूरा, मलाक हरहर, रंगपुरा, जैतवार डीह, बहमलपुर सहित दर्जनों गांवों के किसान बताते हैं कि बिना उर्वरा बलुई मिट्टी के तरबूज का उत्पादन मुश्किल है। कई बार ऐसा हो भी चुका है। तरबूज किसान रामकैलाश, विजय बहादुर, रामजियावन, भुल्लर यादव का कहना है कि इस बार तो बालू के रेत भी नहीं डूब सके हैं। इस कारण रेत पर पुराना और नीरस बालू बचा है। इसीलिए हम लोग तरबूज की खेती से कतरा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर तरबूज और खरबूज की पैदावार न होने अथवा कम होने पर एक तो इसके दाम तेजी से बढ़ेंगे और स्वाद भी बदल जाने की बात कही जा रही है। हालांकि यहां के मार्केट में उड़ीसा और कई अन्य जगहों से तरबूज की आमद होती है लेकिन उनमें वह बात नहीं होती जो यहां के तरबूज की प्रजाति हिरमंजी, कोहिनूर और माधुरी में होती है। हालांकि उड़ीसा से आने वाले टांडा नामक तरबूज की प्रजाति अच्छी मानी जाती है। कछार में उर्वरा शक्ति की कमी को कृषि वैज्ञानिक भी सही मान रहे हैं। इस बाबत डॉ.आनंद कहते हैं कि गंगा के पानी में हिमालय की पहाडि़यों से अब भी तमाम तरह की उर्वरा शक्तियां मिट्टी में आती हैं। बारिश के दौरान खेतों की उर्वर मिट्टी भी बह कर नदी में आती है जो रेत पर जम जाती है। तरबूज व्यापारी रमेश खन्ना, हेमंत सोनकर, बब्बू पंडित, ननकेश निषाद कहते हैं कि इस बार तरबूज के महंगे होने के आसार से धंधा भी प्रभावित होगा।
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असर आंकने में जुटी दुनिया

नई दिल्ली: दुनिया भर की सरकारें दुबई के कर्ज संकट के आकलन में जुट गई हैं। अमेरिका, ब्रिटेन से लेकर भारत तक के शेयर बाजार और केंद्रीय बैंक दुबई के कारोबार से जुड़े कंपनियों के जोखिम का हिसाब-किताब निकालने लगे हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि दुबई के कर्ज संकट की वास्तविक तस्वीर मौजूदा से काफी बड़ी हो सकती है और वैश्विक व खासतौर पर पूर्वी व दक्षिण एशिया बाजार में उम्मीद से ज्यादा हड़कंप मचाने की क्षमता रखती हैं। वैसे दुनिया की निगाहें अबूधाबी की दवा पर हैं जो दुबई को मिल सकती है। लेकिन इस दवा की मात्रा और असर को लेकर असमंजस है। अगला हफ्ता वित्तीय बाजारों के लिए उथल-पुथल भरा हो सकता है। यही कारण है दुनिया की सरकारें अपने वित्तीय बाजारों को ढांढस बंधाने में लगी हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि दुबई संकट कोई बहुत बड़ा नहीं है और इसको लेकर ज्यादा बदहवासी नहीं फैलानी चाहिए। भारत पर भी इसका असर बहुत थोड़ा होगा। दूसरी तरफ प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्री वायलार रवि ने कहा है कि दुबई संकट के बावजूद वहां काम करने वाले भारतीय पलायन नहीं करेंगे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन भी आशंकाओं पर पानी डालने आगे आए हैं। दुबई के संकट को लेकर जितनी मुंह उतनी बातें वाली स्थिति है। दुनिया के पर्यवेक्षक मान रहे हैं कि दुबई के बवंडर में तमाम बैंकों और निवेश कंपनियों के खरबों डालर फंस सकते हैं जिनका सीधा संबंध दुबई सरकार की कंपनियों से तो नहीं है मगर उनका दुबई में निवेश रहा है। इसलिए बैंक व वित्तीय निवेश अपनी रिस्क असेसमेंट प्रणाली को सक्रिय कर चुके हैं। माना जा रहा है कि अगले सप्ताह इस संदर्भ में कुछ और खुलासे हो सकते हैं। दुबई को इस संकट से बचाने की वैसे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में और खासतौर पर इसके पड़ोसी अबूधाबी में जोरदार कोशिशें शुरू हो गई हैं। संकेत यह हैं कि अबूधाबी की अगुवाई में यूएई के कुछ प्रमुख बैंक दुबई को वित्तीय राहत पहुंचाने के लिए एक पैकेज का ऐलान कर सकते हैं। अबूधाबी ने इसी सप्ताह दुबई की प्रमुख निर्माण कंपनियों को 5 अरब डालर की मदद दी है। फरवरी में अबूधाबी का केंद्रीय बैंक 10 अरब डालर दे चुका है। खाड़ी के अन्य देशों ने भी यूएई सरकार पर दुबई को बचाने का दबाव बनाया हुआ है क्योंकि इस संकट का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है। अबूधाबी के पास 900 अरब डालर का अतिरिक्त कोष पड़ा हुआ है। अबूधाबी जिन शर्तो पर दुबई को वित्तीय मदद देने को तैयार है उसे अपनाने के लिए दुबई को अपना ढांचा बदलना पड़ सकता है। अबूधाबी का कहना है कि दुबई को अपने रीयल एस्टेट, सेवा व पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था और उदारीकरण के प्रक्रिया को कुछ धीमा करना पड़ेगा। इसके अलावा अबूधाबी और दुबई के शाही परिवारों के बीच आपसी तालमेल पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा। पर्यवेक्षकों का कहना है कि दुबई की बीमारी का जो इलाज अबूधाबी बता रहा है वह इसे आंशिक तौर पर ही राहत देगा। क्योंकि इस संकट से दुबई का पूर ढांचा चरमरा सकता है, जिसके परोक्ष असर बहुत गहरे होंगे।
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अभी भी झुक रही है कुतुबमीनार

नई दिल्ली : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तमाम दावों के विपरीत विश्वविख्यात स्मारक कुतुबमीनार अभी भी झुक रही है। इसका खुलासा ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा पांच साल के बाद इस माह किए गए तकनीकी अध्ययन में हुआ है। मीनार में झुकाव प्रति वर्ष ढाई सेकेंड के आसपास है। ज्ञात हो कि सेकेंड, कोण या झुकाव मापने की डिग्री और मिनट के बाद सबसे छोटी इकाई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) पिछले साल से कह रहा था कि कुतुब मीनार का झुकाव रुक गया है। एएसआई के अधिकारियों ने बताया था कि उन्होंने कुतुबमीनार के झुकने के कारण के बारे में पता लगा कर पूरा बंदोबस्त कर दिया है। बताया गया था कि बरसाती पानी से मीनार की जड़ में 45 फुट गहराई में लगे लाल पत्थर को नुकसान पहुंचने के कारण मीनार झुक रही थी। इसके बाद कुतुबमीनार के ड्रेन सिस्टम को दुरुस्त किया गया था। मगर ताजा अध्ययन से पता चला है कि कुतुबमीनार अभी भी दक्षिणी पश्चिमी दिशा में झुक रही है। ज्ञात हो कि कुछ माह पहले संसद में इस मामले को लेकर हंगामा हुआ था। इसके बाद केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने कुतुबमीनार के झुकाव का पता लगाने के लिए प्रति वर्ष भू-तलीय सर्वेक्षण कराने के निर्देश दिए थे। जिसके आधार पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की देहरादून स्थित भू-तलीय अनुसंधान शाखा ने 4 नवंबर से कुतुबमीनार का तकनीकी अध्ययन शुरू किया था, जो अब पूरा हो चुका है। सर्वे के लिए पिछले वर्षो के निर्धारित ईस्ट और वेस्ट बिंदुओं को लिया गया था। पूरे अध्ययन में एक सौ से भी अधिक बार एक ही प्वाइंट से कुतुबमीनार का सर्वेक्षण किया गया। यह सर्वेक्षण तापमान को ध्यान में रखते हुए सुबह, दोपहर, शाम व रात को किया गया। सूत्रों से पता चला है कि इस अध्ययन में इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि कुतुबमीनार दक्षिण पश्चिम की ओर झुक रही है। जिसके झुकाव की सालाना दर 0.5 से लेकर ढाई सेकेंड के बीच मिली है। इस हिसाब से यदि हम प्रति वर्ष का आकलन करें तो 2004 के बाद अब तक कुतुबमीनार इस दिशा में साढ़े 12 सेकेंड झुक चुकी है। इस मामले की रिपोर्ट संस्थान के देहरादून स्थित कार्यालय द्वारा आगामी कुछ महीनों में ही सरकार को सौंपी जाएगी। ज्ञात हो कि 12 वीं सदी में बनी कुतुबमीनार का 1952, 1972 और 1983 में भूगणितीय सर्वेक्षण किया जा चुका है। मगर इस दौरान कोई गड़बड़ी सामने नहीं आई। एएसआई द्वारा 2004 में कराए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि 1984-2004 के बीच कुतुबमीनार दक्षिण पश्चिम की दिशा में झुकी थी।
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शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
अब लद जाएंगे चोली के दिन!
रिसर्चरों ने एक ऐसी डिवाइस तैयार की है जिसके इस्तेमाल से महिलाओं को अब ब्रा पहनने की जरूरत नहीं पड़ेगी
। इस डिवाइस को ब्रेस्ट के नीचे एक सेंटीमीटर से भी कम का चीरा लगाकर फिट किया जाता है और इसका इस्तेमाल आजीवन किया जा सकता है। इस 'इंटरनल ब्रा' के इस्तेमाल के बाद चोली पहनने की दरकार नहीं पड़ेगी, अलबत्ता महिला खिलाड़ियों को इसकी जरूरत पड़ सकती है।
'कप ऐंड अप' नामक इस डिवाइस को तैयार करने वाले इसराइली रिसर्चर एयाल गुर ने बताया कि इसे फिट करने में कम से कम 40 मिनट का वक्त लगता है। यह शेप में बिल्कुल फैब्रिक ब्रा की ही तरह है, लेकिन यह सिलिकन का बना हुआ है।
बेल्जियम के रिसर्चरों ने जिस महिला पर यह प्रयोग किया, उससे पहले उन्हें लगभग एक साल तक कई टेस्ट करने पड़े थे। इस सर्जरी के परिणामों से वह महिला बेहद खुश थी। सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने दोनों ब्रेस्ट के नीचे एक सेंटीमीटर से भी कम का चीरा लगाया और इसके बाद सिलिकन ब्रा को एक सेंटीमीटर अंदर तक फिट किया। टाइटेनियम स्क्रू और किसी मजबूत मेटल वाले बहुत पतले धागे की मदद से इन्हें पसलियों की हड्डियों से इस कदर जोड़ा गया जिससे ब्रेस्ट का शेप वांछित हिसाब से फिट किया जा सके।
इस इंटरनल ब्रा को ऑरबिक्स मेडिकल कंपनी ने तैयार किया है और गुर के मुताबिक यूरोप के बाजारों में यह अगले 18 महीनों के अंदर उपलब्ध हो जाएगा। गुर ने बताया कि बेस्ट अपलिफ्टमेंट की पारंपरिक पद्धति की तुलना में यह सर्जरी कम खर्चीली है।
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बूढ़े बरगद से डरता है बुढ़ापा

मनुष्य की चार अवस्थाओं में बुढ़ापा सबसे नापसंद अवस्था है पर यह प्रकृति की वह हकीकत है जिसे स्वीकार करना ही पड़ता है। बहरहाल बुढ़ापे की ओर तेजी से बढ़ रहे लोगों के लिए यह खबर काफी राहत देने वाली होगी। अपने कई गुणों के कारण आयुर्वेद चिकित्सा और भारतीय जीवन पद्धति का चहेता रहा बरगद अब बुढ़ापा भी रोकने में कारगर साबित होगा। इसकी हवाई जड़ों में एन्टी आक्सीडेन्ट की उपलब्धता सर्वाधिक पायी गयी है। इसके इसी गुण के कारण वृद्धावस्था की ओर ले जाने वाले कारकों को दूर भगाया जा सकेगा। कभी घर के बूढ़े बुजुर्गो की तरह ग्रामीण भारतीय समाज का अभिन्न व सम्मानित अंग रहे बरगद पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में चल शोध से छन कर ये बातें सामने आयी हैं।
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राकेश मारिया ने दी इस्तीफे की धमकी
मुंबई।। मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रान्च के प्रमुख राकेश मारिया ने कहा है कि यदि गृह मंत्रालय उनके खिलाफ शहीद अशोक कामटे की पत्नी विनीता द्वारा लगाये गये आरोपों पर स्पष्टीकरण नहीं देता तो वह इस्तीफा दे देंगे, इस पर विनीता ने शुक्रवार को कहा कि वह अपनी किताब में लिखे प्रत्येक शब्द पर अडिग हैं।
विनीता ने पुणे से फोन पर कहा- किताब में लिखी सामग्री के बारे में किसी के भी द्वारा उठाये गए सवालों का सामना करने के लिए मैं तैयार हूं। मैं प्रत्येक शब्द पर अडिग हूं। पिछले साल आतंकी हमलों के दौरान शहीद हुए आईपीएस अधिकारी कामटे की विधवा ने कहा- किताब सूचना के अधिकार कानून के तहत मुंबई पुलिस द्वारा दिये गए तथ्यों पर आधारित है। मारिया द्वारा अशोक को कामा अस्पताल भेजने का निर्देश देने से इनकार करने की विनीता ने अपनी किताब में आलोचना की है। कामटे इसी जगह आतंकवादियों की गोली का शिकार हुए थे।
खबरों के मुताबिक मारिया ने राज्य के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल को कल एक पत्र लिखकर कहा कि यदि सरकार उनके खिलाफ लगे आरोपों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं देती या उन्हें नहीं देने देती तो वह इस्तीफा दे देंगे।
मारिया से इस बाबत प्रतिक्रिया नहीं ली जा सकी।
विनीता ने कहा कि पहले वह किताब नहीं लिखना चाहती थीं लेकिन 26 नवंबर की रात के घटनाक्रम को जानने की उनकी इच्छा ने ऐसा कराया।
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रब्बियों के डेरे पर पहुंची कूटनीति और राजनीति

मुंबई, कार्यक्रम तो नरीमन हाउस में रक्तपात की याद करने भर के लिए था मगर यह छोटा सा कार्यक्रम मंुबई में आयोजित बड़े सरकारी कार्यक्रमों के बीच खासा बड़ा हो गया। विदेश राज्य मंत्री शशि थरुर यहां पहुंचे और पाकिस्तान पर निशाना साधा। महाराष्ट्र सरकार की तिकड़ी चव्हाण, भुजबल, पाटिल ने यहां हाजिरी लगाई, इजरायल उच्चायुक्त भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। यानी कि कूटनीति और राजनीति दोनों एक छोटे से कार्यक्रम में आ जुटीं, जहां यहूदियों के अलावा अन्य समुदायों के लोग कम ही थे। मामला संदेश देने का था और जब नेता संदेश दे रहे हों तो युवा रब्बियों को जोश आ गया और उन्होंने भी इजरायल की याद के गीत गाए। ..मगर संगीत, रोशनी, राजनीति और कूटनीति सब मिलकर रब्बियों के इस डेरे की उदासी नहीं तोड़ पाए। बाहर संकरी सी गली में हो रहे आयोजन में बहुत कुछ कहा सुना जा रहा था मगर नरीमन हाउस के भीतर एक नीम उदासी थी। यह मुंबई में हमले के शिकार केंद्रों में शायद एकमात्र ऐसा केंद्र है जहां सब कुछ जस का तस है, खून के छींटे भी। कभी रब्बियों के संगीत से गुलजार इस खबाद हाउस में पिछले एक साल के दौरान कोई भूला भटका रब्बी आकर श्रद्धांजलि दे जाता है। नहीं तो यह पूजा के दिनों में ही खुलता है। यहां रब्बी गैब्रियल होल्त्सबर्ग और उनकी पत्नी रिविका की यादें हर जगह बिखरी हैं। इसी नरीमन हाउस के सामने गुरुवार को कूटनीति भी जुटी। छोटे से यहूदी समुदाय को उनकी कूटनीतिक अहमियत का अहसास कराने और दुनिया को संकेत देने यहां पहुंचे शशि थरुर बोले कि पाकिस्तान ने अब तक जो किया वह पर्याप्त नहीं है। पाकिस्तान को अपनी जमीन से आतंक को समाप्त करना होगा। थरुर ने लगे हाथ यहूदियों से अपने राज्य केरल के एतिहासिक रिश्ते भी याद किए और कहा कि नरीमन हाउस पर आतंक का हमला दरअसल सिर्फ भारत पर हमला नहीं बल्कि आतंक की अंतर्राष्ट्रीय घटना है। थरुर का आना और उनका निशाना साफ था कि यहूदियों का परंपरावादी और दार्शनिक खबाद समुदाय भारत के लिए कूटनीतिक तौर पर अहम है। इजरायल के उच्चायुक्त मार्क सोफर ने भारतीय सुरक्षा बलों की वीरता की तारीफ और भारत में यहूदियों को मिले सम्मान का जिक्र करते हुए श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम खत्म होते होते मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल और गृह मंत्री आरआर पाटिल की तिकड़ी भी इस छोटे से मंच पर पहुंच गई। रब्बियों को इतने वीआईपी जुटने की उम्मीद नहीं थी। इन आयोजन से अलग नरीमन हाउस दीवारें तो आतंक वधशाला जैसी लगती है। यह हाल देखकर शशि थरुर भी कांप उठे। पांच मंजिलों वाले इस भवन की हर मंजिल पर गोलियों के सैकड़ों निशान हैं। गे्रनेड से फटी दीवारें अब तक वैसी ही हैं। पूरे घर में बड़ी-बड़ी दरारें हैं। रब्बी गैब्रियल का पूजा घर, रसोई, शयनकक्ष यहां तक बाथरूम तक में गोलियों की इबारत खुदी है। भवन की तीसरी मंजिल पर छेद अब तक वैसा ही है जिसे एनएसजी ने रॉकेट लांचर दाग कर किया था और भवन में घुसे थे। एक उदास कमरे में इस रब्बी दंपति के नन्हे शिशु मोशे के खिलौने भी जस के तस बिखरे हैं। दरअसल इस घर में सब कुछ जस का तस है। बस पूजा गृह की गोलियों से छलनी दीवार के आगे एक ताजी मोमबत्ती जल रही है। भारत में यहूदियों के बहुत छोटे खबाद समुदाय के लिए गैब्रियल और रिविका की मौत गहरा सदमा है, यह बहती आंखों और रुंधे गलों में साफ दिख रहा था। नरीमन हाउस के भीतर गुजरी यंत्रणा भी महसूस की जा सकती थी। इसके अलावा जो दिखा वह थी सिर्फ राजनीति।
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उदासी और बेफिक्री


मुंबई वहां गम अभी तारी है और उदासी काबिज..और यहां मानो कुछ हुआ ही ही नहीं। एक है नरीमन हाउस और दूसरा लिओपोल्ड कैफे। आतंकी हमले के दो शिकार एक-दूसरे से बस कुछ कदमों की दूरी पर हैं। मगर कोलाबा के इन दोनों स्थानों के अतीत में असंगति है और वर्तमान में भी। कैफे को सब जानते हैं और छबाद हाउस को अभी भी तलाशना पड़ता है। यहूदियों के पूजा केंद्र छबाद हाउस यानी नरीमन हाउस में कोई साधक भूले-भटके पहुंच जाता है, मगर रूकता कोई नहीं और इधर लिओपोल्ड कैफे में कुर्सी पाने के लिए आपको इंतजार करना पड़ता है। एक गमजदा पूजागृह : सदा से शांत नरीमन हाउस अब और उदास व बोझिल है। मानो वह अपने दर्द के साथ जीना चाहता हो। सामने की दीवार पर गोलियों के निशान जस के तस हैं। गोलीबारी और राकेट लांचर के हमले में टूटी दीवार अभी नहीं है। बताते हैं कि अंदर खून के निशान भी जस के तस हैं। रब्बी गैब्रियल होल्तबर्ग की यादें अंदर बिखरी हैं और अब इस भवन में कोई नहीं ठहरता। गेट पर मौजूद गार्ड बताते हैं कि पूजा करने वाले लोग कभी कभार आते हैं। कोलाबा के लोगों को बहुत बाद में पता चला कि इस भवन में यहूदी पूजा करते हैं। उस गली और उस भवन को देख कर यह नहीं अहसास हो पाता है कि आतंकियों के पास यहूदियों के इस पूजास्थल की कितनी ठोस सूचना थी और क्यों इमरान और नासिर नाम के दो आतंकियों ने सबसे लंबे वक्त तक यहां मोर्चा लिया। कमांडो अगर छत से न उतरते तो एक गाड़ी का भी नरीमन हाउस तक पहुंचना मुश्किल है। नरीमन हाउस कितना बड़ा मोर्चा था, इसका एक छोटा सा सबूत पतली सी गली में नरीमन हाउस के ठीक सामने की दीवार है, जिस पर आतंकियों की एके 47 के दर्जनों हस्ताक्षर हैं। ऊपर लाल रंग से लिखा है, हम 26/11 के हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। नरीमन हाउस के रब्बी इससे ज्यादा और कर भी क्या सकते हैं। और एक मस्त कैफे : लिओपोल्ड कैफे का क्या कहना? हमले के बाद तो यह पर्यटन केंद्र बन गया है। हमला खत्म होने के अगले ही दिन यहां काम शुरू हो गया था। कोलाबा पुलिस स्टेशन के ठीक सामने बना लिओपोल्ड कैफे 1871 से चल रहा है। यह आतंकी हमले का पहला निशाना था। यहां गोलियां चला कर करीब एक दर्जन लोगों को मारते हुए आतंकी बगल की गली होते हुए पिछले गेट से ताज में घुस गए। भारत आने वाले विदेशी, खास तौर से यूरोपीय नागरिकों की यह पसंदीदा जगह है। बुधवार की शाम को पहले शिव सैनिकों ने यहां हल्ला गुल्ला किया था, लेकिन हमें कोई फिक्रमंद नहीं दिखता। पुलिस जरूर जमा है लेकिन लिओपोल्ड के कद्रदान कुर्सी के इंतजार में फुटपाथ पर खड़े हैं। कैफे के अंदर तो पैर रखने की जगह भी नहीं है। ग्राहकों में 80 फीसदी विदेशी, जो बियर और काफी की चुस्कियां ले रहे हैं। फिर भी निगाहें छत की तरफ उठ जाती हैं जहां गोलियों के निशान बने हैं। हमले के बाद लिओपोल्ड को कुछ ज्यादा ही ग्राहक मिलने लगे हैं। गोलियों के निशान वाले कैफे के कप खूब बिकते हैं।
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गुरुवार, 26 नवंबर 2009
महंगाई ने ली समृद्ध परंपराओं की बलि

शिमला, महंगाई का विभत्स रूप और दो वक्त की रोटी का जुगाड़, भले ही घर-घर की कहानी हो गया है, लेकिन दाल-रोटी के लिए अब देश की समृद्ध परंपराओं की भी बलि ली जा रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी से संयुक्त परिवारों के साझे चूल्हे भी बढ़ती कीमतों ने अलग कर दिए हैं। हिमाचल प्रदेश में दादी अपने पोते-पोतियों को प्यार से बना भोजन नहीं दे रही और बहू भी सास-ससुर के लिए खाना नहीं बना रही। यह कथा संयुक्त परिवारों के बिखराव से हुई। राज्य में लोग सरकारी राशनकार्ड के जरिए सब्सिडी का अधिकतम राशन लेने के लिए अलग हो रहे हैं। यह चौकाने वाला ट्रेंड राज्य में बढ़ते राशन कार्डो के आंकड़ों से सामने आया है। हिमाचल में एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) राशनकार्ड धारकों की संख्या में काफी इजाफा हो रहा है जबकि जनसंख्या के दृष्टिगत आंकड़ों में कोई परिवर्तन नहीं है। यह ज्यादातर उन पंचायतों में हो रहा है, जहां पहले एक राशनकार्ड में दो से तीन पीढि़यों के नाम दर्ज थे और अब न सिर्फ बेटे अपने मां-बाप से अलग राशनकार्ड बना रहे हैं बल्कि भाई-भाई से भी अलग हो रहा है। एक कार्ड के तीन हिस्सों में बंटने से प्रदेश में कोटे के राशन की खपत भी बढ़ रही है। कारण साफ है, लोगों को अब एक-एक किलो के बजाए तीन-तीन किलो दालें मिल रही हैं। ऐसा होने से सरकार के पास सब्सिडी वाले राशन की कमी हो गई है। लिहाजा कई डिपुओं में लोगों को न सस्ती दालें मिल रही हैं, न ही चीनी व अन्य सामान। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग का कहना है कि राशन कार्डो की संख्या अगर ऐसे ही बढ़ती रही तो आने वाले दिनों में आटा व चावल के कोटे पर फिर से कैंची चल सकती है। केंद्र के आवंटन के अनुरुप सरकार एपीएल परिवारों को 14 किलो आटा व 7 किलो चावल प्रति माह सस्ती दर पर उपलब्ध करवा रही है, लेकिन प्रदेश में जिस हिसाब से एपीएल कार्ड बढ़ रहे हैं उससे एपीएल परिवारों के लिए निर्धारित चावल व आटे की मात्रा कम पड़ने लगी है। विभाग के आंकड़े बताते है कि प्रदेश में पिछले 32 माह में औसतन 5 हजार 451 एपीएल कार्ड प्रति माह बने हैं। अगस्त, 2009 तक के आंकड़े के मुताबिक प्रदेश में एपीएल परिवारों की संख्या 10 लाख 63 हजार 794 है। सरकार ने कुछ माह पहले ही प्रति परिवार 14 किलो आटा व 7 किलो चावल की मात्रा निर्धारित की थी, लेकिन मौजूदा कार्डो की संख्या को देखते हुए अब आटे की मात्रा 13.62 व चावल की मात्रा 6.69 प्रति किलो प्रति परिवार बैठ रही है। अगर यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में आटा व चावल की यह मात्रा और कम हो जाएगी।
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मंगलवार, 24 नवंबर 2009
नेपाल में लाखों जानवरों की बलि

नेपाल के प्रसिद्ध गढ़ीमाई मंदिर में लाखों श्रद्धालु एक समारोह के दौरान हज़ारों जानवरों की बलि चढ़ाएंगे.
दक्षिणी नेपाल के बरियार में स्थित गढ़ीमाई देवी की मंदिर में हर पाँच साल बाद धार्मिक समारोह होता है.
कहा जाता है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा जानवरों की बलि इसी समारोह में दी जाती है.
गढ़ीमाई शक्ति की देवी मानी जाती है. समारोह के दौरान देवी को खुश रखने और मनोकामना पूरा करने के लिए ढाई लाख से भी ज़्यादा पशुओं की बलि दी जाएगी.
मंदिर के एक पुजारी चंदन देव चौधरी कहते हैं, "देवी को ख़ून चाहिए. यदि किसी को कोई परेशानी होती है तब मैं मंदिर में किसी जानवर की बलि देता हूँ जिससे उस व्यक्ति की परेशानी दूर हो जाएगी."
दो दिनों तक चलने वाले इस समारोह में भारत से भी अनेक श्रद्धालु हिस्सा लेने पहुँचे हैं. परिवार के साथ बिहार से समारोह में हिस्सा लेने आए पहुँचे 60 वर्षीय सुरेश पाठक बलि देने के लिए अपने साथ एक बकरा भी ले गए हैं.
श्रद्धा और विश्वास की देवी
वे कहते हैं, "मैं गढ़ीमाई की पूजा करने आया हूँ. आदि काल से हमारा विश्वास और हमारी श्रद्धा देवी पर है."
समारोह के व्यवस्थापकों का मानना है कि क़रीब पाँच लाख लोग समारोह स्थल पर पहुँच चुके हैं. सुरेश पाठक की तरह ज़्यादातर लोग अपने साथ बलि देने के लिए जानवरों को लेकर पहुँचे हैं.
एक ऊँची दीवार के घेरे में हज़ारों भैसों को रखा गया है. हालांकि समारोह में ज़्यादातर बलि भैंस की दी जाती है लेकिन बकरे, मुर्गी, कबूतर और चूहों की भी बलि दी जाएगी.
भैसों को जिस घेरे में रखा गया है उसकी देखभाल करने वाले एक पुलिस अधिकारी बिकेश अधिकारी कहते हैं, "सबसे पहले पाँच भैसों की बलि मंदिर में दी जाती है."
जानवरों की बलि देने के काम को अंजाम देने के लिए 250 स्थानीय लोगों को पारंपरिक खुखरी चाकू का लाइसेंस दिया गया है.
बलि देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी है, जिसके लिए लोगों को 20 नेपाली रुपए देने पड़े हैं.
नाराज़गी भी
लाखों जानवरों की बलि देने को लेकर कुछ नेपाली लोगों में रोष है.
मंदिर के बाहर जानवरों के अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने नारियल फोड़कर सांकेतिक रूप से बलि का विरोध किया. बलि प्रथा का विरोध करने वाले प्रमादा शाह का कहना है, "हम एक संदेश देना चाहते हैं. इस स्तर पर हम बस यही कर सकते हैं."
कार्यकर्ताओं ने समारोह के व्यवस्थापकों से बलि प्रथा को रोक देने की अपील की है. उनका कहना है कि यह बर्बरतापूर्ण है और हिंदू देवताओं को फूल और फल देकर भी ख़ुश किया जा सकता है.
जबकि नेपाली अधिकारियों का कहना है कि बड़ी संख्या में जानवरों की बलि एक धार्मिक परंपरा है.
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सोमवार, 23 नवंबर 2009
कौन है प्लेबॉय? चौथी उंगली खोलेगी राज
क्या आपकी चौथी उंगली (जिसमें शादी की अंगूठी पहनी जाती है) आपकी दूसरी उंगली (अंगूठे के साथ वाली) से बड़ी है? अगर हां, तो यह आपके लिए खुशखबरी है!
दरअसल हाल ही में हुई एक स्टडी में कहा गया है कि जिनकी चौथी उंगली दूसरी उंगली से बड़ी होती है, वे लोग प्रतियोगिता आदि में काफी तेज होते हैं। सेक्स के मामले में भी खूब सक्रिय रहते हैं और आमतौर पर एक से ज्यादा पार्टनर बनाते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि उंगलियों की आपस में लंबाई देखकर बताया जा सकता है कि व्यक्ति की सोशल लाइफ कैसी है। मां के गर्भ में ही यह तय हो जाता है कि उंगलियों की लंबाई क्या रहेगी और यह तय करते हैं टेस्टोस्टेरोन जैसे एंड्रोजन्स। टेस्टोस्टेरोन से ही आपके नेचर में आक्रामकता तय होती है।
यानी, अगर टेस्टोस्टेरोन का स्तर शरीर में ऊंचा होगा तो आप तेज़, बलशाली और आक्रामक होंगें। वैसे उंगलियों की लंबाई चौड़ाई में जन्म के बाद बदलाव नहीं होता है इसलिए कोई बच्चा युवावस्था में कैसा होगा, यह बचपन में उसकी उंगलियां देख कर काफी हद तक बताया जा सकता है। यह स्टडी यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल के शोधकर्ताओं ने की है।
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प्रेमिकाएं बनाने में भी माहिर थे तानाशाह मुसोलिनी

लंदन: इटली के फासीवादी तानाशाह बेनितो मुसोलिनी की एक समय में 14 प्रेमिकाएं थीं। मुसोलिनी की एक प्रेमिका की सार्वजनिक की गई डायरियों से यह खुलासा हुआ है। वेटिकन के डाक्टर की बेटी क्लेरेता पेतासी 20 साल की उम्र में 1932 में मुसोलिनी से मिली थीं और चार साल बाद वह उनकी प्रेमिका बन गई। उनकी डायरियों में 1932 से 1938 के काल खंड को लेकर घटनाओं का हैं। डायरियों में दर्ज जानकारी के अनुसार, पेतासी मुसोलिनी की जिंदगी में मौजूद अन्य महिलाओं से ईष्र्या करती थी और वह दिन में दर्जनों बार मुसोलिनी को मुलाकात के लिए बाध्य करती थी। शाम को घर पहुंचने के हर आधे घंटे बाद दोनों मिलते थे। पेतासी को शक था कि मुसोलिनी उसे धोखा दे रहा है। द संडे टाइम्स ने यह रिपोर्ट दी है। उसने डायरियों में मुलाकातों के बारे में लिखा है। अप्रैल 1938 में पेतासी ने दोनों के बीच उस कहासुनी का जिक्र किया है जो पेतासी द्वारा मुसोलिनी को उसकी पूर्व प्रेमिका ऐलिस डी फोनसेका पलोतेनी के साथ पकड़े जाने के बाद हुई थी। मुसोलिनी ने कहा, ठीक है , मैंने यह किया। क्रिसमस के पहले से मैं उससे मिला नहीं था। मुझे उससे मिलने कीच्इच्छा हो रही थी। मुझे नहीं लगता कि मैंने कोई अपराध किया है। मैंने उसके साथ 12 मिनट गुजारे। पेतासी ने तुरंत बीच में कहा 24। इस पर मुसोलिनी ने कहा, ठीक है 24, तो। यह बहुत जल्दी में हुआ। कौन परवाह करता है। 17 साल बाद कोई उत्साह नहीं बचा है। यह ऐसे है जैसे मैं अपनी बीबी के साथ हूं। मुसोलिनी ने पेतासी से कहा कि केवल एक महिला के साथ सोने की बात उसकी समझ से परे है। उसने कहा, एक समय था जब मेरे पास 14 महिलाएं थीं और हर शाम मैं एक के बाद एक तीन चार के साथ रहता था। इससे तुम्हें मेरे यौन इच्छा का अंदाजा हो सकता है।
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ऑक्सफोर्ड में पहली बार अफगान छात्रा को दाखिला

लंदन : शाहरजाद अकबर शायद अफगानिस्तान की उन लड़कियों में सबसे भाग्यशाली होगी जो पढ़ाई को अपनी जिंदगी की सबसे अहम पूंजी मानती हैं। तालिबानी हुकूमत के दौरान बंद दरों दीवारों के पीछे छुपकर पढ़ाई की हसरत पूरी करने वाली शाहरजाद अब ऑक्सफोर्ड विश्र्वविद्यालय में पढ़ाई करेंगी। वह अफगानिस्तान की पहली छात्रा हैं जिन्हें ऑक्सफोर्ड विश्र्वविद्यालय में दाखिला मिला है। 21 वर्षीय शाहरजाद आज भी नहीं भूलती हैं कि कैसे लड़कियों को स्कूल जाने से रोकने के लिए तालिबान ने उसकी इमारत को ही उड़ा दिया था। बुर्के के बिना घर से बाहर निकलने पर महिलाओं को अपने चहरों पर तेजाब फेंके जाने का डर सताता रहता था। आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी अभियान के बाद अब शाहरजाद को स्वतंत्रता से पढ़ाई करने का मौका मिला है। वह कहती हैं, अब मैं कुछ उम्मीद की किरण देख रही हूं। मैं महिलाओं को कई कार्यक्रमों में भाग लेते हुए देखती हूं और मेरी बहन भी स्कूल में पढ़ाई करने जाती है। तालिबान के दौर में यह संभव नहीं था। पिछले महीने ही ऑक्सफोर्ड विश्र्वविद्यालय के इंटरनेशनल डेवलपमेंट विभाग से स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरू करने वाली शाहरजाद कहती हैं, मैं समझती हूं कि युद्ध ने ब्रिटेन पर कितना दबाव डाल दिया है। मुझे यह देखकर दुख होता है कि अफगानिस्तान में लोगों को कितना कुछ सहना पड़ता है। मैं कंधार हवाई अड्डे पर कुछ सैनिकों से मिली थी और उनमें से एक के साथ उसकी गर्भवती प्रेमिका भी थी। उन्होंने कहा, सैनिकों के लिए बेहद मुश्किल होता है। विदेश में वह अपने परिवार से कोसों दूर रहते हैं। उन्हें अफगानिस्तान में देखकर मुझे दुख होता है। मगर शाहरजाद ऑक्सफोर्ड में मिले मौके का इस्तेमाल अपने देश की महिलाओं की सहायता करने में करना चाहती हैं। उन्होंने कहा, जब मैं बच्ची थी तब ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई के बारे में सुनती थी मगर यह कभी नहीं सोचा था कि मैं यहां पढ़ने आ सकूंगी। यह ऐसा सपना है जो सच हो गया। शाहरजाद का जन्म उत्तरी अफगानिस्तान में हुआ था जब सोवियत संघ के नौ साल का दौर खत्म होने के करीब था। मगर उसे आज भी याद है जब काबुल को उत्तरी गठबंधन सेना ने सील कर दिया था और 40 दिन तक युद्ध चलता रहा था। इस दौरान हफ्तों तक उसे अपने परिवार के साथ घर के बेसमेंट में बंद रहना पड़ा था।
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शनिवार, 21 नवंबर 2009
छह माह तक बर्फ में कैद रहेंगे 20 हजार लोग चंबा,

पांगी की कहानी
सर्दी के मौसम आते ही बीस हजारकी आबादी वाली पांगी घाटी में हालात बदल जाते हैं। छह माह तक बर्फ की कैद से छूटने की आस में इनमें से कई सांसें अटक जाती हैं। हेलीकाप्टर की एक उड़ान के लिए हफ्तों तक पंजीकरण कार्यालय के बाहर लाइनें लगती हैं। छह माह तक देश-दुनिया से कटी रहने वाली पांगी घाटी में सर्दियों में घाटी का तापमान दस डिग्री सेल्सियस से भी कम रहता है। हेलीकाप्टर के बिना चंबा जिला मुख्यालय तक पहुंचना संभव नहीं है। हालांकि यहां रहने वाले अनाज का भंडारण पहले ही कर लेते हैं, लेकिन बीमारी तो किसी को पूछ कर नहीं आती। ऐसी स्थिति में केवल हेलीकाप्टर ही फरिश्ता बनता है। पांगी तक पहुंचने का सबसे नजदीकी रास्ता साच पास है जिससे चंबा से आठ घंटे में पांगी पहुंचा जा सकता है, लेकिन 15 अक्टूबर के बाद यह बंद हो जाता है क्योंकि यहां आठ से दस फुट तक बर्फ जमा हो जाती है। दूसरा रास्ता कुल्लू-मनाली से है। यहां से रोहतांग दर्रे को पार करके पांगी पहुंचा जा सकता है। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले से भी एक रास्ता है, लेकिन इस पर केवल छोटे वाहन चल सकते हैं। दोनों मार्ग बंद हो जाने पर वैकल्पिक रूप से यही इस्तेमाल होता है। पर सुरक्षा की दृष्टि से इस मार्ग का इस्तेमाल इतना सरल नहीं है। अब सरकारी हेलीकाप्टर ही एकमात्र उपाय बाकी बचता है।
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शुक्रवार, 20 नवंबर 2009
नीली वर्दी पर जवान लाल

हिमाचल प्रदेश में पुलिस जवानों की वर्दी बदलने को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ जहां पुलिस जवान खाकी वर्दी की बजाए नई प्रस्तावित नीली वर्दी पर विरोध जता रहे हैं, वहीं विभाग ने जवानों को नीली वर्दी मुहैया करवाने के लिए खरीद प्रक्रिया शुरू कर दी है। वर्दी न बदलने का प्रस्ताव कई जिलों से कर्मियों ने पुलिस मुख्यालय को भेजा है, लेकिन विभाग अपने निर्णय पर कायम है। गोवा को छोड़कर देश के दूसरे राज्यों में अब भी पुलिस की वर्दी खाकी ही है। अब हिमाचल में यह पहल की जा रही है। पुलिस की वर्दी में बदलाव के पीछे यही तर्क दिया जा रहा है कि आम लोगों में पुलिस की खाकी वर्दी को लेकर जो धारणा है उसे बदला जाए और आम जनता पुलिस को मित्रवत समझे। पुलिस और आम जनता के बीच दोस्ताना संबंध बनाने के मकसद से प्रदेश पुलिस के पूर्व डीजीपी व वर्तमान सीबीआई निदेशक अश्वनी कुमार ने जवानों की वर्दी नीली करने की योजना बनाई थी। जिसके बाद सरकार ने भी इस प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान कर दी। हालांकि पिछले एक साल से विभाग जवानों को नीली वर्दी मुहैया करवाने पर जुटा है। लेकिन अब तक विभाग को अच्छी क्वालिटी की वर्दी नहीं मिल पाई है। दूसरी ओर नई वर्दी को लेकर पुलिस जवानों का विरोध भी जारी है। प्रदेश पुलिस फोर्स में 16 हजार से अधिक जवान हैं। इन जवानों को इस साल अभी तक न तो खाकी वर्दी मिल पाई और न ही नीली वर्दी। पुलिस जवानों को वर्दी न मिलने की मुख्य वजह खाकी वर्दी का रेट कंटै्रक्ट रद करना और नीली वर्दी के सेंपल फेल होना है। शिमला सहित प्रदेशभर के पुलिस जवान नई वर्दी से हाय-तौबा कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश पुलिस महासंघ ने भी नीली वर्दी का विरोध किया है। महासंघ का आरोप है कि विभाग के आला अधिकारी छोटे कर्मचारियों में भिन्नता लाने के मकसद से ही वर्दी में बदलाव कर रहे हैं। उन्होंने चेताया कि अगर पुलिस की खाकी वर्दी में बदलाव किया गया तो महासंघ अदालत में इस मामले को ले जाने से नहीं हिचकेगा। पुलिस विभाग के प्रवक्ता विनोद कुमार धवन का कहना है कि नीली वर्दी को लेकर कोई विवाद नहीं है। सरकार ने पुलिस की वर्दी नीली करने के लिए मंजूरी प्रदान कर दी है और विभाग नई वर्दी की खरीद की प्रक्रिया में जुटा है। अच्छी क्वालिटी की नीली वर्दी आ जाने के बाद जवानों को आवंटित कर दी जाएगी।
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तेरह खरब रु. हुए तो साफ होगी गंगा

सरकार सारे संसाधन झोक दे और निजी क्षेत्र को भी शामिल कर ले फिर भी भागीरथी को दस साल से पहले मुक्ति नहीं मिलनी वाली। क्योंकि पिछले गंगा एक्शन प्लान की नाकामी के बाद अब लक्ष्य को बढ़ाकर 2020 कर दिया गया है। यह लक्ष्य भी उसी कीमत पर पूरा होगा जब कि पर्याप्त संसाधन जुट सकें। इस नये लक्ष्य को पाने के लिए जल शोधन संयंत्र व अन्य आधारभूत संसाधन जुटाने होंगे जिसमें कुल 1,32000 करोड़ रुपये का खर्च आयेगा। इसी बढ़ते आर्थिक बोझ को बांटने के लिए सरकार ने निजीक्षेत्र को शामिल करने का प्रस्ताव किया है। सुप्रीम कोर्ट में पेश अपनी रिपोर्ट में सरकार ने माना है कि अगर जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्युवल (जेएनएनयूआरएम) की सारी योजनायें पूरी क्षमता से लागू कर दी जायें (जो कि संभव नहीं दिखता)तो भी तो भी सिर्फ कानपुर और पटना में गंगा को मैला कर रहे सीवर साफ हो सकेंगे। ऋषिकेश, हरिद्वार, इलाहाबाद, वाराणसी और हावड़ा का सीवर फिर भी गंगा को अपवित्र करता रहेगा। वैसे गंगा को साफ करने का दारोमदार सिर्फ निजी क्षेत्र पर ही नहीं राज्य व स्थानीय निकाय टैक्स, यूजर चार्ज और म्युनिसपल बांड के जरिए धन एकत्र करेंगे जो कि गंगा की सफाई में काम आयेगा। सरकार मानती है कि गंगा अभी भी गंदी है और कई जगह इसका पानी पीने लायक तो दूर नहाने लायक भी नहीं है। सरकार को इस बात की भी बड़ी चिंता है कि राज्य अपने यहां बने सीवर शोधन संयंत्रों का रखरखाव ठीक ढंग से नहीं कर पा रहे हैं। देश का 26 फीसदी हिस्सा गंगा बेसिन में आता है। गंगा में रोजाना 12000 मिलियन लीटर (एमएलडी)घरेलू सीवर गिरता है। जिसमें सिर्फ 3,750 एमएलडी सीवर ही साफ हो पाता है। बाकी गंगा का मैला कर रहा है। यानि मौजूदा जरूरत को पूरा करने के लिए ही अभी 8,250 एमएलडी क्षमता के शोधन संयंत्रों की जरूरत है। जबकि 2020 का लक्ष्य पाने के लिए इसके अलावा 11,250 एमएलडी की और जरूरत होगी। घरेलू सीवर के अलावा उद्योग भी गंगा को मैला करते हैं। गंगा में बहाई जा रही गंदगी में इनका हिस्सा 20 फीसदी है।
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